Thursday, April 24, 2008

सज्जनता का नाश हो

सिर्फ चाहने से क्या होता है

हममें से बहुत सारे लोग इस गलत फहमी में जी रहे होते हैं कि दुनिया अच्छाई की कद्र करती है...भले मानुष का बहुत महत्व होता है......नेकदिल लोगों की इबादत की जाती है.....साधुता एक बहुत जरूरी गुण होता है .....दया माया ममता स्नेह सौहार्द्र सौम्यता सब की बडी आवश्कता होती होगी....पर किसी और समाज में ....आज तो टुच्चई ही पूज्य है वरेण्य है....। जो सीधा और शान्त है लोग उसे कायर और नाकारा समझते हैं....किसी ने कहा है-
बड़ो बड़ो कह त्यागिए छोटे ग्रह जप दान
यहाँ भी छोटे का अर्थ वही है टुच्चा। यानी अगर आप सीधे सरल हैं तो आप पिसने के लिए, लात खाने के लिए तैयार रहे.....कोई आप की सिधाई और सरलता को माला फूल लेकर पूजने नहीं आ रहा है....।

इलाहाबाद की याद बुरी तरह आती है....रोज ही या कहें कि हर पल याद करता हूँ....आजकल वहाँ के एक लेखक की जिंदगी साहित्य के इतर कारणों से चर्चा में है.... जीवन भर जम कर हिंदी की सेवा करनेवाले एक शानदार लेखक अमरकांत आर्थिक तंगी से जूझ रहे है....लेकिन उनकी दिक्कतों की किसे पड़ी है....जितने साल इस महालेखक ने साहित्य में दिए हैं उतने राजनीति में दिए होते तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि और कुछ होता या न होता अर्थ का अभाव तो शायद न होता....।
तो क्या अमरकांत जी यह आर्थिक बदहाली उनकी सिधाई और सरलता का परिणाम है.....अगर नहीं तो दर्जनों किताबों से हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध बनाने वाला एक लेखक किन्हीं भी कारणों से परेशान क्यों है....।

मेरा दृढ़ मत है कि हाँ अमरकंत जी ही नहीं किसी भी लेखक कलाकार की बदहाली उसकी सरलता का कुपरिणाम है....वैसे भी हिंदी समाज में लेखक का मतलब ही है फालतू जीव.....एक लेखक की कौन सुनता है...उसके कहे से कितनों को नौकरी मिल जाती है....कितनों का रुका हुआ काम बन जाता है....मन माफिक शहर में दबादला हो जाता है....वह एक ऐसा प्राणी होता है जो पैदा होते ही बोझ सा हो जाता है....
क्या होगा अमरकांत जी का कुछ लोग थोड़े दिनों तक हूँ....हाँ करेंगे....फिर चुप हो जाएँगे.....क्यों कि एक लेखक की मुश्किल कभी समाज की मुख्य चिंता नहीं बन पाती है.....और
उसके विचार उसे समाज में फैली लूट में शामिल नहीं होने देते और वह अपनी सैद्धान्तिक पिनक में समाज को सही दिशा में लाने के लिए कलम घिसता रहता है....व्यास, बाल्मीकी, कालिदास, तुलसी, कबीर , सूर, मीरा, निराला, प्रेमचंद, त्रिलोचन, नागार्जुन, मुक्तिबोध......सब ने यही किया उचित अनुचित का सवाल खड़ा किया...लूट में टूट कर शामिल नहीं हो गए.....और बिललाते रहे....रोते रहे....
जो भी बदलाव चाहेगा.....बहुत विचार-विचार करेगा....रोएगा....जिसे तर माल खाना हो.....दारोगा बनो....एक पंक्ति ठीक ने लिखना जानते हुए किसी चैनल या अखबार के संपाजक बनो....सत्ता की गलियों में पूछ हिलाने का अभ्यास करो.....विचार से बचो.....दुविधा से दूर रहो......न्याय का मान न लो....साधुता को दूर से सलाम करो.......फिर चाहे कहानी लिखो चाहे कविता....हर मंजिल पूछ से बधी रहेगी.....हर समारोह में जयकार होगी....

मैं निजी तौर पर हमेशा फालतू की सज्जनता को खारिज करता रहा हूँ....क्योंकि आज मेरा या हमारा समाज बहुतायत में बेइमान है.....अभय भाई का कहना सही है कि ऑटो रिक्शा वाले बेइमान है....पर वे अकेले नहीं है जो दाएँ-बाएँ से अपनी झोली भरना चाह रहे है...आज लूट एक राज धर्म है......और पकड़े न जाना एक सामाजिक कला.....जो पकड़ा नहीं गया वह चोर नहीं है....

इसीलिए कहता हूँ कि आज सारी नैतिकताएँ बोझ हैं.....जो सीधा सरल है वह दरअसल आत्म घाती है....सरलता शत्रु है.....सिधाई दुशमन है........समय है अपनी कोहनियों में खंजर बाँध कर दौड़ने का.....अगल-बगल वालों को न सिर्फ घायल कके पीछे छोड़ने का बल्कि लंगी मार कर गिराने का वक्त है...यह क्योंकि सिर्फ चाहने से कुछ नहीं होता.....साहित्य के विचारों को लागू करने वाले लेखक जब तक नहीं आएँगे.....तब तक यही होगा....विचार विचारणीय और सोचनीय बन कर रह जाएँगे....और लोग कहेंगे कि आदमी अच्छा था लेकिन बड़ा सीधा और विचारक टाइप का था....कुछ-कुछ साधुता से भरा.....
तो साधुता का नाश हो
सिधाई का नाश हो
सज्जनता का नाश हो.......

Sunday, April 20, 2008

याद आई वह लड़की


चिंह्न बचे होंगे क्या

याद आई वह लड़की
जिसकी अभिलाषा की थी कभी
याद आया
एक पेड़ के पैरों में जलता
निर्बल दिया ।

वे रातें
जिन्हें हम भुने आलू की तरह
जेबों में भरकर सो जाया करते थे
वे जगह-जगह जली हुई
चटख रातें
नमकीन धूल से भरी हमारी नींद
और वे तारे जो गंगा के पानी में
ठिठुरकर जलते रहते थे ।

कहीं गवाँ आया हूँ
इन सबको ।

ऎसा लगता है कि मेरे पास
कभी कुछ था ही नहीं
ऎसे ही खाली थी जेब
जी ऎसे ही फटा है पहले से ।

गंगा से इतना विमुख हो चला हूँ
कि जैसे उससे कोई नाता ही न हो
उसका रस्ता तक भूल गया हूँ
जैसे उसके तट तक
मझधार तक जाना न होगा कभी !

और वह लड़की
जो मेरे लिए थी स्लेट की तरह काली-कोरी
पड़ी होगी कहीं
किसी घर के कोने में
किसी विलुप्त हो चुके बस्ते की स्मृति में,
टूटकर उस पर
जो कुछ मैंने लिखा था कभी
उसके चिह्न बचे होंगे क्या
अब तक ।

नोट- इस कविता में कुछ संशोधन कवि-पत्रकार और अब ब्लॉगर विजय शंकर चतुर्वेदी के सुझाव पर किए गए थे। यहाँ मैं इसे कविता कोश से साभार छाप रहा हूँ।

Thursday, April 10, 2008

तिब्बत को देश मानने का साहस है क्या

अनिल कुमार सिंह हिंदी के उन कुछ कवियों में से हैं जो बेहद कम लिख कर भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। वे मेरे भूत पूर्व मित्र रहे हैं...और मित्रता का स्मरण रस अभी भी कभी-कभी मित्रता का गाढ़ा नशा पैदा करता है...उन्हें उनकी कविता अयोध्या १९९१ पर भारत भूषण अग्रवाल और उनके कविता संग्रह पहला उपदेश पर केदार नाथ अग्रवाल सम्मान प्राप्त है और आजकल वे फैजाबाद के एक महाविद्यालय में हिंदी की बिंदी ठीक कर रहे हैं...। उनके संग्रह पहला उपदेश की एक झलक यहाँ देख सकते हैं... चाह कर भी मैं अनिल की कोई फोटू नहीं साट पा रहा हूँ...पढ़े उनकी एक कविता जो कि तिब्बत पर उनका अपना पक्ष रखती है। वैसे आजकल वे अपनी इस कविता से सहमत नहीं है। ऐसा उन्होंने फोन पर हुई बात में बताया है।

तिब्बत देश

आम भारतीय जुलूसों की तरह
ही गुजर रहा था उनका हुजूम भी
‘तिब्बत देश हमारा है’ के नारे
लगाता हुआ हिन्दी में

वे तिब्बती थे यक़ीनन
लेकिन यह विरोध प्रदर्शन का
विदेशी तरीका था शायद
नारों ने भी बदल ली थी
अपनी बोली

एक भिखारी देश के नागरिक को
कैसे अनुभव करा सकते थे भला
वे बेघर होने का सन्ताप ?

