अनिल कुमार सिंह हिंदी के उन कुछ कवियों में से हैं जो बेहद कम लिख कर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। वे मेरे भूत पूर्व मित्र रहे हैं...और मित्रता का स्मरण रस अभी भी कभी-कभी मित्रता का गाढ़ा नशा पैदा करता है...उन्हें उनकी कविता अयोध्या १९९१ पर भारत भूषण अग्रवाल और उनके कविता संग्रह पहला उपदेश पर केदार नाथ अग्रवाल सम्मान प्राप्त है और आजकल वे फैजाबाद के एक महाविद्यालय में हिंदी की बिंदी ठीक कर रहे हैं...। उनके संग्रह पहला उपदेश की एक झलक यहाँ देख सकते हैं... चाह कर भी मैं अनिल की कोई फोटू नहीं साट पा रहा हूँ...पढ़े उनकी एक कविता जो कि तिब्बत पर उनका अपना पक्ष रखती है। वैसे आजकल वे अपनी इस कविता से सहमत नहीं है। ऐसा उन्होंने फोन पर हुई बात में बताया है।
तिब्बत देश
आम भारतीय जुलूसों की तरह
ही गुजर रहा था उनका हुजूम भी
‘तिब्बत देश हमारा है’ के नारे
लगाता हुआ हिन्दी में
वे तिब्बती थे यक़ीनन
लेकिन यह विरोध प्रदर्शन का
विदेशी तरीका था शायद
नारों ने भी बदल ली थी
अपनी बोली
एक भिखारी देश के नागरिक को
कैसे अनुभव करा सकते थे भला
वे बेघर होने का सन्ताप ?
अस्सी करोड़ आबादी के कान पर
जुओं की तरह रेंग रहे थे वे
पकड़कर फेंक दिए जाने की नियति से बद्ध
दलाईलामा तुम्हारी लड़ाई का
यही हश्र होना था आखिर !
दर-बदर होने का दुख उन्हें भी है
जो गला रहे हैं अपना हाड़
तिब्बत की बर्फानी ऊँचाइयों पर
उन्हें दूसरी बोली नहीं आती
और इसीलिए उनकी आहों में
दम है तुमसे ज़्यादा
दलाईलामा !
वे मुहताज नहीं है अपनी लड़ाई के लिए
तुम्हारे या टुकड़े डालने वाले
किन्हीं साम्राज्यवादी शुभचिन्तकों के
वे लड़ रहे हैं तिब्बत के लिए तिब्बत में रहकर ही
जो धड़कता है उनकी पसलियों में
तुम्हारे जैसा ही
कोई क्या बताएगा उन्हें
बेघर होने का सन्ताप दलाईलामा !
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Thursday, April 10, 2008
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