Wednesday, March 26, 2008
मुंबई में इलाहाबाद की खोज
जब तक इलाहाबाद में रहा तब तक वहाँ अपने गाँव को खोजता रहा...अब मुंबई में हूँ तो यहाँ गाँव और इलाहाबाद दोनों को खोज रहा हूँ....और दोनो नहीं मिलते...।
इलाहाबाद से गाँव नजदीक था तो मौका मिलते ही चंपत हो लेता था...मेरे लिए गाँव जाना घरूमोह की तरह नहीं था...मैं गाँव जाता था....क्योंकि वहाँ गए बिना कोई चारा नहीं था....मैं यहाँ किसी तरह की सफाई देने नहीं आया हूँ कि मैं बड़ा गाँव भक्त और देशी टाइप का आदमी हूँ....मेरी आत्मा पल -पल गाँव के लिए तड़पती है यह कहने के लिए भी यहाँ हाजिर नही हुआ हूँ....
बस गाँव की याद आ रही है....गाँव के वो पेड़ याद आ रहे हैं जो एक-एक कर गिरते जा रहे हैं....मिठवा भी गिर गया, माँ बता रही थी.....संतरहवा भी कभी भी गिर सकता है....सेन्हुरहवा भी सूख गया....अमवारी लगभग खाली हो गई है...वही हाल महुआरी का भी है...सब कुछ सूख रहा है गाँव में और मैं लगभग १५०० किलोमीटर दूर बैठा केवल गाँव को याद कर रहा हूँ....उसके बारे में लिख रहा हूँ...
कभी। मैंने अपनी एक कविता में लिखा था कि मेरी कजरारी सीपी सी आँखों में बसा है मेरे गाँव का नक्शा...२२ साल बीत गए हैं गाँव को छोड़े पर आज भी मेरी आँखों में बसा है मेरा गाँव। १९८६ के मार्च अप्रैल में गाँव से विदा विदाई की स्थिति बननी शुरू हुई थी....जून में जाकर यह तय हो गया कि मैं इलाहाबाद जाऊँगा...पढ़ने....और गाँव छूट गया....
और जो चीज अनचाहे छूटती है वह बहुत याद आती है...
इस समय वहाँ आम बौरा गए होंगे....टिकोरे हवा की मार रहे से कभी कदा धरती पर आभी जाते होंगे...कोयल की कूक गूँजती होगी.....उस कूक की हूक मैं यहाँ तक सुन रहा हूँ....खलिहान में साफ सफाई हो रही होगी....गेहूँ कटेंगे....मड़ाई के उत्साह से मन मगन होगा और खलिहान के ऊपर बादल का एक छोटा टुकड़ा भी सब को डरा जाता होगा....
किसान का बेटा हूँ....हल चलाया है ....बीज बोए हैं...खेत तक अपनी मेहनत से पानी पहुँचाया है...जाग कर अपने खेतों की रखवाली की है...छुट्टे साड़ों को खेतों से खदेड़ा है...मेंड़ पर खड़े रह कर सिर्फ खेतों के नजारे नहीं लिए हैं....हंसुआ पकड़ कर गेहूँ-धान और गड़ासे - दराती से गन्ना अरहर काटा है....अरहर की खूठियों ने पैरों में न जाने कितने घाव किए....और हमने सब सहा.....
भाषा के व्याकरण से अधिक जीवन के छंद से लड़ना पड़ा है....और गा की याद उस लड़ाई की याद है जो अभी भी जारी है....वह मेरे अतीत की समाधि अभी नहीं बनी है....अभी उसको श्रद्धांजलि देने का समय नहीँ आया है....कोयल की कूक यहाँ भी सुनाई पड़ जाती है....पर वह किस पेड़ पर है यह नहीं समझ में आता....कल भोर में यहाँ कोई कोयल कूकती रही....मैं परेशान हो गया कि यह कहाँ कूक रही है...क्या यहाँ भी.....कोई गाँव है....अगर मैं परदेशी हूँ तो यह गाँव किसी का तो होगा....वे कौन लोग हैं....जिनके गाँव में मैं बस गया हूँ....मुंबई में मेरा घर चारकोप गाँव में पड़ता है.......पर यहाँ तो अब केवल कागज में गाँव लिखा है....मुंबई में कई गाँव हैं....जैसे गोरे गाँव, नाय गाँव, तो ठाकुर विलेज है...
रात में कूकने वाली उस कोयल को नहीं पता होगा कि वह जहाँ कूक रही है...वह अब गाँव नहीं एक महानगर का भाग है....और उसके इलाके में बहुत सारे परदेशी आ बसे हैं....नागरिकता ले ली है...और भगाए जाने पर भी भागने को राजी नहीं हैं....शायद चारकोप गाँव के मूल लोग जान पाते होंगे कि वह कोयल किस पेड़ पर हूक रही थी....या कूक रही थी....