अस्सी करोड़ आबादी के कान पर
जुओं की तरह रेंग रहे थे वे
पकड़कर फेंक दिए जाने की नियति से बद्ध
दलाईलामा तुम्हारी लड़ाई का
यही हश्र होना था आखिर !

दर-बदर होने का दुख उन्हें भी है
जो गला रहे हैं अपना हाड़
तिब्बत की बर्फानी ऊँचाइयों पर
उन्हें दूसरी बोली नहीं आती
और इसीलिए उनकी आहों में
दम है तुमसे ज़्यादा
दलाईलामा !

वे मुहताज नहीं है अपनी लड़ाई के लिए
तुम्हारे या टुकड़े डालने वाले
किन्हीं साम्राज्यवादी शुभचिन्तकों के
वे लड़ रहे हैं तिब्बत के लिए तिब्बत में रहकर ही
जो धड़कता है उनकी पसलियों में
तुम्हारे जैसा ही
कोई क्या बताएगा उन्हें
बेघर होने का सन्ताप दलाईलामा !

Friday, April 4, 2008

लौट गए पिता, मैं जवानी सेता रहा

परसों अभय भाई आए थे...बातों-बातों में पिताओं का जिक्र आया। हम दोनों पिता हीन हैं...और माँ से दूर हैं...परसों की बात के दौरान मैंने अपने पिता के मरन की बात की...। उसी संदर्भ में एक ताजी और दो पुरानी कविताएँ छाप रहा हूँ...पिताओं को श्रद्धांजलि हैं यह।

(१)
कोई चिह्न नहीं है
पिता
अब घर में कोई चिह्न नहीं है तुम्हारा
सब धीरे धीरे मिट गया
कुछ चीजों को ले गए महापात्र
कुछ जला दीं गईं
तुम्हारा चश्मा पड़ा रहा तुम्हारे तहखाने में
कई महीने
फिर किसी ने उसे
गंगा में प्रवाहित कर दिया ।

तुम्हारे जूते
तुम्हारी घड़ी
तुम्हारी टोपियाँ सब कहाँ खो गईं जो
खोजने पर भी नहीं मिलतीं।

जब तुम थे
तब घर कैसे भरा था तुम्हारी चिजों से
हर तरफ तुम होते या तुम्हारी चीजें होतीं....
कितने तो गमछे थे तुम्हारे
कितने कुर्ते
कितनी चुनदानियाँ
कितने सरौते...
पर खोजता हूँ तो कुछ भी नहीं मिलता घर में कहीं
जैसे किसी साजिश के तहत तुम्हारी चीजों को
मिटा दिया गया हो।

ले दे कर बस एक चीज बची है
जो लोगों को दिलाती है तुम्हारी याद
वो मैं हूँ....तुम्हारा
सबसे छोटा बेटा।

पता नहीं क्यों लोग मुझे नहीं करते प्रवाहित
नहीं कर देते किसी को दान।
(४ अप्रैल २००८)

(२)
लौट गए पिता
आए थे पिता
कुछ-कुछ उदास
कुछ-कुछ हताश।

लौट गए पिता
बिल्कुल उदास
बिल्कुल हताश।

(2)
क्यों
गाँव में
पड़ा होगा सोता
बेराते होंगे पिता
धान में पानी

मैं यहाँ पर
बंद घर में
से रहा हूँ
जवानी !
-सिर्फ कवि नहीं से दो कविताएँ ।
रचना समय- १९८७-८८ में कभी।
शब्दार्थ-
सोता=जब सब सो जाएँ, बेराना=सींचने की प्रक्रिया, से रहा हूँ=पोस रहा हूँ, जैसे मुर्गी अंडे सेती है।

Wednesday, March 26, 2008

मुंबई में इलाहाबाद की खोज

मुंबई में इलाहाबाद की खोज

जब तक इलाहाबाद में रहा तब तक वहाँ अपने गाँव को खोजता रहा...अब मुंबई में हूँ तो यहाँ गाँव और इलाहाबाद दोनों को खोज रहा हूँ....और दोनो नहीं मिलते...।
इलाहाबाद से गाँव नजदीक था तो मौका मिलते ही चंपत हो लेता था...मेरे लिए गाँव जाना घरूमोह की तरह नहीं था...मैं गाँव जाता था....क्योंकि वहाँ गए बिना कोई चारा नहीं था....मैं यहाँ किसी तरह की सफाई देने नहीं आया हूँ कि मैं बड़ा गाँव भक्त और देशी टाइप का आदमी हूँ....मेरी आत्मा पल -पल गाँव के लिए तड़पती है यह कहने के लिए भी यहाँ हाजिर नही हुआ हूँ....

बस गाँव की याद आ रही है....गाँव के वो पेड़ याद आ रहे हैं जो एक-एक कर गिरते जा रहे हैं....मिठवा भी गिर गया, माँ बता रही थी.....संतरहवा भी कभी भी गिर सकता है....सेन्हुरहवा भी सूख गया....अमवारी लगभग खाली हो गई है...वही हाल महुआरी का भी है...सब कुछ सूख रहा है गाँव में और मैं लगभग १५०० किलोमीटर दूर बैठा केवल गाँव को याद कर रहा हूँ....उसके बारे में लिख रहा हूँ...
कभी। मैंने अपनी एक कविता में लिखा था कि मेरी कजरारी सीपी सी आँखों में बसा है मेरे गाँव का नक्शा...२२ साल बीत गए हैं गाँव को छोड़े पर आज भी मेरी आँखों में बसा है मेरा गाँव। १९८६ के मार्च अप्रैल में गाँव से विदा विदाई की स्थिति बननी शुरू हुई थी....जून में जाकर यह तय हो गया कि मैं इलाहाबाद जाऊँगा...पढ़ने....और गाँव छूट गया....

और जो चीज अनचाहे छूटती है वह बहुत याद आती है...

इस समय वहाँ आम बौरा गए होंगे....टिकोरे हवा की मार रहे से कभी कदा धरती पर आभी जाते होंगे...कोयल की कूक गूँजती होगी.....उस कूक की हूक मैं यहाँ तक सुन रहा हूँ....खलिहान में साफ सफाई हो रही होगी....गेहूँ कटेंगे....मड़ाई के उत्साह से मन मगन होगा और खलिहान के ऊपर बादल का एक छोटा टुकड़ा भी सब को डरा जाता होगा....

किसान का बेटा हूँ....हल चलाया है ....बीज बोए हैं...खेत तक अपनी मेहनत से पानी पहुँचाया है...जाग कर अपने खेतों की रखवाली की है...छुट्टे साड़ों को खेतों से खदेड़ा है...मेंड़ पर खड़े रह कर सिर्फ खेतों के नजारे नहीं लिए हैं....हंसुआ पकड़ कर गेहूँ-धान और गड़ासे - दराती से गन्ना अरहर काटा है....अरहर की खूठियों ने पैरों में न जाने कितने घाव किए....और हमने सब सहा.....

भाषा के व्याकरण से अधिक जीवन के छंद से लड़ना पड़ा है....और गा की याद उस लड़ाई की याद है जो अभी भी जारी है....वह मेरे अतीत की समाधि अभी नहीं बनी है....अभी उसको श्रद्धांजलि देने का समय नहीँ आया है....कोयल की कूक यहाँ भी सुनाई पड़ जाती है....पर वह किस पेड़ पर है यह नहीं समझ में आता....कल भोर में यहाँ कोई कोयल कूकती रही....मैं परेशान हो गया कि यह कहाँ कूक रही है...क्या यहाँ भी.....कोई गाँव है....अगर मैं परदेशी हूँ तो यह गाँव किसी का तो होगा....वे कौन लोग हैं....जिनके गाँव में मैं बस गया हूँ....मुंबई में मेरा घर चारकोप गाँव में पड़ता है.......पर यहाँ तो अब केवल कागज में गाँव लिखा है....मुंबई में कई गाँव हैं....जैसे गोरे गाँव, नाय गाँव, तो ठाकुर विलेज है...

रात में कूकने वाली उस कोयल को नहीं पता होगा कि वह जहाँ कूक रही है...वह अब गाँव नहीं एक महानगर का भाग है....और उसके इलाके में बहुत सारे परदेशी आ बसे हैं....नागरिकता ले ली है...और भगाए जाने पर भी भागने को राजी नहीं हैं....शायद चारकोप गाँव के मूल लोग जान पाते होंगे कि वह कोयल किस पेड़ पर हूक रही थी....या कूक रही थी....

