वो एक बात बहुत नागवार गुजरी है.....जिसका फसाने में कोई जिक्र नहीं था....मेरी कुछ बातों के जरिए प्रमोद जी और प्रतयक्षा जी को अपनी हीनता उजागर करने का मौका मिला है और दोनो बुद्धिजीवी मित्र निकाल भी रहे है....साहित्यकारों की ब्लॉग में
दुर्दशा पर उठाये गए मेरे सवाल इन दो साहित्यकारों को रास नहीं आए और बात मेरे चरित्रांकन पर आ गई........प्रमोद जी और
प्रत्यक्षा जी ने मिल कर
उखाड़-पछाड़ शुरू कर दी
मैं भी ....उन दोनों ब्लॉगर लेखकों की तमाम जुगलबंदी पढ़ने पर बहुत सारी बातें मुझे निकलती दिख रही हैं.....जैसे-
1-मुँहफट होने और खरी-खरी कहने का पैदाइशी हक सिर्फ प्रमोद जी को है, अगर और कोई ऐसा करता है तो गलत करता है ......प्रमोद जी की मुँह फटई उनका गुन है...उनकी खरी, खरी है...बाकी की खरी, में खोट है....
2-मैंने किसी प्रत्यक्षा को कभी फोन नहीं किया है और अगर मेरे फोन से उन्हें फोन गया होगा तो उस संदर्भ को वे मुझसे बेहतर समझ सकती हैं....
3-मैंने किसी सलेक्ट सर्किल में कभी प्रत्यक्षा का नाम लिया हो ऐसा मुझे याद नहीं...यह उनका भ्रम है कि लोग उनके बारे में बात करके दिन बिताते हैं...
4- हो सकता है जब प्रत्यक्षा ब्लॉगगिंग का बी कर रहीं थी मैं गाँव में बथुआ बो रहा होऊँ....तो क्या मुझे अभी ब्लॉगर बनने का हक या कुछ कहने का अधिकार नहीं रह जाता.....क्या ब्लॉग वेद हैं....जिस पर केवल प्रत्यक्षा का ही हक है....किसी बोधिसत्व का नहीं...
5-लोगों को फोन करने और बात करने का हक भी सिर्फ प्रमोद और प्रत्यक्षा को है....बाकी कोई करे तो गलत है...हालाकि मैंने किसी को फोन नहीं किया है....साहित्यकारों की दुर्दशा वाली पोस्ट को छोड़ कर
6-किसी बूढ़े प्रकाशक को खुश करने की बात मैंने सामान्य संदर्भ में कही थी...जिस पर बिदक कर ये दोनों साहित्यकर्मी अपनी दाढ़ी के तिनके नोच रहे हैं...और उस नोच-खसोट का प्रदर्शन कर रहे हैं....
7-मैं परिपक्व इंसान नहीं हूँ.... यह तो मैं भी जानता हूँ... .कोई नहीं होता ...बस दो ही लोग परिपक्व है.... प्रत्यक्षा जी और प्रमोद जी...आप दोनों परिपक्व होने की बधाई स्वीकार करें....
8-मित्रता वही है जो प्रमोद और प्रत्यक्षा की है...बाकी दुनियादारी है....स्वार्थ का गठबंधन है...अगर
अभय तिवारी मेरे बारे में कुछ लिखते हैं या मुझे खलनायक नहीं मानते तो यह भी उनका अपराध है..
9-कोई यदि बोधिसत्व का समर्थन करेगा तो वह अकेला पड़ जाएगा.....यह धमकी देकर प्रत्यक्षा जी क्या कहना चाहती है.....क्या किसी ब्लॉगर को अकेला करने की सोचना कुंठित और तानाशाही चरित्र की निशानी नहीं है....
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10-किसी की बात को छिछला कहने का डीग्रेड आदि शब्दों से नवाजने का हक सिर्फ प्रत्यक्षा को है.....क्योंकि वे ही ऐसा कर सकती है....
10- मेरी पत्नी आभा की किताब अगर किसी को साध के छपानी होती जैसा की आप संकेत कर रही है....तो भी अभी नहीं छपती क्यों कि उसे ढ़लती उमर ( यह शब्द मेरे नहीं आदरणीय प्रमोद जी के हैं) का अपराधबोध नही है...जैसा कि प्रमोद जी के मुताबिक आपको है...
11- अगर आभा लेखन में दम नहीं होगा और छपास बलवती होगी तो हो सकता है कि आभा को भी किसी को साधना ही पड़े...
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12-लीद, लड़ियाना, लथर-पथर...होना सब प्रमोद जी की बपौती है....वह उन्हीं के पास रहे....
14- प्रत्यक्षा काम-काजी महिला हैं.....लोगों को हैंडिल करना जानती हैं.... खास कर कर्मचारी या मजदूर वर्ग को....मैं उनसे आग्रह करूँगा कि किसी को बदले की भावना और संदेह के आधार पर हैंडिल न करें......
15- प्रमोद जी से उम्मीद करूँगा कि उनके मन में मेरे प्रति जो भी घृणा या हिकारत होगी मेरी इस पोस्ट पर ही निकाल लेंगे.....क्योंकि मैं हो सकता हैं आगे खुद पर थूकने का कोई भी मौका उन्हें न दूँगा..
16- मेरी पत्नी को निशाना बनाने के बाद अब मेरे परिवार में केवल भानी और मानस यानी मेरी बेटी और बेटा ही खल पात्र बनने से रह गए हैं....प्रत्यक्षा और प्रमोद जी मौका मत चूकिए । प्रमोद जी आप तो परसों-चौथा दिन मुझे देखने और बच्चों से मिलने घर भी आए थे....कोई न कोई धारणा तो बनाई होगी....उनके बारे में भी उसे भी लिख दीजिए...दबाकर दस बरस बाद निकालने से बेहतर होगा कि आज और अभी निकालें...हम सपरिवार आपकी राय का स्वागत करेंगे......