सच बात है अपने गाँव के हर कोने अतरे से हम परिचित होते हैं....यहाँ तो दूसरी बिल्डिंग के लोगों को अब तक नहीं जान पाया हूँ और शायद जान भी न पाऊँ.....पर गाँव भिखारी राम पुर या इलाहाबाद तक में ऐसा नहीं था.....वहाँ भी अल्लापुर के बाघम्बरी गद्दी में पंछियों के कलरव अपने थे...वहाँ भी...बहुत सारे घरों की छौकन बघारन पहचानी सी थी...किस लड़की को देखने किस शहर से कोई आया है यह तक पता चलता रहता था....लेकिन यहाँ कुछ भी नहीं नहीं समझ में आता.....
मेरे गाँव में पिछले ३०० साल से कोई बाहरी आदमी नहीं बसा है....लेकिन बनारस में बाहर से लोग बसे हैं और बसेंगे....इलाहाबाद में बसेंगे....भिखारी राम पुर में कोई क्यों बसेगा....जब वहाँ का होके मैं वहाँ नहीं रह रहा हूँ....
तो भाई लोंगो...गाँव की याद आ रही है....और मैं यहाँ फंसा हूँ...जैसे बंदर चने की हाँड़ी में मुट्ठी बाँद कर फंसता है....यहाँ न इलाहाबाद मिल रहा है न गाँव...बस दोनों की याद दिलाने वाली कोयल किसी अनजान पेड़ पर कूक रही है....चाह कर अभी गाँव नहीं जा सकता...
Friday, March 21, 2008
हिंदी के ब्लॉगर सभी हिंदी के सौभाग।।
होली के होहे।।
होली आई देख के फुरसतिया हैरान
शिव जी भी हैरान है हलचल में हैं ज्ञान।।
निर्मल ज्ञान बिख्रेर कर सोते अभयानन्द
अजदक की गठरी फटी, ठुमरी पड़ गई मंद।।
हिंदुस्तानी डायरी रचें अनिल रघुराज
पौराणिक के पृष्ठ पर किसका झंडा आज।।
अनहद नाद अलोप हैं, सुन्न पड़े इरफान
शब्द खोजते थक गए बडनेकर बलवान।।
युनुस का बाजा बजे, सुनते अफलातून
कौन कबाड़ी ले रहा कविता एवज नून ।।
रतलामी के राज में खोए से संजीत
न काहू के शत्रु हैं दुनिया भर के मीत।।
अ आ करके मस्त है अरुणादित्य महान
कविता-सविता छापते हरे पराशर ज्वान।।
उड़न तश्तरी फिर रही भारत औ ब्रह्मांड
अवधिया फैला रहे मुफ्त हकीमी कांड।।
हल्ला था आशीष का, निकला वहाँ भड़ास
आठ आने की आस थी मिली चवन्नी खास।.
चोखेर बाली में छपे बेदखली के बचन
वांगमय में खो गए लाल विशाले-बयन।।
लिंकित मन में घुल गया मसिजीवी का इंक
ममता अनिता से बना अपना घर का लिंक।।
घुघूती के घर में गया बेजी का पैगाम
बचते-बचते हो गया विनय-पत्र बदनाम।।
भूले-बिसरे मित्र सब शत्रु हो गए आज
होली आई देख के विष्णु-शिव भए आज।।
लावन्यान्तर्मन हो या विस्फोटी संजयान
पहलू बदल-बदल कर बिखर रहे इरफान।।
सबके मन में जल रही बड़ी होलिका आग
हिंदी के ब्लॉगर सभी हिंदी के सौभाग।।
नोट-
जो लोग यहाँ नामांकित होने से रह गए हों वो अपना समझ कर होली की गोली मार सकते हैं...आज सब कुछ झेलने के लिए तैयार हूँ...।
Tuesday, March 18, 2008
माँ की चुप्पी
मैंने माँ पर करीब दर्जन भर कविताएँ लिखी हैं....और अभी भी लगता है कि माँ के दुख को और संघर्ष को रत्ती भर भी नहीं कह पाया हूँ....कई साल पहले पिता जी और माता जी को लेकर एक उपन्यास लिखना शुरू भी किया था...करीब छब्बीस अध्याय लिखे भी हैं...पर अभी साल दो साल उसे पूरा कर पाने की स्थिति नहीं दिख रही है....इस बीच में माँ से जुड़े साहित्य का संपाजन किया है जिसमें कविता के दो खंड और विचार और निबंध आदि का एक खंड यानी कुल तीन खंड बने हैं....मातृदेवोभव नाम से यह सब संकलन इन दिनों प्रकाशन की प्रक्रिया में है.....आज पढ़ें मेरी एक पुरानी धुरानी कविता। यह कविता उस संकलन में नहीं है....