सच बात है अपने गाँव के हर कोने अतरे से हम परिचित होते हैं....यहाँ तो दूसरी बिल्डिंग के लोगों को अब तक नहीं जान पाया हूँ और शायद जान भी न पाऊँ.....पर गाँव भिखारी राम पुर या इलाहाबाद तक में ऐसा नहीं था.....वहाँ भी अल्लापुर के बाघम्बरी गद्दी में पंछियों के कलरव अपने थे...वहाँ भी...बहुत सारे घरों की छौकन बघारन पहचानी सी थी...किस लड़की को देखने किस शहर से कोई आया है यह तक पता चलता रहता था....लेकिन यहाँ कुछ भी नहीं नहीं समझ में आता.....

मेरे गाँव में पिछले ३०० साल से कोई बाहरी आदमी नहीं बसा है....लेकिन बनारस में बाहर से लोग बसे हैं और बसेंगे....इलाहाबाद में बसेंगे....भिखारी राम पुर में कोई क्यों बसेगा....जब वहाँ का होके मैं वहाँ नहीं रह रहा हूँ....

तो भाई लोंगो...गाँव की याद आ रही है....और मैं यहाँ फंसा हूँ...जैसे बंदर चने की हाँड़ी में मुट्ठी बाँद कर फंसता है....यहाँ न इलाहाबाद मिल रहा है न गाँव...बस दोनों की याद दिलाने वाली कोयल किसी अनजान पेड़ पर कूक रही है....चाह कर अभी गाँव नहीं जा सकता...

Friday, March 21, 2008

हिंदी के ब्लॉगर सभी हिंदी के सौभाग।।

होली आज हो या कल उससे क्या फरक पड़ना। सब सबके गले मिलें लेकिन गला दबाने के लिए नहीं...सब सब से बात करें लेकिन गाली देने के लिए नहीं...आज .सब सब याद करें लेकिन सुपारी देने के लिए नहीं...होली मुबारक हो।

होली के होहे।।

होली आई देख के फुरसतिया हैरान
शिव जी भी हैरान है हलचल में हैं ज्ञान।।
निर्मल ज्ञान बिख्रेर कर सोते अभयानन्द
अजदक की गठरी फटी, ठुमरी पड़ गई मंद।।
हिंदुस्तानी डायरी रचें अनिल रघुराज
पौराणिक के पृष्ठ पर किसका झंडा आज।।
अनहद नाद अलोप हैं, सुन्न पड़े इरफान
शब्द खोजते थक गए बडनेकर बलवान।।
युनुस का बाजा बजे, सुनते अफलातून
कौन कबाड़ी ले रहा कविता एवज नून ।।
रतलामी के राज में खोए से संजीत
न काहू के शत्रु हैं दुनिया भर के मीत।।
अ आ करके मस्त है अरुणादित्य महान
कविता-सविता छापते हरे पराशर ज्वान।।
उड़न तश्तरी फिर रही भारत औ ब्रह्मांड
अवधिया फैला रहे मुफ्त हकीमी कांड।।

हल्ला था आशीष का, निकला वहाँ भड़ास
आठ आने की आस थी मिली चवन्नी खास।.
चोखेर बाली में छपे बेदखली के बचन
वांगमय में खो गए लाल विशाले-बयन
।।
लिंकित मन में घुल गया मसिजीवी का इंक
ममता अनिता से बना अपना घर का लिंक।।
घुघूती के घर में गया बेजी का पैगाम
बचते-बचते हो गया विनय-पत्र बदनाम।।

भूले-बिसरे मित्र सब शत्रु हो गए आज
होली आई देख के विष्णु-शिव भए आज।।
लावन्यान्तर्मन हो या विस्फोटी संजयान
पहलू बदल-बदल कर बिखर रहे इरफान।।
सबके मन में जल रही बड़ी होलिका आग
हिंदी के ब्लॉगर सभी हिंदी के सौभाग।।


नोट-
जो लोग यहाँ नामांकित होने से रह गए हों वो अपना समझ कर होली की गोली मार सकते हैं...आज सब कुछ झेलने के लिए तैयार हूँ...।

Tuesday, March 18, 2008

माँ की चुप्पी


मैंने माँ पर करीब दर्जन भर कविताएँ लिखी हैं....और अभी भी लगता है कि माँ के दुख को और संघर्ष को रत्ती भर भी नहीं कह पाया हूँ....कई साल पहले पिता जी और माता जी को लेकर एक उपन्यास लिखना शुरू भी किया था...करीब छब्बीस अध्याय लिखे भी हैं...पर अभी साल दो साल उसे पूरा कर पाने की स्थिति नहीं दिख रही है....इस बीच में माँ से जुड़े साहित्य का संपाजन किया है जिसमें कविता के दो खंड और विचार और निबंध आदि का एक खंड यानी कुल तीन खंड बने हैं....मातृदेवोभव नाम से यह सब संकलन इन दिनों प्रकाशन की प्रक्रिया में है.....आज पढ़ें मेरी एक पुरानी धुरानी कविता। यह कविता उस संकलन में नहीं है....

विदा के समय

विदा के समय
माँ मेरा माथा नहीं चूमती

चलते समय
कोई विदा-शब्द नहीं बोलती
न ही मेरे चल देने पर
हाथ हिलाती है।

जब मैं
कहता हूँ कि
जा रहा हूँ मैं-
माँ के पास
करने और कहने को
कुछ नहीं होता

और वह
और चुप हो जाती है।

नोट- यह कविता मेरे पहले संग्रह "सिर्फ कवि नहीं" से है।

Saturday, March 8, 2008

झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....

पत्नी को आजादी मुबारक

कल का दिन मेरे लिए बड़ी अजीब खुशी देनेवाला और दुविधा भरा था....खुशी की बात यह थी कि मेरी पत्नी आभा ने अपनी कविता न सिर्फ पूरी खुद से टाइप की बल्कि अपने से अपने ब्लॉग अपनाघर पर उसे प्रकाशित भी किया....दुविधा की बात यह थी कि उसने इस काम में मेरी कोई मदद नहीं ली....इस पोस्ट के पहले वह अक्सर मेरी मदद लेती थी कम से कम टाइप करने में....मैं उसकी पोस्ट टाइप करने में एक बुद्धिजीवी या कहें कि पति या मित्र या पुरुष की हैसियत से टोका-टाकी किया करता था.....और अक्सर उसे मेरी बेवजह की अड़ंगेवाजी झेलनी पड़ती थी....लेकिन कल उसने भूल और गलतियों की परवाह न करते हुए अपनी पोस्ट चढ़ा दी और मुझे बताया भी नहीं....

पता नहीं किस दुविधा के चलते मैंने कभी उसके लेखन को बहुत मन से उत्साहित नहीं किया...जबकि वह मुझसे पहले से लिखती रही है....यही नहीं...पिछले पंद्रह सालों से मैं अपनी हर कविता उसे सुनाकर उसके सहज सुलभ सुझावों से अपनी रचनाशीलता को बेहतर बनाता रहा हूँ....

लेकिन कल दिन में आभा ने खुद मुख्तारी का ऐलान कर दिया....और मुझे पता भी नहीं चला....जब हमेशा की तरह मैंने ब्लॉग का पन्ना खोला तो उसकी कविता देख कर चकित रह गया.....और मेरे मन में पहला सवाल आया कि गुरू यह तो सच में क्रांति हो गई....लेकिन मैं सच कहूँ....मैं.बहुत खुश हुआ....उसे फोन करके बधाई दी....उसकी पोस्ट को पसंद भी किया....वह बहुत खुश थी....
उसकी बातों में स्वतंत्रता की खुशी और खनक थी....मैं फोन पर उसके चमकते अनार दाना दंत पंक्तियों को देख रहा था....मैं उसकी आँखों में एक आत्मबल की चमक महसूस कर रहा था....एक ऐसी चमक जो यह उद्घोष करती है कि हम तुम्हारे आधीन अब नहीं हैं.... हम तुम्हारे साथ हैं सहचर हैं....गुलाम नहीं हैं....पत्नी हूँ....बोझ नहीं हूँ.....मैं भी हूँ....सिर्फ तुम ही तुम नहीं हो....बच्चू....

