Wednesday, December 31, 2008
क्या होगा कल नया जो अब तक नहीं था
2009 से कुछ घंटे की देरी पर हूँ। आप भी उतनी ही दूरी पर है। हम सब के जीवन से ३६५ दिन या यूँ कहें कि एक और साल गया।
अगले साल को लेकर न कोई बड़ी उलझन है न कोई बड़ी योजना। बस कुछ छोटी योजनाएँ हैं कुछ छोटे सपने जिन्हें पूरा करने की फिराक में जा सकता है यह 2009।
मैं कोई धंधेबाज तो हूँ नहीं कि एक-एक दिन का एक-एक काम का हिसाब रखूँ। लेकिन यह तो कह ही सकता हूँ कि 2008 में ऐसा क्या नहीं हुआ जो 2009 में हो जाएगा। मेरे लिए यह साल का बदलाव केवल कैलेंडर का पन्ना पलट जाना । बल्कि मैं सोचता हूँ कि पंछियों का कोई नया साल होता होगा क्या। क्या पेड़ पौधे भी अपना नया साल मनाते होंगे। क्या नदियों के पास भी उनके पानी का, बहने का कोई हिसाब होता होगा कि नहीं।
तो कल को एक नया दिन नहीं बल्कि पिछले तमाम दिनों का एक सिलसिला मान कर खुश रहें....और करते रहे अपने रोज मर्रा के काम। कल सुबह कुछ भी ऐसा नहीं होगा जो कि आज या बीते कल या 2001 या 1968 की किसी 1 जनवरी को नहीं हुआ होगा।
लेकिन आप सब को यह साल अच्छा रहे.....शुभ कामनाएँ।
Sunday, November 30, 2008
मैं बचा हूँ कुशल से हूँ
मैं इसलिए बचा हूँ
क्योंकि मैं घर में बैठा हूँ.....
यदि मैं भी वहाँ होता गेटवे या ताज पर तो
आप सब मेरा शोक मना रहे होते।
मैं इसलिए बचा हूँ क्योंकि मैं
वहाँ नरीमन हाउस में नहीं था
ओबरॉय में नहीं था जहाँ गोलियाँ चल रही थीं....
जहाँ मौत का महौल था।
मैं सच में केवल इसलिए बचा हूँ क्योंकि
मैं बच-बच कर रह रहा हूँ
मैं बच-बच कर जीने का अभ्यासी हो गया हूँ
जब से पैदा हुआ यही सिखाया गया
सब यही कहते पाए गए हैं कि बच के रहना
उधर नहीं जाना, उससे नहीं लड़ना
घर में रहना
सावधान रहना
अपना ध्यान रखना....
और मैं
घर में हूँ
अपना ध्यान रख रहा हूँ
किसी से नहीं लड़ रहा हूँ
बच कर रह रहा हूँ
इसीलिए अब तक
बचा हूँ।
Friday, October 31, 2008
प्रभु जी काहे दिए गुरु कपटी
हर किसी के जीवन में गुरु का बहुत महत्व है...मेरे जीवन में भी है....मैं अपने गुरुओं का बहुत ऋनी हूँ....और सदैव श्रद्धा से स्मरन करता हूँ.....किन्तु बहुत से चेले ऐसे होते हैं जिन्हें अच्छे गुरु नहीं मिलते। एक कहावत है पानी पिओ छान के , गुरु करो जान के। पानी छानने के लिए तो भाँति-भाँति के फिल्टर मिलते हैं...किन्तु गुरु को जानने के लिए कोई हिल्टर नहीं मिलता...मैं तमाम बड़ी कंपनियों से निवेदन करूँगा कि वे एक गुरु जाँचक यंत्र बनाएँ....जिससे चेलों को ऐसा कष्ट न हो जैसा निचे लिख रहे चेले को हुआ है.....
यह मेरा नहीं एक पिछे रह गए चेले का दुख है....उसके दुख को समझें....उसे अच्छा गुरु मिलो यह दुआ करों...
चेला चौपदी
प्रभु जी काहे दिए गुरु कपटी
जात हैं जब गुरु से ग्यान माँगन को, मारत डंडा झपटी।। प्रभु जी।।
जात हैं जब गुरु की सेवा करन को , देत उठाइके रपटी।। प्रभु जी।।
जात हैं जब गुरु से मुक्ति माँगन को, गर धरत हैं लपटी।। प्रभु जी।।
जब गुरु कहत मौन रहन को, गुरुनी गारी देत है डपटी ।। प्रभु जी।।
Friday, October 24, 2008
भानी हिंदी हैं.....

तुमको सुनना पड़ेगा....
भानी की छुट्टियाँ हैं...दीपावली की.....मेरा घर में काम करना मुश्किल हो गया..है...। थोड़ी-थोड़ी देर पर वह यमदूत की तरह हाजिर होती है और अपनी बात सुनने को कहती है...मेरी मजाल की मैं भानी की बात न सुनूँ....न सुनने पर कहती है कि तुमको सुनना पड़ेगा नहीं तो घर से निकाल दूँगी....।
परसों उन्होंने डरा-धमका कर जो बात सुनाई आप भी पढ़ें...
भानी से उनकी किसी दोस्त ने पूछा कि तू क्या है....उसका प्रश्न न समझते हुए भानी ने कहा कि तू क्या है...। उस लड़की ने कहा कि मैं गुजराती हूँ....भानी ने साथ में खड़ी दूसरी लड़की से पूछा कि तू क्या है...उस लड़की ने कहा कि मैं मराठी हूँ.....अब बारी थी भानी के उत्तर की । जब भानी को कोई बात ना सूझी तो भानी ने कहा कि वह हिंदी है....। लड़कियों ने उनकी बात मान ली । यह किस्सा बता कर भानी ने मुझसे यह जानना चाहा कि उन्होनें सही बताया या गलत । मैंने कहा कि तुमने सही बताया....।
Tuesday, October 7, 2008
शायर बेटे को खुसरो की नसीहत
शायर कवि संगीतज्ञ सूफी संत अमीर खुसरो ने अपने जीवन के अंतकाल में अपने बेटे गयासुद्दीन अहमद को कुछ नसीहतें दी थीं...हो सकता है खुसरो की नसीहतें आपके भी काम आए...
पहली नसीहत यह है गयास बेटे मैंने हिंद की खाक को अपनी आँखों का सुरमा बना लिया है, इसलिए तू भी हिंद को ही अपना सब कुछ समझना ।
दूसरी नसीहत यह है क्योंकि तू भी शायरी करने लगा है, इस लिए मैं चाहूँगा कि हिंदवी जुबान में ही शायरी करना।
तीसरी नसीहत यह है कि गयास अपनी शायरी का कोई भी हिस्सा शाहों की खुशामद में बर्बाद मत करना , जैसा कि मैंने किया है...। मैं चाहता हूँ कि तू हिंद के आम लोगों में घुल मिल कर उनकी रूहों की आवाज सुन और फिर उस रूह की आवाज को ही अपनी शायरी की रूह बना लेना।
अब गयास ने अपने प्यारे अब्बा की किस नसीहत पर कितना अमल किया मैं कह नहीं सकता ना ही यह बता सकता हूँ कि आज वह कौन शायर कवि है जो आम लोगों के रूह की आवाज सुन रहा है और उस आवाज को अपनी शायरी की रूह बना रहा है...मुझे तो कोई नहीं दिख रहा है...आप को दिखे तो बताएँ...
Tuesday, August 26, 2008
मेरी मदद करो....
मित्रों मेरी मदद करो
कल रात पता नहीं क्यों मुझे अपना पासवर्ड बदलने की धुन सवार हुई....और मैंने शब्दाचार्य अजित बडनेकर जी से दिशा निर्देश लेते हुए मैंने अपना पासवर्ड बदल भी दिया....
