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Wednesday, October 3, 2007

एक उदात्त लोक गीत...

मई में गाँव गया था । दो गाँवों के लोक गायकों के बीच मुकाबला था । मेरे गाँव का गायक प्रहलाद प्रजापति हार रहा था तो चाचा जी ने कहा कि कुछ इसे जिताने लायक लिख दो। वहीं जन समुदाय के बीच यह गीत लिखा गया जो प्रहलाद को विजयी बना गया । यह अवधी गीत नुमा रचना विजय गीत भी है अब तो गीत शुद्ध रूप से मेरा है यह मेरा दावा है । दाम्पत्य का एक उदात्त रूप यहाँ दिखेगा। पहले गीत पढ़ें फिर उसका भावानुवाद।

तोहय फारि-फारि खाउब बलम जी


हमके पेड़ा- मिठाई न चाहे
तोहय फारि-फारि खाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ......

हमके गद्दा-रजाई न चाहे,
तोहय ओढ़ब बिछाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

हमके हार कंगन ना चाहे
तोहरे हाड़े गहना गढ़ाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

हमके सेन्हुर एंगुर न चाहे,
तोहरे राखे माँग भराउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

हमके साड़ी-पीताम्बर न चाहे,
तोहय चामे चुनरी बनाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

हमके सरग इन्द्रासन न चाहे
तोहरे छाती आसन जमाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

हमके न्योता हकारी न चाहे
तोहय कच्चा चबाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....

तोहरे जीते हम न मरबई
तोहरई बेवा कहाउब बलम जी। तोहय फारि-फारि ....।

गीत के बाद गद्यानुवाद.......

हमको पेड़ा मिठाई नहीं चाहिए। मैं तुम्हें ही फाड़-फाड़ कर खाऊँगी बलमजी।
हमको गद्दा-रजाई जैसे बिछौने भी नहीं चाहिए। तुम्हे ही बिछाऊँगी। हमको आभूषण भी नहीं चाहिए। तुम्हारी हड्डियों के गहने बनवाऊँगी। माँग में भरने के लिए सिंदूर भी नहीं चाहिए। तुम्हारी राख से माँग भरूँगी। हमको साड़ी की जरूरत नहीं है, तुम्हारे चमड़े से मैं मैं अपना चीर बना लूँगी। हमको इंद्रासन नहीं चाहिए, मैं तुम्हारी छाती पर आसन मारूँगी। मुझे कहीं जाकर नहीं खाना, तुम्हे ही कच्चा चबाऊँगी। तुम पहले मरोगे। उसके बाद ही मैं मरूँगी। तुम्हारी विधवा का खिताब मुझे ही मिलना है।

ऐसा अलौकिक प्रेम कहीं देखा है आप सब ने। अगर हाँ तो ठीक, नहीं तो देख लीजिए।

सावधान- ब्लॉगर पति अपनी पत्नी को यह गीत न पढ़वाएँ और ब्लॉगर पत्नियाँ अपने पतियों को जान कर भी इस उदात्त भावना के बारे में आगाह न करें। इति शुभम्।