मुझे ऐसी ही खुशी और दुविधा तब भी हुई थी....जब मैंने आभा को पहली बार गाड़ी चलाते हुए देखा था...मैं सच कहूँ जब हम इलाहाबाद में साथ पढ़ते थे....और हमरा प्यार एकदम नया था..... तब मेरी बड़ी इच्छा .थी आभा को सायकिल चलाते देखने की...पर वहाँ उसने सायकिल चलाकर नहीं दिखाया......
सायकिल न सही कार ही सही...मित्रों अपने से अपनी गति और दिशा तय करना बड़ी विलक्षण बात होती है....और मेरी पत्नी मेरी एकमात्र सखी ने उस विलक्षणता को पा लिया है....और मैं अपनी सब दुविधाओं को दूर करके उसे बधाई देता हूँ......मैं कामना करता हूँ कि वह और अच्छा और बेहतर लिखे....वह अपने उन तमाम अनुभवों को लिखे जो कि वही लिख सकती है....मुझे उसके लिखे का इंतजार रहेगा.... वह उड़ान भरे ...गिरने की परवाह....न करे....या यह कि आभा .....
झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....

चलते-चलते अपने ब्लागर मित्रों से पूछना चाहूँगा कि भाई....तुम्हारे ब्लॉग पर कभी तुम्हारी पत्नी का नाम-चेहरा-दुख-सुख क्यों नहीं झलकता...क्या उसकी स्वतंत्रता को लेकर कोई दुविधा है तुम्हारे सामंती मन में.....क्या ब्लॉग की अनंत खिड़की पर भी तुमने अपना पैत्रिक अधिकार समझ लिया है....क्या यहाँ भी तुम्हारी बपौती है....

भाई...अगर अपनी पत्नी को स्वतंत्र नहीं कर सकते तो...समाज के तमाम तबकों की आजादी समता समन्वय की बातें खोखली नहीं हैं....तुम्हारा सारा प्रगतिबोध आत्मोत्थान का उपादान या सोपान भर नहीं है....या यह तुम्हारा प्राचीन पर्दा प्रथा को शहर के कमरों में जिंदा रखने का एक सोचा-समझा खेल है....क्या है भाई...बताओ....मैं तुम्हारा पक्ष सुनना चाहता हूँ....

आगे.........लगातार.....

Thursday, March 6, 2008

किसका भारत, किसकी भारती ?

कुछ दिन हुए मुंबई में चर्चगेट की तरफ गया था....वहीं हुतात्मा चौक की ओर जा रही सड़क के कोने पर यह दृश्य दिखा...जिस पर मैं अभिशप्त हूँ लिखने को....कभी-कभी लगता है लिखने से कुछ बदलने वाला नहीं....फिर भी हम लिखते हैं....इस उम्मीद पर कि शायद लिखने से कुछ बदल ही जाए। आप पढ़ें...।

भारत-भारती

उधड़ी पुरानी चटाई और एक
टाट बिछाकर,
छोटे बच्चे को
औधें मुँह भूमि पर लिटा कर।

मटमैले फटे आँचल को
उस पर फैला कर
खाली कटोरे सा पिचका पेट
दिखा कर।

मरियल कलुष मुख को कुछ और मलिन
बना कर
माँगने की कोशिश में बार-बार
रिरिया कर।

फटकार के साथ कुछ न कुछ
पाकर
बरबस दाँत चियारती है
फिर धरती में मुँह छिपाकर पड़े बच्चे को
आरत निहारती है ।

यह किस का भरत है
किस का भारत
और किस की यह भारती है।

नोट- यह कविता विष्णु नागर जी के संपादन में कादम्बिनी में छपने गई थी....भूल से यहाँ पहले छप गई....कृपया आप सब इसे कादम्बिनी के अगले अंकों में पढ़ सकते हैं....कविता छप रही है यह जानकारी मुझे पंकज पराशर जी ने दी है....

Saturday, February 23, 2008

साल भर में क्या उखाड़ा...उर्फ ब्लॉगमारी

ब्लॉगमारी के एक साल

(सब दोस्तों को सलाम, कल से मैं अपनी विनय-पत्रिका शुरू कर रहा हूँ.......पढ़ो और बताओ...... इसे शुरू करवाने के पीछे हैं अविनाश, अभय तिवारी, चैताली केलकर,अनिल रघुराज....और मैं खुद...नामकरण आभा ने किया है.......)

2 टिप्पणियाँ: अभय तिवारी said...

स्वागत है...अंदर की छपास की आग को फ़टाफ़ट ठंडा करते हुये ब्लॉग की दुनिया मे आग लगाते रहो। February 24, 2007 2:48 AM

Sanjeet Tripathi said...

ब्लॉग-जगत में आपको देखकर खुशी । शुभकामनाएँ

(यह मेरी पहले दिन की पहली पोस्ट थी...और उसपर मिली थी अभय भाई और संजीत जी की टिप्पणियाँ...आज एक साल पूरा हो गया....है विनय पत्रिका शुरू किए...। ऐसे दिन मैं अपनी पहले दिन प्रकाशित कुछ चिंदियों को फिर से छाप रहा हूँ...आपने उन्हें फिर से पढ़ें...।

कुछ दोहे

( ये दोहे कभी किसी ने मुझे भेंजे थे, नाम उसका शायद नवल किशोर था । आप भी इन्हें पढ़ें और .....)

उठते हुए गुबार में, काले - दुबले हाथ,

बुला-बुला कर कह रहे, चलो हमारे साथ ।

घुलते- घुलते घुल गई, कैसे उसकी याद,

कौन सुने किससे करें, सुनने की फरियाद ।

दिन डूबा गिरने लगी, आसमान से रात,

एक और भी दिन गया, बाकी की क्या बात ।

सूरज के आरी-बगल, धरती घूमें रोज,

अपने कांधे पर लिए मेरा-तेरा बोझ ।

पसंद के कुछ शेर

भगवान तो बस चौदह बरस घर से रहे दूर

अपने लिए बनबास की मीआद बहुत थी । ज़फ़र गोरखपुरी

मुहब्बत, अदावत, वफ़ा, बेरुख़ी

किराए के घर थे, बदलते रहे । बशीर बद्र

विनय पत्रिका का मूल्यांकन आज नहीं कभी फिर....हाँ आप कर सकते हैं...कि मैंने क्या किया क्या करूँ...

Monday, February 18, 2008

विष रस भरा घड़ा था बोधिसत्व

मैं किसी को प्रिय क्यों नहीं हूँ

पिछले कई सालों से लगातार एक बात महसूस कर रहा हूँ....कि मुझे.
चाहने वालों की संख्या में तेजी से कमी आई है । कभी-कभी तो लगता है कि कोई है ही नहीं जो मुझे चाहता हो....।

वे जो चाहने का दावा करते हैं...मजबूर हैं...उनके पास कोई विकल्प नहीं है....मैं बात अपनी पत्नी और बच्चों की कर रहा हूँ...अगर मध्यकाल में मैं रहा होता तो अब तक सब मुझे छोड़ कर चले गए होते...। बेचारे क्या करें...।

कभी-कभी लगता है कि माँ मुझे चाहती है...पर वह अगर मैं फोन न करूँ तो वह कभी फोन नहीं करती...बस चुप रहती है...
उसे मोक्ष चाहिए...वह जीना नहीं चाहती...अगर वह मुझे प्यार कर रही होती तो मोक्ष के बारे में सोचती...। उसे पिता के पास जाना है...। निर्मोही पिता संसार छोड़ कर चले गए हैं..वह भी चली जाना चाहती है....। अब मैं उसका संसार नहीं हूँ...कभी हुआ करता था...
पिता मुझे बहुत चाहते थे....लेकिन अपने अंतिम दिनों में मुझे अपने पास नहीं रहने देते थे...जब मैं उनसे बहुत दुलराता था तो वे मुझे इलाहाबाद भगा देते थे...।
और बहुत साफ-साफ कहते थे मेरे दिन पूरे हुए....।

सच है कि मैं न अच्छा बेटा बन पाया हूँ...न भाई...न पति न पिता न लेखक न कवि...लगातार लग रहा है कि सब अधकचरा है...सारा जीवन....सारा काम ...सारा लेखन....सारे संबंध....
यह बात दोस्तों के बुझे व्यवहार से भी मुझे महसूस होती है...कि मैं कभी अच्छा मित्र नहीं बन पाया.....खोट है मुझमें....मैं कभी पूरी तरह समर्पण नहीं करता....थोड़ा आलोचनात्मक बना रहता हूँ...दिन को रात नहीं कह पाता....या हाँ में हाँ...नहीं कर पाता...तभी तो जिन मित्रों के साथ कभी 22-22 घंटे इलाहाबाद में या गाँव में रमा रहता था...वे बड़ी कठिनाई से बात कर पाते हैं वह भी महीनों-महीनों बाद....।