लेकिन पता नहीं क्या और कहाँ चूक हो गई....और मेरा मेल पता बदले हुए पासवर्ड से नहीं खुल रहा है और पुराना पासवर्ड भी अभी काम नहीं कर रहा है....कुल मिलाकर यह बदलाव मुझे मुश्किल में डाल गया है...मेरा प्यारा मेल पता मेरी ही पहुँच के बाहर हो गया है.....
ऐसी दशा में मैं बोधिसत्व ...जो कि हिंदी का चाकर हूँ....मेल और ब्लॉग की दुनिया के तमाम समझदारों से तहे दिल से अपील कर रहा हूँ कि वे पासवर्ड पाने और मेल बॉक्स तक पहुँचने में मेरी मदद करें...मैं मरते दम तक उनका आभारी रहूँगा....
भरोसा न हो तो मदद करके देख लें....मेरे जैसा नमक हलाल खोजने पर भी नहीं मिलेगा....
Wednesday, July 30, 2008
राम और सीता के जीवन में किसने आग लगाई........
यह प्रसंग बड़ा ही रोचक, जगानेवाला और दुख दाई है । कथाओं से ऐसा लगता है कि राम और सीता ने सुख के दिन देखे ही नहीं। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं था। रामायण में ऐसा लिखा है कि राम और सीता लंका से लौट कर बड़े आनन्द से रह रहे थे। सब ठीक-ठाक चल रहा था...। जीवन पटरी पर आ गया था। लेकिन जैसे की हर युग में पर दुख संतापी होते हैं राम राज्य में भी थे...उनके पेट में बात पची नहीं....।
समय बीता ....देवी सीता पेट से हुईं....और उन्हें साथ लेकर राम अयोध्या की अशोकवनिका ( अन्त:पुर में विहार योग्य उपवन) में गए। वहाँ राम पुष्पराशि से विभूषित एक सुंदर आसन पर बैठे। जहाँ नीचे कालीन भी बिछा हुआ था।
फिर जैसे देवराज इंद्र शची को मधु मैरेय ( एक प्रकार बहु प्रचलित मद्य) का पान कराते हैं उसी प्रकार कुकुत्स्थकुल भूषण श्री राम ने अपने हाथ से पवित्र पेय मधु मैरेय लेकर सीता जी को पिलाया।
फिर सेवकों ने राजोचित भोज्य पदार्थ जिसमें मांसादि थे और साथ ही फलों का प्रबंध किया और उसके बाद राजा राम के समीप नाचने और गाने की कला में निपुण अप्सराएँ और नाग कन्याएँ किन्नरियों के साथ मिल कर नृत्य करने लगीं।
इसके बाद हर्षित राम ने गर्भवती सीता से पूछा कि मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ..बरारोहे मैं तुम्हारा कौन सा मनोरथ पूरा करूँ...। माता बनने जा रही खुश सीता ने राम से कहा कि मेरी इच्छा एक बार उन पवित्र तपोवनों को देखने की हो रही है ...देव मैं गंगा तट पर रह कर फल मूल खाने वाले जो उग्र तेजस्वी महर्षि हैं, मैं उनके समीप कुछ दिन रहना चाहती हूँ...। देव फल मूल का आहार करनेवाले महात्माओं के तपोवन में एक रात निवास करूँ यही मेरी इस समय सबसे बड़ी अभिलाषा है।
पत्नी सीता की इच्छा जान कर राम को बड़ी खुशी हुई और उन्होंने कहा कि तुम कल ही वहाँ जाओगी....इतना कह कर श्री राम अपने मित्रों के साथ बीच के खंड में चले गए।
फिर आगे वह हुआ जिसने सीता के जीवन की दिशा बदल दी । राम अपने तमाम 10 सखाओं से घिरे बैठे थे...उन्होंने कहा कि राज्य में आज कल किस बात की चर्चा विशेष रूप से है । उनके सखाओं में एक भद्र ने बताया कि जन समुदाय में सीता जी का रावन के द्वारा हरण होने और क्रीडा कानन अशोक वनिका में रखने के बाद भी आप द्वारा स्वीकार किया जाना सबसे अधिक चर्चा में है .....लोग अचंभित और परेशान है कि हम लोगों को भी स्त्रियों की ऐसी बातें सहनी पड़ेगी...लोग जानना चाह रहे हैं कि आप ने कैसे स्वीकार कर लिया सीता को....बस.....सीता माता के सुख के दिन समाप्त हो गए........राम ने एक तरफा फैसला करके सीता को एक दिन नहीं सदा-सदा के लिए वन में त्याग देने का आदेश दिया .....वह भी लक्ष्मण को....
वन जाकर भी सीता को तो यही पता था कि वह तो अपनी इच्छा से घूमने आई है....गंगा के पावन तट पर.....बस उनकी खुशी के लिए....उसके प्यारे पति ने भेजा है......
देखें- गीता प्रेस गोरखपुर का श्री मद्वाल्मीकीय रामायण, द्वितीय भाग, उत्तर काण्ड के अध्याय 42 से 50 तक की पूरी कथा । .
Monday, July 28, 2008
दिमाग के दीमकों का क्या करूँ
दीवार में लगे दीमक को तो हटाया जा सकता है लेकिन दिमाग में लगे दीमक का क्या करें...किसी को एक सिरे से बुरा कहना भी दिमाग में दीमक लगने की निशानी है। क्या आप नहीं मानते।
मामला थोड़ा उलझा हुआ है । तो जाने और बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए। मेरे मुहल्ले में मोहित चाय वाला है । उसके बगल में जयंत की भी एक दुकान है। जयंत की चाय हर दम फीकी रहती है लेकिन मोहित की चाय लगातार अच्छी रहती है। दोनों एक ही धन्धे में हैं...एक ही तरह की पत्ती और मशाले का प्रयोग करते हैं॥लेकिन एक सुस्त है और एक चुस्त है। एक के यहाँ से लगातार चाय बनने की आवाज आती रहती है लेकिन उसी समय दूसरे के यहाँ से गप्प और अनर्गल बातों की बदबू उफान मार रही होती है । जयंत के यहाँ यह बड़ा मुद्दा होता है कि देखो मोहित के यहाँ क्या हो रहा है ....जयंत की मानसिकता मोहित की निंदा और अपनी सडांध को खुश्बू बताने की बन चुकी है ऐसी बातों के अलावा उसकी दुकान में और किसी बात का दर्शन नहीं होता। यानी चाय तो अच्छी बने दूर की बात है कुछ भी बेहतर नहीं होता। हालांकि जयंत अपने धंधे का पुराना खिलाड़ी है....। कभी साल छ महीने उसने भी अच्छी चाय बेंची है......।
जयंत और उसके कुछ परिचित जो कि एक छोटा गिरोह भी चलाते हैं वे चाहते है कि मोहित की दुकान बंद हो जाए और केवल उनकी दुकान ही चले। बाजार में केवल उनकी ही चाय की बात हो। जो उनके पक्ष में बात करेगा उसे वे चाय भी पिलाएँगे और उसे सच्चे चाय कर्मी के रूप में भी प्रचारित करेंगे। वे न सिर्फ मोहित की दुकान उजाड़ना चाहते हैं बल्कि उनकी कोशिश है कि अगर मोहित वाला फार्मूला भी हाथ लग जाता तो मजा आ जाता।
मित्रों मैं कभी कभार जयंत के यहाँ जब वह आर्त स्वर में पुकारता था चाय पीलो भाई तो जाता था...या जब सारी दुकाने बंद होती थीं....तब वहाँ जाता था चाय पीने । लेकिन वहाँ अच्छी चाय के अलावा सब कुछ मिलता है । जिसमें मोहित की चाय को सिरे से नकार देने की एक अजीब हत्यारी मनोदशा भी शामिल है। मोहित की चाय बुरी, मोहित की बेंच गंदी, मोहित की गिलास गंदी, मोहित की दुकान गंदी...और जयंत की जय हो...
