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Thursday, September 1, 2011

गुरु की याद

अपने प्राथमिक अध्यापकों को अक्सर याद करता हूँ। उनमें से अब तो कई गोलोकवासी हो गए हैं। कल्लर पाठक जी जिन्होंने अक्षर ज्ञान कराया। उनकी लिखावट बड़ी नोक दार और बर्तुल थी। वो लिखाई अब तक नहीं सध पाई है। बाबू श्याम नारायण सिंह की बौद्धिक चमक किसी और गुरु अध्यापक शिक्षक में न मिली। वे मेरे मिडिल के प्रधानाचार्य थे। कभी पढ़ाते नहीं थे। लेकिन जिस दिन पढ़ाने की घोषणा कर देते थे तो लड़कों में उत्साह की आग लग जाती थी। उस दिन स्कूल न आए लड़के पछताते रहते थे कि पढ़ने क्यों न आए।
सबसे विरल अनुभव था शंभु नाथ दूबे जी से पढ़ने का। वे अक्सर स्कूल आ कर रजिस्टर में अपनी हाजिरी लगाते और सो जाते। फिर १ बजे के आस-पास अगर महुए का मौसम हुआ तो उसका रस पीते और गन्ने का रस मिल जाता तो गन्ने का रस पीकर सो रहते। लेकिन स्कूल आने जाने का समय नियम से पालन करते। एक बार मेरी एक ताई जी ने अकारण मेरी पिटाई करने के कारण शंभुनाथ जी को तमाचा मार दिया था। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि जितने अध्यापक पंडितजी यानी ब्राह्मण थे वे पढ़ाते कम थे नौकरी अधिक बजाते थे। वह सिससिला अभी भी चल रहा हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
गुरु और साधु की जात नहीं पूछते। लेकिन जो पिछड़ी जाति के अध्यापक मिले उन्होंने पढ़ाने की भरपूर कोशिश करते थे। रूपनारायण मुंशी जी इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। स्कूल के सभी बच्चे उनकी कोशिश को सम्मान देते थे। हम श्रद्धा से भर कर कभी उनका पैर छूने की कोशिश करते तो वे रोक देते। वे कुछ उन अध्यापकों में से हैं जिनसे मिलने का मन करता है। पिछली गाँव यात्रा में उनको फोन किया तो पहचान गए। मुझे अचरज हुआ कि एक अध्यापक अपने ३० साल पहले विलग हो गए छात्र को कैसे याद रखता है। इस बार जाने पर उनसे मिलना होगा।
यहाँ एक बात लिखते हुए ग्लानि से भर रहा हूँ कि २०-२५ साल के विद्यार्थी जीवन में कभी भी किसी मुसलमान अध्यापक से पढ़ने का अवसर न मिला। मिडिल स्कूल में एक मौलवी साहब पढ़ाने आए तो वे पिछली कक्षाओं को गणित पढ़ाते थे। हालाकि वे मेरे गांव में ही रहते थे लेकिन उनसे कुछ भी पढ़ नहीं पाया। यहाँ मुंबई आकर एकबार उर्दू पढ़ने के लिए बांद्रा के उर्दू स्कूल में शायर हसन कमाल साहब के साथ गया तो लगा कि यहाँ वह सु्वसर मिलेगाष लेकिन फीस जमा करके भर्ती होने के आगे बात न बढ़ पाई।
पढ़ाई समाप्त करने तक कुल ५० अध्यापकों से पढ़ने का अवसर मिला। सोचता हूँ कि सबको लेकर अपने संस्मरण लिख दूँ। देखते हैं कि कब लिखता हूँ।