मैं दावे से कह सकता हूँ...कि अपने परिचितो और मित्रों को सबसे अधिक मैं फोन करता हूँ.....कई बार ऐसा मन करता है कि जाने दो साले को जब वह नहीं कर रहा है तो मैं ही क्यों करूँ....पर करता हूँ....हाल लेता हूँ...देता हूँ...
जो भी मेरे मित्र इस खत को पढ़ें अगर मेरी बात गलत लगे तो....बोलें....मैं उनको सुनने को तैयार हूँ....
अरे चिरकुटों मैं ही नहीं तुम सब भी अजर-अमर नहीं हो....क्या सोचते हो....यहीं रहोगे...और ऐसे ही मुह फुलाकर भटकते रहोगे....और बस। एक दिन एक खबर आएगी बोधिसत्व नहीं....रहा....फिर यह होगा कि तुम नहीं रहोगे....
भाई यह देस बिराना है....।

मगर तुम मेरे लिए दो आँसू बहाने की जगह कहोगे.....बोधिया......नहीं रहा....। मन में कहोगे चूतिया चला गया....। हरामी कभी समझ में ही नहीं आया....जितना बाहर का मिठास था सब दिखावा था उसका...साला अंदर से बड़ा जहर का पीपा था...खूसट ...। विष रस भरा कनक घट था.......कमीना.....। इससे अधिक गाली तो तुम दे नहीं पाओगे...। ब्लॉग जगत में एक गाली विरोधी एक दस्ता है...जो मन की घृणा को अंदर-अंदर पकाता खाता है.... और जब बाहर आती है तो गाली एक दम गुल-गुला हो जाती है....।
पर मैं मानता हूँ....कि मैं बहुत सीधा और सरल नहीं हूँ...या मैं मिट्टी का माधो नहीं हूँ...तुम कह सकते हो...कि मैं बहुत जटिल हूँ...बहुत उलझा हुआ....भी।
हाँ....मैं झगड़ालू हूँ...पर चिरकुट नहीं हूँ...
मैं मक्कार नहीं हूँ....और मेरे लिए भरोसा तोड़ना हत्या से बढ़ कर है....।
मैंने कभी मक्कारी नहीं की है....किसी के भी साथ.....फिर भी आज कल लगातार लग रहा है कि मुझे कोई नहीं चाहता....शायद कुछ लोग हों जो मेरे मरने की हुआ करते हों....उनकी कामना पूरी हो मैं उनके लिए दुआ करूँगा क्यों कि मैं उन्हें प्यार करने की सोचता हूँ....।

Tuesday, February 5, 2008

लड़ कर मरना बेहतर होगा

मैं मुंबई क्यों छोड़ूँ ?

भाई चाहे राज कहें या उनके ताऊजी मैं तो मुंबई से हटने के मूड में एकदम नहीं हूँ..... मैं ही नहीं मेरे कुनबे के चारों सदस्य ऐसा ही सोचते हैं...लेकिन हम सब और खास कर मैं किसी राज ठाकरे या उसके गुंड़ों से मार ही खाने के लिए तैयार हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे पास कोई फौज नहीं है न ही कोई समर्थकों का गिरोह ही। मैं तो अभी तक यहाँ का मतदाता भी नहीं हुआ हूँ...बस रह रहा हूँ और आगे भी ऐसे ही रहने का मन है.....

जो लोग मुंबई को अपना कहने का दंभ दिखा रहे हों...वो सुन लें...
कभी भी अगर बीमार न रहा होऊँ तो १५ से १७ घंटे तक काम करता हूँ...इतनी ही मेहनत हर उत्तर भारतीय यहाँ करता है...वे या मैं किसी भी राज या नाराज ठाकरे या उनके मनसे के किसी सिपाही से कम महाराष्ट्र या मुंबई को नहीं चाहते हैं... अगर उनके पास कोई राज्य भक्ति को मापने का पैमाना हो तो वे नाप लें अगर उनसे कम राज्य भक्त निकला तो खुशी से चला मुंबई से बाहर चला जाऊँगा....

लेकिन अगर मेरे मन में कोई खोट नहीं है और मैं एक अच्छे शहरी की तरह मुंबई को अपना मानता हूँ तो मैं अपनी हिफाजत के लिए गोलबंद होने की आजादी रखता हूँ....अगर हमें खतरा लगा तो बाकी भी खतरे में ही रहेंगे...

क्योंकि
तोड़- फोड़ के लिए बहुत कम हिम्मत की जरूरत होती है....लूट और आगजनी से बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती....रास्ते में जा रहे या किसी चौराहे पर किसी टैक्सी वाले को उतार कर पीटना और उसके रोजीके साधन को तोड़ देना तो और भी आसान है....

मैं यह सब कायरता भरा कृत्य करने के लिए गोलबंद नहीं होना चाहूँगा बल्कि मैं ऐसे लोग का मुँह तोड़ने के लिए उठने की बात करूँगा जो हमें यहाँ से हटाने की सोच रहे हैं....

मेरा दृढ़ मत है कि उत्तर बारत के ऐसे लोगों को आज नहीं तो कल एक साथ आना होगा .....उत्तर भारतीयों को एक उत्तर भारतीयों को सुरक्षा देने वाली मनसे के गुंड़ो को मुहतोड़ उत्तर देने वाली उत्तर सेना बनाने के वारे में सोचना ही पड़ेगा....


जो लोग आज भी मुंबई में अपनी जातियों का संघ बना कर जी रहे हैं....मैं उन तमाम जातियों को अलग-अलग नहीं गिनाना चाहूँगा....उत्तर भारत से बहुत दूर आ कर भी आज भी बड़े संकीर्ण तरीके से अपने में ही सिमटे हुए लोगों से मैं कहना चाहूँगा कि
...
आज जरूरत है सारे उत्तर भारतीयों को एक साथ आने की जिन्हें यहाँ भैया कह कर खदेड़ा जा रहा है....
उनमें अमिताभ बच्चन भी हैं जो कि अभिनय करते हैं...और शत्रुघन सिन्हा भी
उनमें हसन कमाल भी हैं...जो कि लिखते हैं...और निरहू यादव भी जो कि सब कुछ करते हैं.........
उनमें राम जतन पाल भी हैं जो किताब बेंचते हैं और सुंदर लाल भी जो कि कारपेंटर हैं...
जिनका दावा है कि हम काम न करें तो मुंबई के आधे घर बिना फर्नीचर के रह जाएँ......

तो आज नही तो कल होगा.....
संसाधनों के लिए दंगल होगा....

और इसके लिए तैयार रहने को मैं कायरता नहीं मानता। ऐसा मैं अकेला ही नहीं सोच रहा ऐसे लाखों लोग हैं जो अपनी मुंबई को छोड़ने के बदले लड़ कर मरना बेहतर समझेंगे।

Wednesday, January 30, 2008

हिचकियाँ बता रही हैं कि कोई मुझे याद कर रहा है

अपनी खुशी के लिए लिखता हूँ

पिछले कई दिनों आभा यानी मेरी पत्नी मेरे पीछे पड़ी हैं कि तुम महीने में एक पोस्ट लिख कर ब्लॉग जगत में जिंदा कैसे रह सकते हो। लगातार न लिखो तो भी महीने में कम से कम सात-आठ पोस्ट तो लिखो। देखो सब कितना लिख रहे हैं..

सो आज जो कुछ लिख रहा हूँ..आभा की चिंता से । कुछ लोग कह सकते हैं कि बोधिसत्व ने अपने ब्लॉग पर अपने परिवार की फोटो ही नहीं लगा रखी है वे तो पोस्ट भी अपनी पत्नी के कहने से छापते हैं...

ऐसे विघ्न संतोषी लोगों को मैं या कोई भी क्या कह सकता है...मुझे उनकी परवाह नहीं है॥क्यों कि मैं अपनी खुशी के लिए लिखता हूँ मुझे किसी से कोई दिशा निर्देश नहीं चाहिए...लिखने पढ़ने या अभिव्यक्ति के मामले में किसी को नसीहत देने को मैं अभिरुचि की तानाशाही मानता हूँ। और कैसी भी तानाशाही का समर्थन कोई भी कैसे कर सकता है अगर वह जिंदा है। वही व्यक्ति हर तरफ अपने मन का होता देखना चाहेगा जिसके अंतर में एक बीमार तानाशाह रहने लगा हो वही दूसरों को ताना भी मार सकता है कि ऐसा लिखो और ऐसा दिखो।

दोस्तों आज सुबह से लगातार हिचकी आ रही है। पानी पीकर हिचकी को शांत करने की कोशिश की लेकिन कामयाबी न मिली। हिचकी शांत करने का और कोई उपाय जानता नहीं हूँ क्या करूँ । कुछ लोग हिचकी को छींक की तरह अनैच्छिक क्रिया मान सकते है। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा है।

मुझे लग रहा है कि कोई मुझे याद कर रहा है। पत्नी कह रही है कि मैं तो यहीं हूँ फिर कौन याद कर रहा है...मेरी उलझन देख उसी ने फिर कहा कि हो सकता है माता जी याद कर रही हों। मां को फोन किया वो सच में याद कर रही थी । उसने कहा कि वह मुझे हर पल याद करती रहती है...।

उससे बात करने के बाद भी हिचकी आती जा थी...तो बारी-बारी से अपनी बहनों और भाइयों और भाभियों सबसे बात की लेकिन अभी भी हिचकी बंद नही हुई है..
मुंबई में अभय से बात किया कि तो पता चला कि वो भी मुजे याद कर रहे थे...भाई शिव कुमार मिश्र से हो रही बातचीत में मेरा जिक्र था...