अब मैं क्या करूँ। मैं जयंत के यहाँ नहीं जा रहा। उसके लोग चाह रहे हैं कि या तो मैं चाय छोड़ दूँ या फिर केवल जयंत की सड़ांध और तंग दुकान में बैठा रहूँ.....जहाँ की दीवारों पर न सिर्फ अँधेरा और घुटन था बल्कि जयंत के दिमाग में दीमक है....वह अपने दिमाग के दीमक को भी चाय कर्म का एक नायाब रत्न बता कर मेरे भेजे में भरना चाह रहा है..........
मैं क्या करूँ....
नया ठीहा खोजूँ....या चाय पीना छोड़ दूँ या फिर जयंत और उसके लोगों के कहे पर फिर उसकी सड़ी और फीकी चाय को आह...आह करके पीऊँ...और दिमाग में दीमक रख लूँ....
आप लोग बताएँ मैं क्या करूँ.....
Wednesday, June 18, 2008
कौन बनाता है छिनाल...
छिनाल के जन्म की चर्चा हुई । अजित भाई के शब्दों का सफर में । लेकिन वहाँ छिनाल के साथ जन्म लेने वाले छिनरा पुरुष की चर्चा रह गई । लावण्या जी ने छिनाल की तरह ही पुरुषों के लिए प्रयुक्त होनेवाले समानार्थी शब्द की चर्चा की थी। अवध में जहाँ मैं पैदा हुआ वहाँ जिस और जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्चा होती है। छिनाल के साथ जो छिनरई करते धरा जाता है सहज ही वह छिनरा होता है। वहाँ दोनों का कद बराबर है-
छिनरा छिनरी से मिले
हँस-हँस होय निहाल।
मेरा कहना है कि किसी भी समाज में अकेली स्त्री छिनाल नहीं हो सकती। उसे सती से छिनाल बनाने में पहले एक अधम पुरुष की उसके ठीक बाद एक अधम समाज की आवश्यकता होती है। छिनाल शब्द की उत्पत्ति पहले हुई या छिनरा की यह एक अलग विवाद का विषय हो सकता है । साथ ही समाज में पहले छिनरा पैदा हुआ या छिनाल। क्योंकि बिना छिनरा के छिनाल का जन्म हो ही नहीं सकता। एक पक्का छिनरा ही किसी को छिनार बना सकता है। तत्सम छिनाल का पुलिंग शब्द भले ही न मिले लेकिन तद्भव छिनरी का पुलिंग शब्द छिनरा जरूर मिलता है...।
छिनरा का शाब्दिक अर्थ है लंपट, चरित्रहीन और परस्त्रीगामी। वहीं छिनाल या छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा,पर पुरुषगामी। रोचक बात यह है कि लोक ने उस स्त्री में छिपे छिनाल को खोज लिया जिसके गालों में हँसने पर गड्ढे पड़ते हों-
हँसत गाल गड़हा परै, कस न छिनरी होय।
क्यों नहीं लोक ने छिनरे के लिए भी कोई पद रच दिया...।
अपने गाँव के चचेरे भाई मटरू की दूसरी शादी में सुनी एक गारी याद आ रही है, यह गारी बाद में मुझे भी संबोधित थी -
मटरू क बहिन बड़ी पक्की छिनार चल देखि आई।
संस्कृत का एक और शब्द है छिन्ना। इसके मायने भी छिनाल ही है। आचार्य राम शंकर शुक्ल रसाल इसका अर्थ व्यभिचारिणी स्त्री ही बताते हैं। उस शब्द के पक्ष में उन्होंने एक पद भी उद्धृत किया है-
छिन्ना शिवा पर्पट तोय पानात।
इसी छिनार और छिनरा से बना है छिनारा....यह व्यभिचार के बदले प्रयोग होनेवाला आम शब्द है। कर्म का पतन अगर और हुआ तो हो गया कुकुर छिनारा।
महाभारत में कुलटा के बराबर का जो शब्द बार-बार सुनाई पड़ता है वह है पुंश्चली। पुंश्चली का अर्थ होता है-त्रपारंडा और स्वैरिणी। कुलटा और व्यभिचारिणी तो होता ही है। वहाँ सूर्य पुत्र कर्ण द्रौपदी को कहता है पुंश्चली। वहाँ भी वह अकेले छिनरी नहीं है साथ में उसके पाँच पति भी तो फुंश्चला हैं...छिनरा हैं।
छिन्न से ही एक और शब्द की याद आती है। वह है उच्छिन्न। इस शब्द का प्रयोग अवध में लिर्मूल हो जाने या चलन खत्म हो जाने के खास संदर्भ में किया जाता है। पूर्णतया उन्मूलित या नष्ट।
नोट- निहाल वाला पद मेरा अपना लिखा है..
Tuesday, June 17, 2008
मैं काशीवाला नहीं हूँ
काशी यानी बनारस से मेरा थोड़ा अजीब सा नाता है....
वैसे मैं पैदाइशी बनारसी यानी काशीवाला नहीं हूँ....लेकिन काशी जनपद का तो हूँ....जीवन में पहलीबार किसी शहर गया तो वह था बनारस......बनारस के घाट नदी का चौड़ा पाट...पतली गलियाँ....और उनमें सुहाग और पूजा के सामानों की दुकाने ....अपने लिए चूड़ियाँ और सिंदूर खरीदती सुहागिनें और उन्हें ताकती विधवाएँ....और बिसाती...नदी के तट से बँधी हिलती डोलती नावें....जैसे मोक्ष के लिए छटपटाता संन्यासी संसार के बंधन से छूट जाने को व्याकुल हो....।
यह सब मैं बालपन से देखता निरखता आया हूँ....लेकिन पिछले बीस सालों से काशी से दूर हूँ....फिर भी काशी की यही छवि मेरे मन में छपी है......
मैंने ठीक से तैरना काशी की गंगा में सीखा....मैंने जीवन के कई सारे विकट अनुभव बनारस की सीढ़ियों पर पाए....इसलिए काशी जाने और वहाँ सीढ़ियों पर बादलों की छाँव में बैठने और नदी के गंदले प्रवाह को देखने का मन करता है...और जैसे ही मौका मिलता है मैं काशी का रुख कर लेता हूँ....।
कहने को तो कहा जा सकता है कि काशी में क्या रखा है.....मैं कहूँगा कि यदि काशी में कुछ नहीं रखा है तो दुनिया में ही क्या रखा है....पतन किसका नहीं हुआ है....काशी का भी हुआ होगा....समय और बदलाव का दबाव काशी पर भी पड़ा है....लेकिन काशी का नशा मेरे मन से तनिक भी कम नहीं हुआ है.....।
मुझे सबसे अधिक आनन्द काशी की गंगा में नाव से भटकने में आता है....मैं काशी की गंगा का आनन्द लेने के लिए भादौं में जाना पसंद करता हूँ...तब गंगा में खूब पानी होता है....और भीड़ कम....नाव से भटकने के बाद बाद काशी के घाटों पर परिक्रमा करना अच्छा लगता है........वहाँ के घाटों में मणिकर्णिका घाट मुझे बहुत प्रिय है....वहीं पर मेरे बाबा की अंत्येष्ठि हुई....वहीं मेरी आजी भी जलाई गईं....इसलिए भी मैं वहाँ घंटों बैठा करता था....अब भी जब भी बनारस जाता हूँ और कही जाऊँ न जाऊँ...मणिकर्णिका घाट जरूर जाता हूँ....।
बचपन से ही बनारस के घाटों पर जाना और माथे पर चौड़ा तिलक लगाना और पूजा में चढ़ाई गई इलायची और नारियल मिला कर खाना एक नित्य क्रिया थी....घरवालों का दबाव न होता तो भाँग खाने की भी आदत पड़ी ही होती...यह सोचना बड़ा अच्छा लगता है कि अगर मैं भंगड़ होता तो कैसा होता मेरा जीवन.....आज भी पूजा का प्रसाद हो या वैसे ही इलायची और नारियल खाना अच्छा लगता है....यह बनारस को जीना है बनारस को अपने साथ रखना है....।
Friday, June 13, 2008
वैशाली जाने का मन है....
