पांती काकी के लिए प्रार्थना करें
आखिर हम सब की पंता या पांती काकी विदा हुई । खूब धूमधाम से उनके सारे संस्कार किए गए। ब्रह्म भोज हुआ। महापात्र विदा हुए। दो तीन बार गऊ दान हुआ। एक तीन बाई डेढ़ की वैकल्पिक वैतरनी बनाकर गऊ की पूछ पकड़ काकी के स्वर्ग पहुँचने का रास्ता बनाया ब्राह्मणों ने। एक बृद्धा महाबाभनी मेरी काकी बन कर आई। उसका खूब सत्कार हुआ। एक कंचन पुरुष की प्रतिमा और एक ब्राह्मण दम्पती की युगल रजत प्रतिमा भी महापात्रों को दी गई। काकी अगले जनम में सुहागन रहें इसके लिए सिंदूर और मंगल सूत्र भी दान दिया गया।
काकी पहले भी सम्मानित थीं। कभी किसी ने उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ कहा हो घर में इसकी याद किसी को नहीं है। बस काकी के मन में निपूती और वंश हीनता का घाव था जो कि उन्हें सालता रहा। वे पुरखों की सम्पदा से बेदखल थी। लेकिन माया महा ठगनी होती है। काकी ने अपने न रहने पर होने वाले संस्कारों के लिए कुछ जोड़ रखा था। उनके बैंक खाते में श्राद्ध आदि के लिए 33 हजार रुपए जमा थे। ये पैसे उनको निश्चित रूप से उनके प्रिय भाई श्री उमाशंकर जी ने दिए होंगे। उनके रुपयों के साथ ही उसके पाँच भतीजों ने सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए पैसे खर्च करके काकी के अंतिम सब काम किए। हम सब के बड़े भैया अवधेश कुमार मिश्र ने बड़े प्यार, श्रद्धा और विधि विधान से काकी मोक्ष के उपाय किए। 21 मार्च 2009 को काकी की तेरहवी सम्पन्न हुई। इसके बाद बस अब काकी की तिथि आएगी और जाएगी। हम उन्हें कभी कभार याद करेंगे।
जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना है। जेते जीव आए हैं जगत में सबहीं को जाना है। इस आधार पर जाना और जीना तो हम सब को है। लेकिन काकी ऐसे नहीं जाना और जीना चाहती थीं। वे अक्सर कहा करती थीं कि सुदिन को दुर्दिन में याद करके कलपना रोना ही सबसे बड़ा दुख है। काकी सुदिन को याद करके रोने भी लगीं थीं। मृत्यु के कुछ दिनों पहले वे भगवान को कोसने भी लगीं थीं। काकी का छोटा सा कमरा उनके जाते ही सूना सा हो गया था। काकी के जाने का हाहाकार वहाँ ही नहीं सारे गाँव में छाया हुआ था, खास कर उन औरतों में जिन्हें काकी कुछ देकर मदद करती थी। बचपन में काकी के उधार की वसूली मैं करता था। उस प्रसंग पर कभी बाद में बात करूँगा।
आप सब की प्रर्थनाएँ काकी तक पहुँची होंगीं । क्योंकि प्रार्थना और बददुआ कभी निस्फल नहीं जाती। काकी के लिए दुआ करें। यह भी दुआ करें कि यदि उन्हें कहीं जमन मिले तो भरपूर सुख मिले। उनके इस जनम के सारे मनोरथ सारी कामनाएँ पूरी हों। हिंदी के कवि रमेश पांडेय काकी से उनके गाँव भिखारीराम पुऱ जाकर मिले थे। उन्होंने उन पर एक कविता लिखी थी। जो उनके अनचाहें ही संपादित होकर पहल में प्रकाशित हुई थी। काकी के न रहने पर मेरी रमेश पाण्डे से बात हुई थी। वे काकी को लेकर काफी भावुक थे। यहाँ पढ़ें वह कविता।
पान्ती काकी
मैं पान्ती काकी के बारे में
पूछता हूँ
और लोगों की आँखों में
पढ़ता हूँ दुख तन्त्र
लोग कमला दासी के
बारे में पढ़ते हैं
किताब में
कविताओं में
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Wednesday, March 25, 2009
Sunday, April 20, 2008
याद आई वह लड़की
चिंह्न बचे होंगे क्या
याद आई वह लड़की
जिसकी अभिलाषा की थी कभी
याद आया
एक पेड़ के पैरों में जलता
निर्बल दिया ।
वे रातें
जिन्हें हम भुने आलू की तरह
जेबों में भरकर सो जाया करते थे
वे जगह-जगह जली हुई
चटख रातें
नमकीन धूल से भरी हमारी नींद
और वे तारे जो गंगा के पानी में
ठिठुरकर जलते रहते थे ।
कहीं गवाँ आया हूँ
इन सबको ।
ऎसा लगता है कि मेरे पास
कभी कुछ था ही नहीं
ऎसे ही खाली थी जेब
जी ऎसे ही फटा है पहले से ।
गंगा से इतना विमुख हो चला हूँ
कि जैसे उससे कोई नाता ही न हो
उसका रस्ता तक भूल गया हूँ
जैसे उसके तट तक
मझधार तक जाना न होगा कभी !