काफी देर से परेशान हूँ...अभी भी हिचकी चल रही है...

मित्रों और मित्रानियों और अपने चाहने न चाहने वालों से यह नम्र निवेदन है कि वे या तो याद करना बंद करें या मुझे फोन कर लें।

क्यों कि मैं बहुत देर से हिचकी से परेशान हूँ।

नोट- इसी हिचकी के कंटेंट को कविता में भी लिखा है जो कि अमर उजाला में भाई अरुण आदित्य को छापने के लिए भेज रहा हूँ।

Friday, January 18, 2008

वे बड़े साधारण लोग थे

मैं खो गया हूँ

वे बड़े साधारण लोग थे..उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे...
किसी का नाम भगतिन था तो
किसी का ब्रह्म नारायण
एक और थी जिसका नाम सरिता था....
एक नें मुझे विन्ध्याचल की पहाडियों में खो जाने से बचाया।

अपने मुंडन के बाद मैं
पता नहीं कैसे चला जा रहा था पहाड़ियों की ओर
मुझे तो पता भी हीं था कि मैं भटक गया हूँ...
वे ब्रह्म नारायण थे मेरे पिता के बाल सखा
जिन्होंने मुझे देखा गलत दिशा में जाते
और ले आए वापस।

फिर मैं खो गया था मेले की अपार भीड़ में
बैठा था भूले – भटके शिविर में
नाम भी नहीं बता पा रहा था किसी को
कि मेरे गाँव की भगतिन ने देख लिया मुझे
झपट लिया मुझे उस खेमे में आकर
ले आई मां के टेंट में
जो घंटे भर से खोज रही ती मुझे जहाँ-तहाँ बिललाती।।

थोड़ा और बड़ा हुआ तो
खो गया एलनगंज में
अपने चाचा के डेरे पर आया था
बीमार ताई को देखने आई थी माँ
तो आ गया था मैं भी...
थक गया था खोज कर पर
नहीं मिल रही थी चाचा के घर की गली
वह तो सामने के फ्लैट में रहने वाली एक भली सी लड़की ने देखा
मुझे चौराहे की भीड़ में सुबकते
ले आई घर किसी को बताया भी नहीं कि
मैं खो गया था....नाम था उसका सरिता
तब वह बारहवीं में पढ़ती थी
किसी गणित के अध्यापक की बेटी थी।

एक बार तो डूब ही रहा था गाँव के सायफन में
खेतों को सींचने के लिए पानी की नाली का चमकता हुआ पानी
जाता था घर के बहुत पास से
सायफन पड़ता था घर के एकदम पिछवारे
उसी के तल में चमक रही थी एक दुअन्नी
जिसे पाने के लिए मैं उतर गया पानी में
दुअन्नी लेकर मैं डूब रहा था कि आ गए नन्हकू भगत
उन्होंने देख लिया मुझे डूबते
और निकाल लिया बाहर...
बच गया एक बार फिर
बचा लिया गया ऐसे ही कितनी बार खोने से डूबने से।

भाइयों और बहनों
पिछले कई सालों से खो गया हूँ मैं कहीं
डूब रहा हूँ कहीं
नहीं आ पा रहे मुझ तक ब्रह्म नारायाण
भगतिन का कुछ पता नहीं चल रहा
सरिता भी पता नहीं कहाँ है
कहाँ हैं भगत
मैं कह नहीं सकता।
वे बड़े मामूली लोग थे..
उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे ।

Sunday, December 16, 2007

अहे निष्ठुर परिवर्तन

परिवर्तन एक सच है

परिवर्तन एक सच है। एक ऐसा सच जिस पर किसी के मानने या न मानने का कोई असर नहीं पड़ता। परिवर्तन कई स्तरों पर चलता है। जिसे हम किसी भी तरह रोक नहीं पाते। यह परिवर्तन का ही कमाल है कि मैं देखता रहा और चिट्ठाजगत ने मुझे इलाकाई बना दिया। मैं पूँछ पटक कर रह जाता तो भी चिट्ठाजगत के सेहत पर क्या असर पड़ता। वे परिवर्तनशील हैं और बदलता हुआ समाज या व्यक्ति बहुत सारा उलट-पुलट कर ही देता है। जिसे सिर झुका कर स्वीकार करने में ही किसी की भी भलाई होती है....।
ऐसे आफतकाल में शुभचिंतक आते हैं ध्यान दिलाने जगाने कि बचो...सम्हलो...पर तब तक तो देर हो ही चुकी होती है... ज्ञान भाई ने जगाया कि देखो तुम्हे इलाकाई बनाया जा रहा है... मित्र अभय ने कहा कि मैं तुम्हें सही जगह कर देता हूँ...पर मैं चुपचाप देखते-सुनते रहने के अलावा क्या कर सकता था। मैंने माना कि इस इंकलाबी दौर में चुप्पी ही बचाएगी...
बिहारी ने कहा हा कि-

पावस आवत जान के भई कोकिला मौन
अब तो दादुर बोलिहैं, हमहिं पूछिहैं कौन।

मैं बेवकूफ हूँ, पर उतना बड़ा बेवकूफ नहीं हूँ कि अपनी भलाई को भूल जाऊँ और चिट्ठा जगत के परिवर्तन पर फड़फड़ा कर अपना घाटा करवालूँ। अपने मुंशी प्रेमचंद जी ने कहा ही है कि जिस पैर के नीचे अपनी गरदन दबी हो उसे सहलाने में ही फायदा है...पूज्य पिता जी कहते थे-
विप्र टहलुआ, अजा धन, औ कन्यन कइ बाढ़ि
इतने से धन ना घटे तो करौ बड़न से रारि।
सो मैं सब पंचों की बात मान, बलवान चिट्ठाजगत के अदृश्य पैरों को सहला रहा हूँ...और उनका आभारी हूँ कि मुझे कम से कम इलाकाई तो मान रहे हैं...वे लोग।

मैं अपने को इलाकाई पाकर बहुत खुश हूँ...कम से कम इस बदलाव के ग्लोबल दैर में मैं लोकल तो हूँ....जरा सोच कर देखिए ग्लोबल बनाम लोकल, अन्तर्राष्ट्रीय बनाम इलाकाई... कितना अच्छा लगता है....किसी भी परिवर्तन के स्वागत के पीछे मेरी सोची-समझी नीति कुछ ऐसी ही होती है और आपसे मैं कहना चाहूँगा कि जब बदलाव की विकट सुनामी नुमा आँधी चले तो घास की तरह दुबक जाइए घरती माँ के आँचल में....अपने जैसों के साथ गोल बनाकर बचाव कर लीजिए अपना.... अगर आप दुबकेंगे नहीं तो आप उखड़ जाएँगे....चाहे आप जहाजिया पेड़ हों या अट्टालिका प्राकार....
आप इसे मेरा पलायनवाद या समर्पणवाद मान लें....मैं तो इसे परिवर्तनवाद ही मानता हूँ....जो कि सचमें निष्ठुर होता है...

अगर मैं परिवर्तन को न मानूँ तो चिट्ठाजगत का क्या उखाड़ लूँगा....। वह आदमी किसी का क्या बिगाड़ सकता है जो धुरंधर भी न हो...लिक्खाड़ भी न हो, सामाजिक न हो। जो साहित्य, संगीत, कला विहीन हो , साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीन हो...वह बेचारा वलि के अलावा किस काम में आ सकता है....कवि तो और किसी काम के नहीं होते...उनकी इस समाज को कोई जरूरत कभी नहीं रही.... ब्लॉगर भी किसी का क्या कर सकता है...सिवाय एक पोस्ट में अपनी छुपी नीति का इजहार करने के...।
सो भाइयों हर बदलाव का स्वागत करो....मस्त रहो...और उस बदलाव का तो गा-बजाकर स्वागत करो जिस पर जोर न चले....जो बेकाबू हो....