पहली बीड़ी की याद और यायावर मन
कितनी बार सोचा और तय किया कि बिहार और उत्तर प्रदेश के एक-एक गाँव और छोटे बाजारों और कस्बों तक जाऊँगा...लेकिन जाना नहीं हो पाया....कितनी-कितनी मुश्किल से बिहार में पटना, गया, हजारीबाग, मुजफ्फरपुर और एकाध शहरों के आगे नहीं जा पाया । उत्तर प्रदेश के 15 से 20 जिलों तक ही गया होऊँगा...जिनमें बलिया, गाजीपुर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, मीरजापुर, सोनभद्र, गोरखपुर, बस्ती, अकबरपुर, फैजाबाद, सुल्तानपुर, सिद्धार्थनगर, कौशांबी, इलाहाबाद, बाँदा, चित्रकूट, जौनपुर और प्रतापगढ़ शामिल है..। हो सकता है कि एकाध और जिलों में गया होऊँ...पर इससे क्या मैं कह सकता हूँ कि मैं हिंदी इलाके को जानता हूँ......।
मध्य प्रदेश राजस्थान के कई जिले तो मेरे लिए इतने अपरिचित हैं जैसे वे भारत में नहीं कहीं अफ्रीका या अरब में हो...हम लोग देश के राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं...और करना भी चाहिए...लेकिन क्या यह नहीं होना चाहिए कि हमें अपने देश के सब नहीं तो कुछ इलाकों तक तो पहुँच ही लेना चाहिए....।
मेरा मन बार-बार वैशाली जाने को करता है...मैं....सच में वैशाली जाना चाहता हूँ....क्या वहाँ आम्रपाली के होने का कोई निशान मिलता है ... सुनता हूँ कि अभी वैशाली बिहार में नहीं है...अगर हो तो भी न हो तो भी वैशाली जाना है....वैसे मैं झूमरी तलैया भी जाना चाहता हूँ....कभी रेडियो पर रोज वहाँ से फरमाइशें होती थीं...वे गाने सुनने वाले अभी भी वहाँ होंगे क्या...
राजगीर भी जाना चाहता हूँ....देखना चाहता हूँ कि क्या वहाँ अभी भी पांडव पर्वत है जहाँ सिद्धार्थ और बिंबिसार की पहली मुलाकात हुई थी....जहाँ मगध नरेश ने सिद्धार्थ को अपना सेनापति बनने के प्रस्ताव रखा जिसे...सिद्धार्थ ने ठुकरा दिया था...क्या वह गड्ढा अभी भी वहाँ के राजपथ पर होंगे जिसे ह्वेन सांग ने अपने यात्रा विवरण में दर्ज किया था...
फुलवारी शरीफ यह नाम मुझे बहुत पुकारता है....पलामू....डाल्टनगंज....कभी जा पाऊँगा क्या....गोमो स्टेशन कितनी बार गुजरा ....पर एक बार चाय पीने भर का समय ही यहाँ बिता पाया हूँ...यही वह स्टेशन है जहाँ से नेता जी अंग्रेजों की पकड़ से निकल भागे थे...ऐसा याद आता है कि इसी स्टेशन से मैंने चंपा नाम की पहाड़ी को देखा था... कोहरे पेड़ों और भाफ से ढंकी पहाडी ....उसी पहाड़ी को देखते हुए मैंने पहली बार बीड़ी पी थी...और फूट-फूट कर रोया था...बीड़ी का नाम था हिंद सवार . सामने की सीट पर बैठे एक दढ़ियल से माँग कर पी थी ....और मेरी रुलाई पर वह बुड्ढा बहुत परेशान हो गया था....एक बार गोमो की तरफ वहाँ जहाँ ऐसे पहाड़ हैं..जाना चाहता हूँ...
अगले दो-तीन महीने में देशांतर की संभावना है.......लेकिन उसके पहले..एकबार न बिहार अपने बनारस तो जा ही सकता हूँ....जाऊँगा....
Thursday, May 29, 2008
बछड़े और बेटियों का वध कर देते हैं वे
बेटियों के अस्वागत या दुत्कार का यह आलम है कि लोग आम बात-चीत में भी यह नहीं कहते की फलाँ को बच्ची होने वाली है...सभी यही कहते पाए जाते हैं कि उसे बच्चा होने वाला है।
आप वहाँ बेटी-बेटे के कोख में बनने और पैदा होने के वैज्ञानिक आधारों को समझने-समझाने की बात नहीं कर सकते....बेटा बेटी एक समान की बात....दीवारों पर अच्छी लगती है घर के आँगन में नहीं॥
अगर बेटी हो जाती है तो पहले उसको कम रख रखाव से मारने की कोशिश होती है, उसके बीमार पड़ने पर कहा जाता है कि ठीक हो जाएगी...बेटियाँ मरती नहीं हैं...। दुख की बात यह है कि ऐसी बातें औरतें भी आराम से करती पाई जाती है...। लेकिन जब बेटा बीमार होता है या जब बेटा मरता है तो लोग छाती पीट कर रोते हैं उसका पैदा होना और मरना दोनों हाहाकार लेकर आता है...वहीं जब बेटी मर रही होती है या मर जाती है तो लोग धीरे से बल्कि कहूँ तो चेहले पर एक मुस्क्यान लाकर केवल बताते हैं कि उसकी बेटी जो अभी हुई थी मर गई...फिर कोई कहेगा कि मरना ही था तो पहले मर जाती...। और बात आई-गई खतम सी हो जाती है...।
यह सारी स्थितियाँ मैं ने खुद देखी हैं...यह देश के अन्य हिस्सों का सच भी हो सकता है फिलहाल मैं भदोही, मीरजापुर और बनारस की बात कर रहा हूँ...यहाँ अगर गाय या भैंस को बेटी हो यानी बछिया और पड़ियाँ हो तो सब खुश होते हैं....लेकिन अगर बछड़ा या पड़वा हो जाए तो उसका दूध बंद...। उसके मुह पर एक खोल चढ़ा दिया जाता है...कोशिश की जाती है कि वह बछड़ा या पड़वाँ जल्द से जल्द मर जाए । जिससे उसके हिस्से का भूसा-चारा भी बचे । दैव- दुर्योग से अगर वह गाय-भैंस पुत्र अपने आप नहीं मरता तो जरा सी उम्र बढ़ते ही उसे काटने के लिए कसाई को बेच दिया जाता है...।
बेटी बोझ है क्योंकि उसे विदा करना है, उसकी पढ़ाई पर खर्च नहीं करना है क्योंकि उसे पढ़ाने का वैसा सीधा फायदा नहीं जैसा बेटे को पढ़ाने का है...
वहीं बछड़े को बदलते समय में ट्रैक्टरों ने फालतू बना दिया है....एक दो हल बैल की खेती हो बड़े किसान सब ट्रैक्टर पर निर्भर करने लगे हैं...इसलिए बछड़े और पड़वे की कोई आवश्यकता नहीं रही...