और वह लड़की
जो मेरे लिए थी स्लेट की तरह काली-कोरी
पड़ी होगी कहीं
किसी घर के कोने में
किसी विलुप्त हो चुके बस्ते की स्मृति में,
टूटकर उस पर
जो कुछ मैंने लिखा था कभी
उसके चिह्न बचे होंगे क्या
अब तक ।
नोट- इस कविता में कुछ संशोधन कवि-पत्रकार और अब ब्लॉगर विजय शंकर चतुर्वेदी के सुझाव पर किए गए थे। यहाँ मैं इसे कविता कोश से साभार छाप रहा हूँ।
Tuesday, March 18, 2008
माँ की चुप्पी
मैंने माँ पर करीब दर्जन भर कविताएँ लिखी हैं....और अभी भी लगता है कि माँ के दुख को और संघर्ष को रत्ती भर भी नहीं कह पाया हूँ....कई साल पहले पिता जी और माता जी को लेकर एक उपन्यास लिखना शुरू भी किया था...करीब छब्बीस अध्याय लिखे भी हैं...पर अभी साल दो साल उसे पूरा कर पाने की स्थिति नहीं दिख रही है....इस बीच में माँ से जुड़े साहित्य का संपाजन किया है जिसमें कविता के दो खंड और विचार और निबंध आदि का एक खंड यानी कुल तीन खंड बने हैं....मातृदेवोभव नाम से यह सब संकलन इन दिनों प्रकाशन की प्रक्रिया में है.....आज पढ़ें मेरी एक पुरानी धुरानी कविता। यह कविता उस संकलन में नहीं है....
विदा के समय
विदा के समय
माँ मेरा माथा नहीं चूमती
चलते समय
कोई विदा-शब्द नहीं बोलती
न ही मेरे चल देने पर
हाथ हिलाती है।
जब मैं
कहता हूँ कि
जा रहा हूँ मैं-
माँ के पास
करने और कहने को
कुछ नहीं होता
और वह
और चुप हो जाती है।
नोट- यह कविता मेरे पहले संग्रह "सिर्फ कवि नहीं" से है।
Thursday, March 6, 2008
किसका भारत, किसकी भारती ?
कुछ दिन हुए मुंबई में चर्चगेट की तरफ गया था....वहीं हुतात्मा चौक की ओर जा रही सड़क के कोने पर यह दृश्य दिखा...जिस पर मैं अभिशप्त हूँ लिखने को....कभी-कभी लगता है लिखने से कुछ बदलने वाला नहीं....फिर भी हम लिखते हैं....इस उम्मीद पर कि शायद लिखने से कुछ बदल ही जाए। आप पढ़ें...।
भारत-भारती
उधड़ी पुरानी चटाई और एक
टाट बिछाकर,
छोटे बच्चे को
औधें मुँह भूमि पर लिटा कर।
मटमैले फटे आँचल को
उस पर फैला कर
खाली कटोरे सा पिचका पेट
दिखा कर।
मरियल कलुष मुख को कुछ और मलिन
बना कर
माँगने की कोशिश में बार-बार
रिरिया कर।
फटकार के साथ कुछ न कुछ
पाकर
बरबस दाँत चियारती है
फिर धरती में मुँह छिपाकर पड़े बच्चे को
आरत निहारती है ।
यह किस का भरत है
किस का भारत
और किस की यह भारती है।
नोट- यह कविता विष्णु नागर जी के संपादन में कादम्बिनी में छपने गई थी....भूल से यहाँ पहले छप गई....कृपया आप सब इसे कादम्बिनी के अगले अंकों में पढ़ सकते हैं....कविता छप रही है यह जानकारी मुझे पंकज पराशर जी ने दी है....