अपनी बात के पक्ष में पुराने लोगों को उद्धृत करना एक परम्परा रही है...मैं भी परम्परा का पालन कर रहा हूँ....अहमद फराज को उद्धृत करके....

जख्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं....
जाने क्या दौर है, क्या लोग हैं क्या कहते हैं...।
जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें...
हम जिसे छू न सकें उस को खुदा कहते हैं...।
मैं कि पुरशोर समुंदर थे मिरे पाँवों में
अब के डूबा हूँ तो,सूखे हुए दरियाओं में ....।

इसलीए कहता हूँ कि जब समय परिवर्तनशील होता है तो आदमी सूखी नदी में डूब जाता है....और लोग घाव को भी फूल और आँधी को हवा कहने लगते हैं...। अस्तु।

Tuesday, December 11, 2007

यश और मोक्ष नहीं निस्तेज जूतों की तलाश करते हैं वे

जोगी

(जूते चमकाने वाले बच्चों के लिए)

वे जूतों की तलाश में
घूमते हैं ब्रश लेकर
और मिलते ही बिना देर लगाए
ब्रश को गज की तरह चलाने लगते हैं
जूतों पर
गोया जूते उनकी सारंगी हों ।

दावे से कहा जा सकता है कि
उन्हें जूतों से प्यार है
जबकि फूल की तरह खिल उठते हैं
जूतों को देखकर वे ।

जब कोई नहीं होता
चमक खो रहे वे
जूतों से गुफ़्तगू करते हैं।

भरी
दोपहरी में वे
जमात से बिछुड़े जोगी की तरह होते हैं
जिसकी सारंगी और झोली
छीन ली हो बटमारों ने ।

उन्हें बहुत चिढ़ है उन पैरों से
जिनमें जूते नहीं ।

बहुत पुरानी और अबूझ पृथ्वी पर
उस्ताद बुंदू खाँ और भरथरी के चेलों की तरह
यश और मोक्ष नहीं
निस्तेज जूतों की तलाश करते हैं वे।

रचना
तिथि-१९-०२-1996

Friday, December 7, 2007

मैं नशेड़ी हूँ....


मेरी पहली किताब उर्फ किस्सा शीत-बसंत का

करीब महीने भर हुए मुझे एक किताब की याद आई। वह किताब थी किस्सा शीत-बसंत । कहीं बात चल रही थी पहले प्यार की । पहले प्यार की चर्चा से मुझे शीत-बसंत याद आई । शीत-बसंत मुझे मेरे बड़े भैया ने इलाहाबाद से लाकर दी थी। यह बात होगी १९७५ या ७६ की । मैं ६ या 7 साल का था। निक्कर पहन कर गाँव की कोलियों या गलियों में फिरा करता था। हर घर और हर आँगन मेरा अपना हुआ करता था। हर नई दुलहन जो अक्सर मेरी भाभी होती थी को देखने कभी भी पहुँच जाता था और कह भी देता था कि दुलहन देखने आया हूँ...। दुलहन देखने के बाद पाहुर के लड्डू लेकर भाग पड़ता था। आज याद करता हूँ तो लगता है कि मैं दुलहन देखने कम लड्डू पाने अधिक जाया करता था। ऐसे ही दिनों में मुझे वह किताब मिली किस्सा शीत-बसंत
दो तीन दिनों में पूरी किताब पढ़ गया । किताब खतम करने के बीच कभी रोता कभी डरता। कहानी एक सौतेली रानी और और उसके दो सौतेले राज कुमारों की थी। जैसा होता है बाद में सब कुछ ठीक हो जाता है। पर बीच में जलनखोर रानी दोनों राजदुलारों को मारने का हुक्म दे देती है। लेकिन वफादार सेवक शीत-बसंत की जगह किसी जानवर का दिल लाकर दे देते हैं और रानी के कलेजे को ठंडक पहुँच जाती है...।

तो शीत-बसंत और रानी मेरे पहले पात्र हैं जिनके बारे में मैंने पढ़ा और शीत बसंत पहली किताब। बहुत खोजने के बाद भी वह पुरानी किताब नहीं मिली । पर कांदिवली में एक दिन भाई अभय तिवारी के साथ भटकते हुए सड़क की दुकान से कुछ अलग छापेवाली दूसरी प्रति मिल गई। लगभग तीस साल बाद फिर पढ़ा और अवधेश भैया की बहुत याद आई। मुझ पर उनका बहुत प्रेम था । मैं उनसे १६-१७ साल छोटा जो हूँ। मुझे पढ़ने की ओर भैया ने ही प्रेरित किया। आगे इसी क्रम में सारंगा सदाबृज, नल-दमयंती, जैसी दर्जनों किताबें उनके स्नेह से पढ़ने को मिलीं। वे इलाहाबाद से नंदन, पराग, बालहंस, बाल भारती, चंपक, लोटपोट, और अमर चित्र कथा की तरह की किताबें हर यात्रा में लाते थे....। जिन्हें मैं बिना रुके पढ़ता जाता। हालांकि इसी पढ़ने के क्रम में मैंने घर में भाभियों द्वारा छिपा कर रखी गई इंद्रलोक आजाद लोक जैसी पार्थिव पोथियाँ भी पढ़ लीं।
हालांकि आज तक नहीं जान पाया हूँ कि मेरी चार भाभियों में कौन पढ़ता था उन पवित्र-पोथियों को।

जो भी रहा हो.....मैं मानता हूँ कि मैं नशेड़ी हूँ....किताबों को पाने और पढ़ने का नशा है मुझे.....जो शायद इस जीवन में न उतरे....।

Thursday, December 6, 2007

अयोध्या और पागलदास

पागलदास


( पखावज वादक स्वामी पागलदास के लिए, जिनका २० जनवरी १९९७ को अयोध्या में देहावसान हो गया)

अयोध्या में बसकर
उदास रहते थे पागलदास
यह बताया उस मल्लाह ने
जिसने सरयू में प्रवाहित किया उन्हें।

मैंने पूछा-
आखिर क्यों उदास रहते थे पागलदास
अयोध्या में बसकर भी।

उसने कहा-
कारण तो बता सकते हैं वे ही
जो जानते हों पागलदास को ठीक से
मैं तो आते-जाते सुनता था
उनका रोदन
जिसे छुपाते थे वे पखावज की थोपों में।

मैंने कहा, मुझे उनके स्थान तक ले चलो
उनके किसी जानकार से मिलाओ।

मैंने पागलदास के पट्ट शिष्यों से पूछा
क्या अयोध्या में बसकर
सचमुच उदास रहते थे पागलदास।
शिष्य कुछ बोले-बासे नहीं
बस थाप देते रहे,
मेरे आग्रह करने पर
उन्होंने मुझे दिखाया उनका कक्ष
जहाँ बंद हो गया था आना जाना डोलना
पागलदास के पखावज भी भूल गए थे बोलना।

मैं अयोध्या में ठूँढ़ता रहा
पागलदास के जानकारों को
और लोग उनका नाम सुनते ही
चुप हो
बढ़ जाते थे।

बहुत दिन बीतने पर
मिले पागलदास के संगी
जो कभी संगत करते थे उनके साथ

उन्होंने मुझसे पूछा -
क्या करेंगे जानकर कि
अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास रहते थे पागलदास।

उन्होंने कहा-
क्यों उदास हैं आप बनारस में
बुद्ध कपिलवस्तु में
कालिदास उज्जयिनी में
फसलें खेतों में
पत्तियाँ वृच्छों पर, लोग दिल्ली में, पटना में
दुनिया जहान में क्यों उदास हैं
आप सिर्फ यही क्यों पूछ रहे हैं
कि अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास थे पागलदास।

मैंने कहा -
मुझे उनकी उदासी से कुछ काम नहीं
मुझे बुद्ध, कालिदास या लोगों की उदासी से
कुछ लेना-देना नहीं
मैं तो सिर्फ बताना चाहता था लोगों को
कि इस वजह से अयोध्या में बसकर भी
उदास रहते थे पागलदास।

उन्होंने बताया-
पागलदास की उदासी की जड़ थे पागलदास

मैंने कहा यह दूसरे पागलदास कौन हैं
क्या करते हैं।

उन्होंने बताया-
जैसे अयोध्या में बसती है दूसरी अयोध्या
सरजू में बहती है दूसरी सरजू
वैसे ही पागलदास में था दूसरा पागलदास
और दोनों रहते थे अलग-थलग और
उदास।