बछिया गाय होगी दूध देगी....बेटी दहेज लेगी दूर होगी...इस लिए बछिया चाहिए बेटी नहीं...
बेटा चाहिए बछड़ा नहीं...।
ऐसे माहौल में बेटियाँ रोज मर-मर कर बड़ी होती है...
हो सकता है पिछले महीने भर में स्थितियाँ बदली हों...क्योंकि सुना है दुनिया तेजी से बदल रही है पर लगभग यही हालत है...बेटी को मारो या मरने दो....बछड़े को मरने दो या मारो...। बेटा जिलाओ....बछिया जिलाओ....।
Saturday, May 24, 2008
प्रमोद और प्रत्यक्षा उर्फ साधु वचन का मर्म
1-मुँहफट होने और खरी-खरी कहने का पैदाइशी हक सिर्फ प्रमोद जी को है, अगर और कोई ऐसा करता है तो गलत करता है ......प्रमोद जी की मुँह फटई उनका गुन है...उनकी खरी, खरी है...बाकी की खरी, में खोट है....
2-मैंने किसी प्रत्यक्षा को कभी फोन नहीं किया है और अगर मेरे फोन से उन्हें फोन गया होगा तो उस संदर्भ को वे मुझसे बेहतर समझ सकती हैं....
3-मैंने किसी सलेक्ट सर्किल में कभी प्रत्यक्षा का नाम लिया हो ऐसा मुझे याद नहीं...यह उनका भ्रम है कि लोग उनके बारे में बात करके दिन बिताते हैं...
4- हो सकता है जब प्रत्यक्षा ब्लॉगगिंग का बी कर रहीं थी मैं गाँव में बथुआ बो रहा होऊँ....तो क्या मुझे अभी ब्लॉगर बनने का हक या कुछ कहने का अधिकार नहीं रह जाता.....क्या ब्लॉग वेद हैं....जिस पर केवल प्रत्यक्षा का ही हक है....किसी बोधिसत्व का नहीं...
5-लोगों को फोन करने और बात करने का हक भी सिर्फ प्रमोद और प्रत्यक्षा को है....बाकी कोई करे तो गलत है...हालाकि मैंने किसी को फोन नहीं किया है....साहित्यकारों की दुर्दशा वाली पोस्ट को छोड़ कर
6-किसी बूढ़े प्रकाशक को खुश करने की बात मैंने सामान्य संदर्भ में कही थी...जिस पर बिदक कर ये दोनों साहित्यकर्मी अपनी दाढ़ी के तिनके नोच रहे हैं...और उस नोच-खसोट का प्रदर्शन कर रहे हैं....
7-मैं परिपक्व इंसान नहीं हूँ.... यह तो मैं भी जानता हूँ... .कोई नहीं होता ...बस दो ही लोग परिपक्व है.... प्रत्यक्षा जी और प्रमोद जी...आप दोनों परिपक्व होने की बधाई स्वीकार करें....
8-मित्रता वही है जो प्रमोद और प्रत्यक्षा की है...बाकी दुनियादारी है....स्वार्थ का गठबंधन है...अगर अभय तिवारी मेरे बारे में कुछ लिखते हैं या मुझे खलनायक नहीं मानते तो यह भी उनका अपराध है..
9-कोई यदि बोधिसत्व का समर्थन करेगा तो वह अकेला पड़ जाएगा.....यह धमकी देकर प्रत्यक्षा जी क्या कहना चाहती है.....क्या किसी ब्लॉगर को अकेला करने की सोचना कुंठित और तानाशाही चरित्र की निशानी नहीं है....
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10-किसी की बात को छिछला कहने का डीग्रेड आदि शब्दों से नवाजने का हक सिर्फ प्रत्यक्षा को है.....क्योंकि वे ही ऐसा कर सकती है....
10- मेरी पत्नी आभा की किताब अगर किसी को साध के छपानी होती जैसा की आप संकेत कर रही है....तो भी अभी नहीं छपती क्यों कि उसे ढ़लती उमर ( यह शब्द मेरे नहीं आदरणीय प्रमोद जी के हैं) का अपराधबोध नही है...जैसा कि प्रमोद जी के मुताबिक आपको है...
11- अगर आभा लेखन में दम नहीं होगा और छपास बलवती होगी तो हो सकता है कि आभा को भी किसी को साधना ही पड़े...
...
12-लीद, लड़ियाना, लथर-पथर...होना सब प्रमोद जी की बपौती है....वह उन्हीं के पास रहे....
14- प्रत्यक्षा काम-काजी महिला हैं.....लोगों को हैंडिल करना जानती हैं.... खास कर कर्मचारी या मजदूर वर्ग को....मैं उनसे आग्रह करूँगा कि किसी को बदले की भावना और संदेह के आधार पर हैंडिल न करें......
15- प्रमोद जी से उम्मीद करूँगा कि उनके मन में मेरे प्रति जो भी घृणा या हिकारत होगी मेरी इस पोस्ट पर ही निकाल लेंगे.....क्योंकि मैं हो सकता हैं आगे खुद पर थूकने का कोई भी मौका उन्हें न दूँगा..
16- मेरी पत्नी को निशाना बनाने के बाद अब मेरे परिवार में केवल भानी और मानस यानी मेरी बेटी और बेटा ही खल पात्र बनने से रह गए हैं....प्रत्यक्षा और प्रमोद जी मौका मत चूकिए । प्रमोद जी आप तो परसों-चौथा दिन मुझे देखने और बच्चों से मिलने घर भी आए थे....कोई न कोई धारणा तो बनाई होगी....उनके बारे में भी उसे भी लिख दीजिए...दबाकर दस बरस बाद निकालने से बेहतर होगा कि आज और अभी निकालें...हम सपरिवार आपकी राय का स्वागत करेंगे......
Friday, May 23, 2008
चपे रहो प्रहरी प्रमोद जी
मैं लिखना नहीं चाहता था लेकिन लिख रहा हूँ
अजदकेश प्रमोद जी करुणा के अवतार हो गए है....अवधर दानी हो गए हैं.....मुंबई में रहते हैं सिनेमा टीवी के लिए लिखते भी हैं.....और न लिख पाने पर छटपटाते भी हैं....खुद दुखी रहते हैं...लेकिन इस महाद्वीप में किसी का दुख उनसे न सहा जाता है न देखा....और जब दूसरों को दुख से उबार रहे होते हैं तो सामने वाले को बिना दुख में डुबाए उनको सुख नहीं मिलता....। शिव तो सर्व कल्याणक थे..लेकिन प्रमोद जी केवल दुख दाता हैं......मोटे शब्दों में वे प्रतिशोधी सखा है....।
मेरी एक - दो पोस्ट से ही नहीं उन्हें मेरे समूचे लेखन और खुद मुझसे अपार तकलीफ है.....और तकलीफों के कम से कम तीन अनुभव तो उन्होंने सहेज कर रखे ही हैं.....अपने अजदकी चरित के मुताबिक वो पूरी तरह से अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष साबित करने में लग गए हैं.....सामान्य रूप से कही गई मेरी बातों को वे पता नहीं किस-किस से जोड़ कर देख रहे हैं....।
हिंदी प्रदेश की यही दिक्कत है आप एक काम की या कैसी भी बात करते हैं.....तो सामनेवाला उस पर लड़ियाने याने नंगे होकर कूदने लगता है॥ लड़ियाने में और नंगई में प्रमोद जी सबके सरदार हैं....और कम से कम मुझे उनसे अच्छाई का कोई प्रमाण पत्र नहीं चाहिए.....और नहीं मैं उनसे नंगई का कोई गुर सीखना चाहूँगा।
रही बात प्रमोद जी के सवालों पर चुप रहने की तो यही कहा जा सकता है कि फालतू टाइप के आमोदी-प्रमोदी यानी बचकाने सवालों के उत्तर देने की फुर्सत में मैं नहीं हूँ....और हर महान प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है....... और जब महा महान प्रश्न सामने होते हैं....तो हींहीं करने या दाँत चियारने के अलावा कुछ करने का मन नहीं करता.....लेकिन अगर प्रमोद जी इतने उत्तराकांक्षी हैं तो मैं सार्वजनिक रूप से उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूँ....वो करें सवाल.....।
जवानी में आदमी सामना करता है....ढलती उमर में चुगलखोर हो जाता है....वह लगाने बुझाने लगता है....बुढ़ापे में आदमी पर दुख कातर हो जाता है....किसी के लिए भी रोने लगता है....मैं यह नहीं कहूँगा कि प्रमोद भाई ढल गए हैं या बुढ़ा गए हैं....पर लक्षण सही नहीं हैं....उन्हें. अपना धीरज नहीं खोना चाहिए.....प्रहरी प्रमोद की भूमिका की उमर नहीं रही.....उनकी.....अब....। अंग रक्षक बनने का खेल हम लोग तो पढ़ाई के दिनों में खेलते थे...पर प्रमोद जी अभी भी मौका तलाश ही लेते हैं....इलाहाबादी लत जो लगी है...।
मैं उम्मीद रखूँगा कि इस पोस्ट के बाद भी प्रमोद जी लड़ियाते हुए.....बिना किसी राग-विराग के ढलती संझा में अर्थ का अनर्थ करने और औरों के घाव सहलाने या दुख को कम करने का व्रत छोड़ नहीं देंगे.....चपें रहेंगे.......।
Thursday, May 22, 2008
पर उपदेस कुसल बहुतेरे........