भारत-भारती
उधड़ी पुरानी चटाई और एक
टाट बिछाकर,
छोटे बच्चे को
औधें मुँह भूमि पर लिटा कर।
मटमैले फटे आँचल को
उस पर फैला कर
खाली कटोरे सा पिचका पेट
दिखा कर।
मरियल कलुष मुख को कुछ और मलिन
बना कर
माँगने की कोशिश में बार-बार
रिरिया कर।
फटकार के साथ कुछ न कुछ
पाकर
बरबस दाँत चियारती है
फिर धरती में मुँह छिपाकर पड़े बच्चे को
आरत निहारती है ।
यह किस का भरत है
किस का भारत
और किस की यह भारती है।
नोट- यह कविता विष्णु नागर जी के संपादन में कादम्बिनी में छपने गई थी....भूल से यहाँ पहले छप गई....कृपया आप सब इसे कादम्बिनी के अगले अंकों में पढ़ सकते हैं....कविता छप रही है यह जानकारी मुझे पंकज पराशर जी ने दी है....
Friday, January 18, 2008
वे बड़े साधारण लोग थे
मैं खो गया हूँ
वे बड़े साधारण लोग थे..उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे...
किसी का नाम भगतिन था तो
किसी का ब्रह्म नारायण
एक और थी जिसका नाम सरिता था....
एक नें मुझे विन्ध्याचल की पहाडियों में खो जाने से बचाया।
अपने मुंडन के बाद मैं
पता नहीं कैसे चला जा रहा था पहाड़ियों की ओर
मुझे तो पता भी हीं था कि मैं भटक गया हूँ...
वे ब्रह्म नारायण थे मेरे पिता के बाल सखा
जिन्होंने मुझे देखा गलत दिशा में जाते
और ले आए वापस।
फिर मैं खो गया था मेले की अपार भीड़ में
बैठा था भूले – भटके शिविर में
नाम भी नहीं बता पा रहा था किसी को
कि मेरे गाँव की भगतिन ने देख लिया मुझे
झपट लिया मुझे उस खेमे में आकर
ले आई मां के टेंट में
जो घंटे भर से खोज रही ती मुझे जहाँ-तहाँ बिललाती।।
थोड़ा और बड़ा हुआ तो
खो गया एलनगंज में
अपने चाचा के डेरे पर आया था
बीमार ताई को देखने आई थी माँ
तो आ गया था मैं भी...
थक गया था खोज कर पर
नहीं मिल रही थी चाचा के घर की गली
वह तो सामने के फ्लैट में रहने वाली एक भली सी लड़की ने देखा
मुझे चौराहे की भीड़ में सुबकते
ले आई घर किसी को बताया भी नहीं कि
मैं खो गया था....नाम था उसका सरिता
तब वह बारहवीं में पढ़ती थी
किसी गणित के अध्यापक की बेटी थी।
एक बार तो डूब ही रहा था गाँव के सायफन में
खेतों को सींचने के लिए पानी की नाली का चमकता हुआ पानी
जाता था घर के बहुत पास से
सायफन पड़ता था घर के एकदम पिछवारे
उसी के तल में चमक रही थी एक दुअन्नी
जिसे पाने के लिए मैं उतर गया पानी में
दुअन्नी लेकर मैं डूब रहा था कि आ गए नन्हकू भगत
उन्होंने देख लिया मुझे डूबते
और निकाल लिया बाहर...
बच गया एक बार फिर
बचा लिया गया ऐसे ही कितनी बार खोने से डूबने से।
भाइयों और बहनों
पिछले कई सालों से खो गया हूँ मैं कहीं
डूब रहा हूँ कहीं
नहीं आ पा रहे मुझ तक ब्रह्म नारायाण
भगतिन का कुछ पता नहीं चल रहा
सरिता भी पता नहीं कहाँ है
कहाँ हैं भगत
मैं कह नहीं सकता।
वे बड़े मामूली लोग थे..
उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे ।
वे बड़े साधारण लोग थे..उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे...
किसी का नाम भगतिन था तो
किसी का ब्रह्म नारायण
एक और थी जिसका नाम सरिता था....
एक नें मुझे विन्ध्याचल की पहाडियों में खो जाने से बचाया।
अपने मुंडन के बाद मैं
पता नहीं कैसे चला जा रहा था पहाड़ियों की ओर
मुझे तो पता भी हीं था कि मैं भटक गया हूँ...
वे ब्रह्म नारायण थे मेरे पिता के बाल सखा
जिन्होंने मुझे देखा गलत दिशा में जाते
और ले आए वापस।
फिर मैं खो गया था मेले की अपार भीड़ में
बैठा था भूले – भटके शिविर में
नाम भी नहीं बता पा रहा था किसी को
कि मेरे गाँव की भगतिन ने देख लिया मुझे
झपट लिया मुझे उस खेमे में आकर
ले आई मां के टेंट में
जो घंटे भर से खोज रही ती मुझे जहाँ-तहाँ बिललाती।।
थोड़ा और बड़ा हुआ तो
खो गया एलनगंज में
अपने चाचा के डेरे पर आया था
बीमार ताई को देखने आई थी माँ
तो आ गया था मैं भी...
थक गया था खोज कर पर
नहीं मिल रही थी चाचा के घर की गली
वह तो सामने के फ्लैट में रहने वाली एक भली सी लड़की ने देखा
मुझे चौराहे की भीड़ में सुबकते
ले आई घर किसी को बताया भी नहीं कि
मैं खो गया था....नाम था उसका सरिता
तब वह बारहवीं में पढ़ती थी
किसी गणित के अध्यापक की बेटी थी।
एक बार तो डूब ही रहा था गाँव के सायफन में
खेतों को सींचने के लिए पानी की नाली का चमकता हुआ पानी
जाता था घर के बहुत पास से
सायफन पड़ता था घर के एकदम पिछवारे
उसी के तल में चमक रही थी एक दुअन्नी
जिसे पाने के लिए मैं उतर गया पानी में
दुअन्नी लेकर मैं डूब रहा था कि आ गए नन्हकू भगत
उन्होंने देख लिया मुझे डूबते
और निकाल लिया बाहर...
बच गया एक बार फिर
बचा लिया गया ऐसे ही कितनी बार खोने से डूबने से।
भाइयों और बहनों
पिछले कई सालों से खो गया हूँ मैं कहीं
डूब रहा हूँ कहीं
नहीं आ पा रहे मुझ तक ब्रह्म नारायाण
भगतिन का कुछ पता नहीं चल रहा
सरिता भी पता नहीं कहाँ है
कहाँ हैं भगत
मैं कह नहीं सकता।
वे बड़े मामूली लोग थे..
उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे ।
Monday, October 22, 2007
यह दिल्ली किसकी है ?


भारत हिंदुस्तान या इंडिया जो भी नाम हो इस देश का इसके इतिहास ही नहीं वर्तमान में भी दिल्ली की खास भूमिका रही है जिससे आप सब परिचित हैं। दिल्ली को लेकर हर दौर में बहुत सारी कविताएँ लिखी गई हैं। याद करें तो सबसे पहले दिनकर जी की कविता याद आती है। मैंने १९८७ में अवधी में एक कविता दिल्ली पर लिखी थी। पर लगता है कि दिल्ली की महिमा के लिए कई सारे संग्रह लिखने पड़ेंगे। पढ़े दिल्ली का गुनगान करती इस कविता को।
किसकी दिल्ली !
