परसों अभय भाई आए थे...बातों-बातों में पिताओं का जिक्र आया। हम दोनों पिता हीन हैं...और माँ से दूर हैं...परसों की बात के दौरान मैंने अपने पिता के मरन की बात की...। उसी संदर्भ में एक ताजी और दो पुरानी कविताएँ छाप रहा हूँ...पिताओं को श्रद्धांजलि हैं यह।
(१)
कोई चिह्न नहीं है
पिता
अब घर में कोई चिह्न नहीं है तुम्हारा
सब धीरे धीरे मिट गया
कुछ चीजों को ले गए महापात्र
कुछ जला दीं गईं
तुम्हारा चश्मा पड़ा रहा तुम्हारे तहखाने में
कई महीने
फिर किसी ने उसे
गंगा में प्रवाहित कर दिया ।
तुम्हारे जूते
तुम्हारी घड़ी
तुम्हारी टोपियाँ सब कहाँ खो गईं जो
खोजने पर भी नहीं मिलतीं।
जब तुम थे
तब घर कैसे भरा था तुम्हारी चिजों से
हर तरफ तुम होते या तुम्हारी चीजें होतीं....
कितने तो गमछे थे तुम्हारे
कितने कुर्ते
कितनी चुनदानियाँ
कितने सरौते...
पर खोजता हूँ तो कुछ भी नहीं मिलता घर में कहीं
जैसे किसी साजिश के तहत तुम्हारी चीजों को
मिटा दिया गया हो।
ले दे कर बस एक चीज बची है
जो लोगों को दिलाती है तुम्हारी याद
वो मैं हूँ....तुम्हारा
सबसे छोटा बेटा।
पता नहीं क्यों लोग मुझे नहीं करते प्रवाहित
नहीं कर देते किसी को दान।
(४ अप्रैल २००८)
(२)
लौट गए पिता
आए थे पिता
कुछ-कुछ उदास
कुछ-कुछ हताश।
लौट गए पिता
बिल्कुल उदास
बिल्कुल हताश।
(2)
क्यों
गाँव में
पड़ा होगा सोता
बेराते होंगे पिता
धान में पानी
मैं यहाँ पर
बंद घर में
से रहा हूँ
जवानी !
-सिर्फ कवि नहीं से दो कविताएँ ।
रचना समय- १९८७-८८ में कभी।
शब्दार्थ-
सोता=जब सब सो जाएँ, बेराना=सींचने की प्रक्रिया, से रहा हूँ=पोस रहा हूँ, जैसे मुर्गी अंडे सेती है।
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Friday, April 4, 2008
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