मेरा दिल बहुत साफ है.....इतना साफ है कि आर पार दिखता है....पर दर्पण बनने के लिए आर-पार देखना बंद करना पड़ता है तो क्या करूँ....बंद करूँ या संन्यासी सा बना रहूँ.....कम से कम अभी इस वक्त मेरे मन में कोई कामना या महत्वाकांक्षा या लालसा नहीं है.....मुझे पाठक नहीं चाहिए...मुझे लोकप्रियता नहीं चाहिए, मुझे शास्त्रीयता से बेहद प्यार है.....जहाँ-जहाँ शास्त्र या शास्त्रीयता देखता हूँ.....बलखाने लगता हूँ.....लांगूल हिलाने लगता हूँ.....वहीं... लोकप्रियता के प्रत्यक्ष होते ही इतना डर जाता हूँ कि आँखे बंद कर शास्त्रीयता-शास्त्रीयता का जाप करने लगता हूँ....
क्यों न करूँ....बंद आँखे.....जब शास्त्रीयता का लोकप्रियता से इतना बड़ा बैर साबित कर दिया गया है....तब तो सावधान होकर ही जीना पड़ेगा......क्योंकि हमें तो कहीं जाना है....जहाँ सिर्फ शास्त्रीय हो कर ही मैं जा सकूँगा.....लोकप्रिय हो कर नहीं.....मैं वह परम् पद इस ससुरी लोक प्रियता के झाँसे में कैसे कुर्बान कर दूँ.....लोकप्रियता का भी कोई चरित्र होता है.....
लोकप्रियता तो एक दिन की लाली है....शास्त्रीयता तो सार्वकालिक है...कुछ नए साहित्यिक साधु और साध्वियों से सुनते हैं जो मजा शास्त्रीयता का है वह लोकप्रियता में कहाँ है......हाँ गाहे बगाहे दोनों का मजा लेने में गुरेज नहीं....बस सावधानी जरूरी है...
अब गार्गी, व्यास, बाल्मीकि, कालीदास, तुलसी, सूर, मीरा, कबीर, मीर,गालिब, भारतेंदु, इकबाल, प्रसाद, पंत, महादेवी, निराला, परसाई, श्रीलाल शुक्ल क्या खाक शास्त्रीयता के पद का मजा पा सकेंगे....भूल से लोक प्रिय जो हो लिए....कितना पछता रहे होंगे सब अनाड़ी, छाती पीट रहे होंगे कि काश पहले पता चल गया होता तो लोकप्रिय होने की चिरकुटई से बच लिए होते.....इतना ओछा काम क्यों करें जिससे जीवन भर की कमाई खाक हो जाए....धिक्कार है लोकप्रियता धिक्कार है....सब वहीं से लौट आते जहाँ से लोक प्रियता की गंदी गली शुरू होती है....गली के कोने पर भले ही मजार बन जाता या समाधि पर उस गली में दाखिल न होते....पर क्या करें.....अब पछताने से क्या होता है.....हाथ मचते हैं और रोते हैं....इश्क पर समझाते थे साले सब लोकप्रियता....पर चुप रह जाते थे...
आज के सच्चे उपदेशक तब कहाँ थे....गलती हो गई....तो हो गई...।
पाठकों की चिट्ठियों का न सही तो साधुओं के सिर हिलने का इंतजार किया.....इसका ध्यान रखा कि जो कह रहा हूँ वह सब समझ तो रहे हैं न.....यहीं तो महान अपराध हुआ...... जिस पाठक की बुद्धि संकुचित है उसकी परवाह करोगे तो क्या रचोगे.....
इसलिए हे ब्लॉगरों अगर साहित्यकारों वाले महान स्थान पर या उसके आगे का मुकाम, ऊँचाई, मंजिल, पाना चाहते हो वहाँ अपना झंडा गाड़ना या फहरना चाहते हो तो पाठकों की प्रतिक्रिया, उनकी राय पर लात मारो और अपने मन की लीद बिखेरो.....वह कागज के पन्नों ब्लॉग पर छपते ही प्रसाद हो जाएगी....तो लीद करो और मस्त रहो....जैसे साहित्य की दुनिया में आज कवि-कथाकार मस्त है.....
बस एक काम करो....कुछ कविता कथा नुमा लिखो....किसी प्रकाशक को साधो और उनके एकाध बूढ़े मालिकान को बाकी तो सध ही जाएगा....
भाइयों मैं भी वहीं जाना चाहता था जहाँ सब साहित्यकार ब्लॉगर जा रहे थे...पर साहित्यकार भी कहाँ पहुचे हैं समझ नहीं पा रहा हूँ......उसके आगे कहाँ जाऊँ....कोई है जो राह दिखाए.....कहाँ जाऊँ....क्या करूँ....कोई साधू-साध्वी हो तो बताए.....कहाँ पहुँचे हैं....ब्लॉगर या जो साहित्यकार ब्लॉग कर रहे हैं वो जहाँ पहुँच गये हैं......और वह पवित्र स्थान कहाँ हैं जहाँ हम सब जाना चाहते हैं और उसके आगे भी
Wednesday, May 21, 2008
खली बना खबरिया चैनल का हेड !
अगर किसी खबरिया चैनल में काम पाना हो तो यह जानना बेहद जरूरी है कि खली कितना खाता है
खली कितने किलो का है....उसका वजन कितना है....उसकी छाती कितनी चौड़ी है और वह लंबा कितना है......अगर आपके पास यह सारी जानकारी नहीं है तो आप चिरकुट हैं....आप का कुछ होता सा मुझे नहीं दिख रहा है....।
क्योंकि खली को लेकर एक खबर आई है अब यह खबर कितनी पक्की है कितनी नहीं पर है तो। सुनने में आया है कि कई हिंदी खबरिया चैनलों में बाहुबली खली को अपने यहाँ सीईओ बनाने की होड़ लगी हुई है...एक चैनल के बड़े कर्ता-धर्ता ने तो खली से यह तक कहा कि वह बाबा रामदेव के योग की जगह खली कैसे बनें जैसा कार्यक्रम भी बना सकते हैं...