पाँच साल का बच्चा
गुमसुम मलता है बासन
यह कैसी किसकी दिल्ली
और कैसा किसका शासन।
ये सुंदर फूल पखेरू
जिनके कोटे का राशन
खाकर फूली है दिल्ली
मुसकाती देती भाषन।
यह कैसा दिवस, अंधेरा
छाया चौतरफा, जिसमें
बच्चे की छती पर
दिल्ली मारे है आसन।
रचनाकाल १६ मई २००१, मुंबई
Wednesday, October 17, 2007
मंगलेश डबराल की दो कविताएँ
हिंदी के महत्वपूर्ण कवि मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को उत्तरांचल के काफलपानी गाँव, टिहरी गढ़वाल में हुआ । मंगलेश जी साठवें वर्ष में प्रवेश कर चुके हैं। पुराना वक्त होता तो हम उनकी साठवीं सालगिरह का समारोह करते। पर अब यह सब कहाँ होता है। वे मेरे पसंद के कुछ एक कवियों में हैं। खास कर उनकी कविता संगतकार जिसे आप यहाँ पढ़ सकते हैं। उनकी कुछ प्रमुखकृतियाँपहाड़ पर लालटेन (1981); घर का रास्ता (1988); हम जो देखते हैं (1995)
उन्हें हिंदी के की बड़े सम्मान भी प्राप्त हैं जिनमें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान (1982); श्रीकान्त वर्मा पुरस्कार (1989) और "हम जो देखते हैं" के लिये साहित्य अकादमी पुरस्कार(२०००)
शमशेर जी का एक कथन है बात बोलेगी हम नहीं। तो यहाँ जो कुछ कहना है मंगलेश जी की कविता अपनी गवाही देगी। मैं कविताओं पर कुछ नहीं कह रहा हूँ। पढ़ें और अपने विचार व्यक्त करें।
दादा की तस्वीर
दादा को तस्वीरें खिंचवाने का शौक नहीं था
या उन्हें समय नहीं मिला
उनकी सिर्फ़ एक तस्वीर गंदी पुरानी दीवार पर टंगी है
वे शांत और गम्भीर बैठे हैं
पानी से भरे हुए बादल की तरह
दादा के बारे में इतना ही मालूम है
कि वे माँगनेवालों को भीख देते थे
नींद में बेचैनी से करवट बदलते थे
और सुबह उठकर
बिस्तर की सलवटें ठीक करते थे
मैं तब बहुत छोटा था
मैंने कभी उनका गुस्सा नहीं देखा
उनका मामूलीपन नहीं देखा
तस्वीरें किसी मनुष्य की लाचारी नहीं बतलातीं
माँ कहती है जब हम
रात के विचित्र पशुओं से घिरे सो रहे होते हैं
दादा इस तस्वीर में जागते रहते हैं
मैं अपने दादा जितना लम्बा नहीं हुआ
शान्त और गम्भीर नहीं हुआ
पर मुझमें कुछ है उनसे मिलता जुलता
वैसा ही क्रोध वैसा ही मामूलीपन
मैं भी सर झुकाकर चलता हूँ
जीता हूँ अपने को तस्वीर के एक खाली फ़्रेम में
बैठे देखता हुआ
(1990)
संगतकार
मुख्य गायक के चट्टान जैसे भारी स्वर का साथ देती
वह आवाज़ सुंदर कमजोर काँपती हुई थी
वह मुख्य गायक का छोटा भाई है
या उसका शिष्य
या पैदल चलकर सीखने आने वाला दूर का कोई रिश्तेदार
मुख्य गायक की गरज़ में
वह अपनी गूँज मिलाता आया है प्राचीन काल से
गायक जब अंतरे की जटिल तानों के जंगल में
खो चुका होता है
या अपने ही सरगम को लाँघकर
चला जाता है भटकता हुआ एक अनहद में
तब संगतकार ही स्थाई को सँभाले रहता है
जैसा समेटता हो मुख्य गायक का पीछे छूटा हुआ सामान
जैसे उसे याद दिलाता हो उसका बचपन
जब वह नौसिखिया था
तारसप्तक में जब बैठने लगता है उसका गला
प्रेरणा साथ छोड़ती हुई उत्साह अस्त होता हुआ
आवाज़ से राख जैसा कुछ गिरता हुआ
तभी मुख्य गायक को ढाढस बँधाता
कहीं से चला आता है संगतकार का स्वर
कभी-कभी वह यों ही दे देता है उसका साथ
यह बताने के लिए कि वह अकेला नहीं है
और यह कि फिर से गाया जा सकता है
गाया जा चुका राग
और उसकी आवाज़ में जो एक हिचक साफ़ सुनाई देती है
या अपने स्वर को ऊँचा न उठाने की जो कोशिश है
उसे विफलता नहीं
उसकी मनुष्यता समझा जाना चाहिए।
(रचनाकाल : 1995)
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