विदा के समय
विदा के समय
माँ मेरा माथा नहीं चूमती
चलते समय
कोई विदा-शब्द नहीं बोलती
न ही मेरे चल देने पर
हाथ हिलाती है।
जब मैं
कहता हूँ कि
जा रहा हूँ मैं-
माँ के पास
करने और कहने को
कुछ नहीं होता
और वह
और चुप हो जाती है।
नोट- यह कविता मेरे पहले संग्रह "सिर्फ कवि नहीं" से है।
Saturday, March 8, 2008
झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....
कल का दिन मेरे लिए बड़ी अजीब खुशी देनेवाला और दुविधा भरा था....खुशी की बात यह थी कि मेरी पत्नी आभा ने अपनी कविता न सिर्फ पूरी खुद से टाइप की बल्कि अपने से अपने ब्लॉग अपनाघर पर उसे प्रकाशित भी किया....दुविधा की बात यह थी कि उसने इस काम में मेरी कोई मदद नहीं ली....इस पोस्ट के पहले वह अक्सर मेरी मदद लेती थी कम से कम टाइप करने में....मैं उसकी पोस्ट टाइप करने में एक बुद्धिजीवी या कहें कि पति या मित्र या पुरुष की हैसियत से टोका-टाकी किया करता था.....और अक्सर उसे मेरी बेवजह की अड़ंगेवाजी झेलनी पड़ती थी....लेकिन कल उसने भूल और गलतियों की परवाह न करते हुए अपनी पोस्ट चढ़ा दी और मुझे बताया भी नहीं....
पता नहीं किस दुविधा के चलते मैंने कभी उसके लेखन को बहुत मन से उत्साहित नहीं किया...जबकि वह मुझसे पहले से लिखती रही है....यही नहीं...पिछले पंद्रह सालों से मैं अपनी हर कविता उसे सुनाकर उसके सहज सुलभ सुझावों से अपनी रचनाशीलता को बेहतर बनाता रहा हूँ....
लेकिन कल दिन में आभा ने खुद मुख्तारी का ऐलान कर दिया....और मुझे पता भी नहीं चला....जब हमेशा की तरह मैंने ब्लॉग का पन्ना खोला तो उसकी कविता देख कर चकित रह गया.....और मेरे मन में पहला सवाल आया कि गुरू यह तो सच में क्रांति हो गई....लेकिन मैं सच कहूँ....मैं.बहुत खुश हुआ....उसे फोन करके बधाई दी....उसकी पोस्ट को पसंद भी किया....वह बहुत खुश थी....
उसकी बातों में स्वतंत्रता की खुशी और खनक थी....मैं फोन पर उसके चमकते अनार दाना दंत पंक्तियों को देख रहा था....मैं उसकी आँखों में एक आत्मबल की चमक महसूस कर रहा था....एक ऐसी चमक जो यह उद्घोष करती है कि हम तुम्हारे आधीन अब नहीं हैं.... हम तुम्हारे साथ हैं सहचर हैं....गुलाम नहीं हैं....पत्नी हूँ....बोझ नहीं हूँ.....मैं भी हूँ....सिर्फ तुम ही तुम नहीं हो....बच्चू....
मुझे ऐसी ही खुशी और दुविधा तब भी हुई थी....जब मैंने आभा को पहली बार गाड़ी चलाते हुए देखा था...मैं सच कहूँ जब हम इलाहाबाद में साथ पढ़ते थे....और हमरा प्यार एकदम नया था..... तब मेरी बड़ी इच्छा .थी आभा को सायकिल चलाते देखने की...पर वहाँ उसने सायकिल चलाकर नहीं दिखाया......
सायकिल न सही कार ही सही...मित्रों अपने से अपनी गति और दिशा तय करना बड़ी विलक्षण बात होती है....और मेरी पत्नी मेरी एकमात्र सखी ने उस विलक्षणता को पा लिया है....और मैं अपनी सब दुविधाओं को दूर करके उसे बधाई देता हूँ......मैं कामना करता हूँ कि वह और अच्छा और बेहतर लिखे....वह अपने उन तमाम अनुभवों को लिखे जो कि वही लिख सकती है....मुझे उसके लिखे का इंतजार रहेगा.... वह उड़ान भरे ...गिरने की परवाह....न करे....या यह कि आभा .....
झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....
चलते-चलते अपने ब्लागर मित्रों से पूछना चाहूँगा कि भाई....तुम्हारे ब्लॉग पर कभी तुम्हारी पत्नी का नाम-चेहरा-दुख-सुख क्यों नहीं झलकता...क्या उसकी स्वतंत्रता को लेकर कोई दुविधा है तुम्हारे सामंती मन में.....क्या ब्लॉग की अनंत खिड़की पर भी तुमने अपना पैत्रिक अधिकार समझ लिया है....क्या यहाँ भी तुम्हारी बपौती है....