रोचक बात यह है कि खली भी तैयार है लेकिन वह चाहता है कि उस कार्यक्रम में संवाद का प्रयोग कम हो और शरीर का संदर्शन अधिक.....चैनल तो इस बात के लिए भी राजी है कि वह खली के रसोईं से लेकर शौंचालय तक में उसकी हरकतों गतिविधियों के लाइव फुटेज भी दिखा कर अपना काम कर लेंगे....एक चैनल के ईपी ने तो खली के कार्यक्रमों के लिए कुछ शीर्षक भी बना लिए हैं....जो कुछ इस तरह है-
१-खुले में खली
२-खली के साथ खेल
३-खली को खोल के खेलो
४-शौंचालय में खली की खलबली
कल से खली, टॉप टीआरपी वाले तीन चैनलों में से किसी पर भी अपने शौंचालय में घुसता,धोता या सुखाता पोंछता दिखे तो इसे आप अपना सौभाग्य समझिएगा.....वह कहाँ से चलकर यहाँ तक आया है और चैनल के लोग उसके यथार्थ रूप का साक्षात दर्शन कराए बिना नहीं मानेंगे....और माने भी क्यों ऐसा मौका बार-बार कहाँ आता है......
खली को चैनल का प्रमुख बनाने वालों का मानना है कि बुद्धि और स्क्रिप्ट से बहुत दिन चल गया चैनल अब थोड़ा बल से चला लिया जाए हो सकता है कि बल से कुछ भला हो ही जाए....
दिल्ली के एक और संपादक ने तो खली की स्तुति में बिहार से चालीसा लेखकों की एक टीम बुला ली है...और सुनने में आया है कि चालीसा लेखकों ने अपना हाथ उठा दिया है । उनका कहना है कि खली जैसे बली की महिमा का बखान चालीस पंक्तियों में हो ही नहीं सकता। इतने विराट शरीर का बारीकी से अंकन करने के लिए यानी गुणगान के लिए कम से कम खली-पुराण या खलायण की रचना करनी होगी....चालीसा रचने वालों की बातों से चैनल सहमत है और उसने बिदर्भ और बुंदेलखंड के कुछ लोक गायकों को भी खलायण प्रोजेक्ट में जोड़ लिया है....कल से ही तमाम भूखे किसान खली की आरती, खली -चालीसा और खलायण के लिए लोक धुने बनाने में लग गए हैं....
खली खुश है, चैनल खुश हैं....चैनल के मालिकान खुश हैं....और सब की खुशी में मैं भी दाँत चियार कर खली-खली का जाप कर रहा हूँ। आप भी मेरे साथ बोलें जय खलीश्वर की।
Tuesday, May 20, 2008
ब्लॉग जगत में भी दुर्दशा के शिकार साहित्यकार
हिंदी के जमें जमाए साहित्यकार ब्लॉग की दुनिया में भी पटखनी खाए पड़े हैं...तो दूसरी ओर वे ब्लॉगर जम कर पढ़े और सराहे जा रहे हैं जो साहित्यकार नहीं रहे हैं...यहाँ किसी साहित्यकार ब्लॉगर का नाम लेकर मैं किसी का दिल नहीं दुखाना चाहता लेकिन जितना तीन ब्लॉगर यानी फुरसतिया, उड़नतश्तरी और शिव कुमार मिश्र का ब्लॉग पढ़ा जाता है उतने ही पाठक संख्या में सारे साहित्यिक ब्लॉगर सिमट जाते हैं....आखिर इसकी क्या वजह हो सकती है...एक से एक धुरंधर लेखक जब ब्लॉग पर अपनी पोस्ट छापता है तो उसे पाठकों के लाले क्यों पड़ जाते हैं...टिप्पणियाँ उसकी पोस्ट का रास्ता भूल जाती है...पसंद होना तो सपना है...
मुझे निजी तौर पर यह लगता है कि साहित्यकार ब्लॉगर अपने अतीत के गौरव से इतना दबा होता है कि वह मुस्कराना तक भूल जाता है....हर पल उसे यह लगता रहता है कि मैं तो फलाँ हूँ और मुझे सामान्य या सहज सरल बात करना शोभा नहीं देता....मैं तो गंभीर लेखन के लिए ही अवतरित हुआ हूँ....और वह अपने जबड़े को भींच कर लगातार एक से बढ़ कर एक उबाऊ पोस्ट ठेलता जाता है....और उसके आसपास कुछ गिने चुने पुराने परिचित पाठक ही फर्ज अदायगी में आते रहते हैं....और बह साहित्यकार ब्लॉगर गदगद भाव से अपने ब्लॉग को निहारता रहता है.......
मन में आया तो कभी कोई कविता छाप दी....फिर कुछ गद्यनुमा लिख दिया फिर कुछ पद्य नुमा छाप दिया .....साहित्य की दुनिया की तरह उसे असल में अपने पाठकों की पड़ी ही नहीं है.....पाठक गए भाड़ में मैं तो अपने मन की ही करूँगा......कुछ ऐसे ही भाव लेकर डूबता-उतराता रहता है...साहित्यकार ब्लॉगर.....
यह मेरा अपना आकलन है हो सकता है मैं पूरी तरह सही न भी होऊँ....पर मुझे लगता है कि ब्लॉग जगत में साहित्यकारों की दुर्दशा का कारण ऐसा ही कुछ होगा...
Friday, May 16, 2008
मनीष जोशी उर्फ जोशिम कहाँ हो तुम

आशा का गीत : आशा के लिए
बस ना धुलें अच्छे समय के वास के दिन
वह संग चलते मरमरी अहसास के दिन
जो अंत से होते नहीं भी ख़त्म होकर सच
ठीक वैसे मृदुल के परिहास के दिन
हल्के कदम की धूप के, टुकड़े रहें जी
सरगर्म शामों के धुएँ, जकड़े रहें जी
राजा रहें साथी मेरे, जो हैं जिधर भी
बाजों को अपनी भीड़ में, पकड़े रहें जी
हो मनचले नटखट, थोड़े बदमाश के दिन
बस ना धुलें, अच्छे समय के वास के दिन
दूब हरियाली मिले, चाहे तो कम हो
रोज़े खुशी में हों, खुशी बेबाक श्रम हो
राहें कठिन भी हों, कभी कंधे ना ढुलकें
पावों में पीरें गुम, तीर नक्शे कदम हो
मैदान में उस रोज़ के शाबाश के दिन
बस ना धुलें अच्छे समय के वास के दिन
कारण ना बोलें, मुस्कुरा कंधे हिला कर
झटक कर केशों को, गालों से मिला कर
पानी में मदिरा सा अनूठा भास दे दें
हल्के गुलाबी रंग से भी ज़लज़ला कर
कुछ अनकही, भरपूर तर-पर प्यास के दिन
बस ना धुलें अच्छे समय के वास के दिन
दीगर चलें, चलते रहें राहे सुख़न में
प्यारे रहें, जैसे जहाँ में, जिस वतन में
जो आमने ना सामने हों, साथ में हों
क्लेश के अवशेष बस हों तृप्त मन में
मिलते रहें, चम-चमकते विश्वास के दिन
बस ना धुलें अच्छे समय के वास के दिन।।
नोट-हो सकता है कि कुछ पंक्तियाँ ऊपर नीचे हो गई हों....जोशिम जी के अपनों माफ करना।
Saturday, May 10, 2008
पत्नी की पोस्ट पति के ब्लॉग पर
सब दिखावा है....
कुछ भी सच नहीं है....