जो दूसरे पागलदास थे
वे न्याय चाहते थे
चाहते थे रक्षा हो सच की
बची रहे मर्यादा अयोध्या की
सहन नहीं होता था कुछ भी उल्टा-सीधा
क्रोधी थे।पहले पागलदास की तरह
सिर्फ अपने भर से नहीं था काम-धाम
पहले पागलदास की तरह उदास होकर
बैठ नहीं गए थे घर के भीतर।

मैंने कहा-
अन्याय का विरोध तो होना ही चाहिए
होनी ही चाहिए सच की रक्षा
पर उदासी का कारण तो बताया नहीं आपने।

उन्होंने कहा-
जो पागलदास
सच की रक्षा चाहते थे
चाहते थे न्याय
वध किया गया उनका
मार दिया गया उनको घेर कर उनके ही आँगन में
एकान्त में नहीं
उनके लोगों की मौजूदगी में
और पहले पागलदास को छोड़ दिया गया
बजाने के लिए वाद्य
कला के सम्वर्धन के लिए।

दूसरे पागलदास की हत्या से
उसको न बचा पाने के संताप से
उदास रहने लगे थे पागलदास
दूसरे पागलदास के न रहने पर
उनको संगत देने वाला बचा न कोई
उन्होंने छोड़ दिया बजाना, भूल गए रंग भरना
तज गिए समारोह, भूल गएकायदा, याद नहीं रहा भराव का ढ़ंग
बचने लगे लोगों से, लोम-विलोम की गंजायश नहीं रही।
बहुत जोर देने पर कभी बजाने बैठते तो
लगता पखावज नहीं
अपनी छाती पीट रहे हैं।

इतना कह कर वे चुप हो गए
मुझे सरजू पार कराया और बोले-
जितना जाना मैंने
पागलदास की उदासी का करण
कह सुनाया
अब जाने सरजू कि उसके दक्षिण तरफ
बस कर भी क्यो उदास रहे पागलदास।

रचना तिथि- २१-०९-1997

Friday, November 30, 2007

हम न मरब मरिहैं संसारा

हिंदी मरते नहीं......

तीस दिनों से ब्लॉग पर लेखन-रस नहीं चखा पर उसका नशा लगातार छाया रहा। कितनी बार सोचा कि लिखूँ , छापूँ , टिप्पणियाँ दूँ, लेकिन पता नहीं क्यों नहीं लिख पाया। मैं जीवन में कभी इतना व्यस्त नहीं रहा हूँ कि लिखने के लिए समय न निकले। और न ही इतना व्यस्त रहना चाहूँगा कि न लिख पाऊँ। न लिखने का कारण और लिखने का बाहाना महान लेखकों को शोभा दे सकता है हम टुटपुँजिया लेखकों को नहीं। हमारी तो जिंदगी ही लेखन पर आधारित है।

इस बीच मैं कहीं कुछ और लिखने में लगा था। एक फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ लिखता रहा और एक किताब संपादित की। 25 के करीब फिल्में देखीं और हप्ते भर नदी के जल में स्नान किया। तीन दिन पेड़ की छाया में बैठा और खेत से मूलियाँ उखाड़ कर खाता रहा। कुल मिलाकर मस्त रहा। बस ब्लॉग पर लिख नहीं पाया। बाकी सब चकाचक रहा।

आज कुछ लिखने के लिए नहीं बस आप लोगों के सामने हाजिर होने के लिए लिख रहा हूँ....। यह बताने के लिए कि मैं मरा नहीं हूँ क्योंकि गाँवों से जुड़े लोग मरते नहीं। वे धूल झाड़ कर उठ खड़े होते हैं और मैं गाँव वाला ही हूँ....मारने से नहीं मरूँगा। साथ ही मुझे जिलाने वाला साहित्य संजीवनी भी मिली हुई है। मैं बनारसी हूँ और एक बनारसी कवि कबीर के शब्दों में दावे से कह सकता हूँ कि -

हम न मरब मरिहैं संसारा
हमकू मिला जियावन हारा।

मैं जिंदा हूँ तो हिंदी के कारण । मैं जिंदा रहूँगा तो हिंदी के चलते। हिंदी मेरी माँ है मेरी जननी। यह मुझे बचाए रखेगी। हम खुद भी हिंदी हैं.....और हिंदी मरना नहीं जानता या जानती।

आज और कुछ नहीं लिख रहा हूँ। क्योंकि लिखते नहीं बन रहा है । फिर भी लिख रहा हूँ क्योंकि नवंबर महीने से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। मैं नहीं चाहता कि विनय पत्रिका के इतिहास में यह लिखा जाए कि मैंने इस माह को लेखन के लायक नहीं पाया। मैं नहीं चाहता कि नवंबर के खाते में कुछ न दर्ज हो। आखिर यह महीना मेरे जीवन में बहुत महत्व रखता है । इसी माह में मुझे मेरी पत्नी के प्रथम दर्शन हुए। तब वह मेरी सहपाठिनी थी। इसी माह में मैंने 1997 में अपने प्यारे पिता को खोया अर्ध-अनाथ हुआ। बीते तीस दिनों में बहुत कुछ किया जो कि मैं आप सब को बताना नहीं चाह रहा। हालाकि बता देने से कुछ घट नहीं जाएगा पर बताने का मन नहीं है।

मित्रों कल शायद कुछ और लिखूँ या शायद महीने भर के लिए फिर गायब हो जाऊँ.....पर आप लोग यह बात गाँठ में बाध लीजिए कि मैं कुछ दिनों के लिए गुम हो सकता हूँ मर नहीं सकता।

Wednesday, October 31, 2007

महान शायर चिरकीन की राष्ट्रीय चेतना

क्या रखा है दोनों जहाँ में

उर्फ सब चिरका ही चिरका है

आज की अजदकी पोस्ट और उस पर ज्ञान भाई की धुरंधर टीप नें मुझे बेजोड़ शायर चिरकीन की याद दिला दी। इसलिए आज की विनय पत्रिका में फैल रही हर बू बास के लिए अजदक भाई ही एक मात्र जिम्मेदार हैं। मैं तो सिर्फ अजदक भाई की आज की पोस्ट रूपी टट्टी की आड़ से चिरकीन की शायरी बिखेर रहा हूँ। यानी चिरका कर रहा हूँ या गू कर रहा हूँ।

लोग बताते हैं कि चिरकीन साहब अलीगढ़ में रहते थे और हर मुद्दे को चिरके से जोड़ने की महारत रखते थे। विद्वानों का मत है कि चिरकीन का मूल अर्थ है बिखरी हुई टट्टी। आप समझदार हैं टट्टी का अर्थ झोपड़े की टाटी नहीं करेंगे ऐसा मुझे भरोसा है। टट्टी मतलब हाजत या कहें कि गू या हगा। चिरकीन की काव्य कला अद्भुत थी। बड़े-बड़े शायर उनसे पनाह माँगते थे। अच्छे-अच्छे मुशायरों में चिरकीन ने चिरका बिखेर दिया था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि चिरकीन प्रात काल में स्मरणीय हैं। वंदनीय है। आप सब के पास अगर इस महान शायर के युग इत्यादि के बारे में कोई ठोस जानकारी हो तो दें। चिरकीन पर रोशनी डाल कर चिरका साहित्य को बढ़ावा दें। साहित्य में फैली एक ही तरह की सड़ान्ध या बदबू को बहुबू से भरें। कभी इलाहाबादी मित्र अली अहमद फातमी ने बताया था कि चिरकीन का दीवान भी अलीगढ़ से उजागर हुआ था।

चिरकीन का साहित्य सदैव चिरके पर ही केन्द्रित रहा। चिरका ही उनका आराध्य था । इसीलिए
जितने भी स्वरूप हो इस मल या गू के या जितने भी रंग हों सबको चिरकीन ने अपनी शायरी में जगह दिया है। मुझे कुछ ही शेर याद आ रहे है जो आपकी खिदमत में पेश हैं। अगर कुछ इधर उधर हो तो चिरकीन भक्त और अभक्त क्षमा करेंगे।

राष्ट्रीय एकता

चिरकिन चने के खेत में चिरका जगा–जगा
रंगत सबकी एक सी , खुशबू जुदा-जुदा।

स्वागत

बाद मुद्दत के आप का मेरे घर पर आना हुआ
तेज की घुमड़न हुई और धड़ से पाखाना हुआ।

इश्क

वस्ल के वक्त महबूबा जो गू कर दे
सुखा के रख लीजे, मंजन किया कीजे।

श्रद्धा-भक्ति

चिरका परस्त बन तू ए चिरकीन
आखिर क्या रखा है दोनों जहाँ में।

अगर कोई ज्यादती हो गई हो तो सच में माफी दें। या माफ करें...