दिखावे पर दुनिया कायम है...
तो क्या हम भी दिखावा कर रहे हैं...
सच्ची....बक्क
मत करो न
मिटाओ सब....बंद करो बंद करो इसको मिटाओ....मिटाओ
इसे मिटा दो...मिटा दो यार....
(एक लंबी हंसी)
क्या यार मेरी पोस्ट लिखने दो छोड़ो की बोर्ड
लिखने दो या जाने दो
इतने दिन बाद लिखने आई हूँ तो बोर कर रहे हो....
तुमने मेरा हाथ दर्र दिया.....
(एक न रुकने वाली हँसी)
मैं जाऊँ....
अब जाऊँगी तो हाथ मत पकड़ना
मैं कह देती हूँ...ठीक नहीं होगा
देख लो लाल पड़ गया
हाथ है कि लकड़ा है...
हाथ....मत पकड़ना...
अच्छी मुसीबत है...कमाल हो
मैं की बोर्ड पकड़ कर ....समझ लो...
ये कबाड़खाने पर क्या बज रहा है...
अब न बजाओ श्याम....बंद करो
बच्चे सो रहे हैं...
ये तुम्हारी पोस्ट है क्या ....कुछ भी...छाप दोगे
हिंदी कविता है क्या...
कुछ भी चार लाइन लिख दिया
कैसी गंदी आत्मा हो तुम यार
मैं सोने जाऊँ...
मुझे सबेरे उठ कर बहुत सारा काम करना है...
नल खुला है...बंद करो....पानी बह रहा है...
पानी मत बरबाद करो....तुम तो नहाने जा रहे थे...जाओ...चलो.....
यह आदमी न जीने देता है न मरने देता है...
ये सब क्या लिख रहे हो....
(फिर हँसी)
अब या तो मैं खुद से टाइप करूँगी या कभी ब्लॉग नहीं लिखूँगी
चाहे साल भर हो जाए
अपने या
फिर तुम ही टाइप करो...अब मैं जाती हूँ...
लिखो ब्लॉग....
तुम क्यों अपना टाइम बरबाद कर रहे हो...जाओ पढ़ो...
Thursday, April 24, 2008
सज्जनता का नाश हो
हममें से बहुत सारे लोग इस गलत फहमी में जी रहे होते हैं कि दुनिया अच्छाई की कद्र करती है...भले मानुष का बहुत महत्व होता है......नेकदिल लोगों की इबादत की जाती है.....साधुता एक बहुत जरूरी गुण होता है .....दया माया ममता स्नेह सौहार्द्र सौम्यता सब की बडी आवश्कता होती होगी....पर किसी और समाज में ....आज तो टुच्चई ही पूज्य है वरेण्य है....। जो सीधा और शान्त है लोग उसे कायर और नाकारा समझते हैं....किसी ने कहा है-
बड़ो बड़ो कह त्यागिए छोटे ग्रह जप दान
यहाँ भी छोटे का अर्थ वही है टुच्चा। यानी अगर आप सीधे सरल हैं तो आप पिसने के लिए, लात खाने के लिए तैयार रहे.....कोई आप की सिधाई और सरलता को माला फूल लेकर पूजने नहीं आ रहा है....।
इलाहाबाद की याद बुरी तरह आती है....रोज ही या कहें कि हर पल याद करता हूँ....आजकल वहाँ के एक लेखक की जिंदगी साहित्य के इतर कारणों से चर्चा में है.... जीवन भर जम कर हिंदी की सेवा करनेवाले एक शानदार लेखक अमरकांत आर्थिक तंगी से जूझ रहे है....लेकिन उनकी दिक्कतों की किसे पड़ी है....जितने साल इस महालेखक ने साहित्य में दिए हैं उतने राजनीति में दिए होते तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि और कुछ होता या न होता अर्थ का अभाव तो शायद न होता....।
तो क्या अमरकांत जी यह आर्थिक बदहाली उनकी सिधाई और सरलता का परिणाम है.....अगर नहीं तो दर्जनों किताबों से हिंदी कथा साहित्य को समृद्ध बनाने वाला एक लेखक किन्हीं भी कारणों से परेशान क्यों है....।
मेरा दृढ़ मत है कि हाँ अमरकंत जी ही नहीं किसी भी लेखक कलाकार की बदहाली उसकी सरलता का कुपरिणाम है....वैसे भी हिंदी समाज में लेखक का मतलब ही है फालतू जीव.....एक लेखक की कौन सुनता है...उसके कहे से कितनों को नौकरी मिल जाती है....कितनों का रुका हुआ काम बन जाता है....मन माफिक शहर में दबादला हो जाता है....वह एक ऐसा प्राणी होता है जो पैदा होते ही बोझ सा हो जाता है....
क्या होगा अमरकांत जी का कुछ लोग थोड़े दिनों तक हूँ....हाँ करेंगे....फिर चुप हो जाएँगे.....क्यों कि एक लेखक की मुश्किल कभी समाज की मुख्य चिंता नहीं बन पाती है.....और
उसके विचार उसे समाज में फैली लूट में शामिल नहीं होने देते और वह अपनी सैद्धान्तिक पिनक में समाज को सही दिशा में लाने के लिए कलम घिसता रहता है....व्यास, बाल्मीकी, कालिदास, तुलसी, कबीर , सूर, मीरा, निराला, प्रेमचंद, त्रिलोचन, नागार्जुन, मुक्तिबोध......सब ने यही किया उचित अनुचित का सवाल खड़ा किया...लूट में टूट कर शामिल नहीं हो गए.....और बिललाते रहे....रोते रहे....
जो भी बदलाव चाहेगा.....बहुत विचार-विचार करेगा....रोएगा....जिसे तर माल खाना हो.....दारोगा बनो....एक पंक्ति ठीक ने लिखना जानते हुए किसी चैनल या अखबार के संपाजक बनो....सत्ता की गलियों में पूछ हिलाने का अभ्यास करो.....विचार से बचो.....दुविधा से दूर रहो......न्याय का मान न लो....साधुता को दूर से सलाम करो.......फिर चाहे कहानी लिखो चाहे कविता....हर मंजिल पूछ से बधी रहेगी.....हर समारोह में जयकार होगी....
मैं निजी तौर पर हमेशा फालतू की सज्जनता को खारिज करता रहा हूँ....क्योंकि आज मेरा या हमारा समाज बहुतायत में बेइमान है.....अभय भाई का कहना सही है कि ऑटो रिक्शा वाले बेइमान है....पर वे अकेले नहीं है जो दाएँ-बाएँ से अपनी झोली भरना चाह रहे है...आज लूट एक राज धर्म है......और पकड़े न जाना एक सामाजिक कला.....जो पकड़ा नहीं गया वह चोर नहीं है....
इसीलिए कहता हूँ कि आज सारी नैतिकताएँ बोझ हैं.....जो सीधा सरल है वह दरअसल आत्म घाती है....सरलता शत्रु है.....सिधाई दुशमन है........समय है अपनी कोहनियों में खंजर बाँध कर दौड़ने का.....अगल-बगल वालों को न सिर्फ घायल कके पीछे छोड़ने का बल्कि लंगी मार कर गिराने का वक्त है...यह क्योंकि सिर्फ चाहने से कुछ नहीं होता.....साहित्य के विचारों को लागू करने वाले लेखक जब तक नहीं आएँगे.....तब तक यही होगा....विचार विचारणीय और सोचनीय बन कर रह जाएँगे....और लोग कहेंगे कि आदमी अच्छा था लेकिन बड़ा सीधा और विचारक टाइप का था....कुछ-कुछ साधुता से भरा.....
तो साधुता का नाश हो
सिधाई का नाश हो
सज्जनता का नाश हो.......