भाई...अगर अपनी पत्नी को स्वतंत्र नहीं कर सकते तो...समाज के तमाम तबकों की आजादी समता समन्वय की बातें खोखली नहीं हैं....तुम्हारा सारा प्रगतिबोध आत्मोत्थान का उपादान या सोपान भर नहीं है....या यह तुम्हारा प्राचीन पर्दा प्रथा को शहर के कमरों में जिंदा रखने का एक सोचा-समझा खेल है....क्या है भाई...बताओ....मैं तुम्हारा पक्ष सुनना चाहता हूँ....
आगे.........लगातार.....
Thursday, March 6, 2008
किसका भारत, किसकी भारती ?
भारत-भारती
उधड़ी पुरानी चटाई और एक
टाट बिछाकर,
छोटे बच्चे को
औधें मुँह भूमि पर लिटा कर।
मटमैले फटे आँचल को
उस पर फैला कर
खाली कटोरे सा पिचका पेट
दिखा कर।
मरियल कलुष मुख को कुछ और मलिन
बना कर
माँगने की कोशिश में बार-बार
रिरिया कर।
फटकार के साथ कुछ न कुछ
पाकर
बरबस दाँत चियारती है
फिर धरती में मुँह छिपाकर पड़े बच्चे को
आरत निहारती है ।
यह किस का भरत है
किस का भारत
और किस की यह भारती है।
नोट- यह कविता विष्णु नागर जी के संपादन में कादम्बिनी में छपने गई थी....भूल से यहाँ पहले छप गई....कृपया आप सब इसे कादम्बिनी के अगले अंकों में पढ़ सकते हैं....कविता छप रही है यह जानकारी मुझे पंकज पराशर जी ने दी है....
Saturday, February 23, 2008
साल भर में क्या उखाड़ा...उर्फ ब्लॉगमारी
ब्लॉगमारी के एक साल
(सब दोस्तों को सलाम, कल से मैं अपनी विनय-पत्रिका शुरू कर रहा हूँ.......पढ़ो और बताओ...... इसे शुरू करवाने के पीछे हैं अविनाश, अभय तिवारी, चैताली केलकर,अनिल रघुराज....और मैं खुद...नामकरण आभा ने किया है.......)
2 टिप्पणियाँ: अभय तिवारी said...
स्वागत है...अंदर की छपास की आग को फ़टाफ़ट ठंडा करते हुये ब्लॉग की दुनिया मे आग लगाते रहो। February 24, 2007 2:48 AM
Sanjeet Tripathi said...
ब्लॉग-जगत में आपको देखकर खुशी । शुभकामनाएँ
(यह मेरी पहले दिन की पहली पोस्ट थी...और उसपर मिली थी अभय भाई और संजीत जी की टिप्पणियाँ...आज एक साल पूरा हो गया....है विनय पत्रिका शुरू किए...। ऐसे दिन मैं अपनी पहले दिन प्रकाशित कुछ चिंदियों को फिर से छाप रहा हूँ...आपने उन्हें फिर से पढ़ें...।
कुछ दोहे
( ये दोहे कभी किसी ने मुझे भेंजे थे, नाम उसका शायद नवल किशोर था । आप भी इन्हें पढ़ें और .....)
उठते हुए गुबार में, काले - दुबले हाथ,
बुला-बुला कर कह रहे, चलो हमारे साथ ।
घुलते- घुलते घुल गई, कैसे उसकी याद,
कौन सुने किससे करें, सुनने की फरियाद ।
दिन डूबा गिरने लगी, आसमान से रात,
एक और भी दिन गया, बाकी की क्या बात ।
सूरज के आरी-बगल, धरती घूमें रोज,
अपने कांधे पर लिए मेरा-तेरा बोझ ।
पसंद के कुछ शेर
भगवान तो बस चौदह बरस घर से रहे दूर
अपने लिए बनबास की मीआद बहुत थी । ज़फ़र गोरखपुरी
मुहब्बत, अदावत, वफ़ा, बेरुख़ी
किराए के घर थे, बदलते रहे । बशीर बद्र
विनय पत्रिका का मूल्यांकन आज नहीं कभी फिर....हाँ आप कर सकते हैं...कि मैंने क्या किया क्या करूँ...
Monday, February 18, 2008
विष रस भरा घड़ा था बोधिसत्व
पिछले कई सालों से लगातार एक बात महसूस कर रहा हूँ....कि मुझे.
चाहने वालों की संख्या में तेजी से कमी आई है । कभी-कभी तो लगता है कि कोई है ही नहीं जो मुझे चाहता हो....।
वे जो चाहने का दावा करते हैं...मजबूर हैं...उनके पास कोई विकल्प नहीं है....मैं बात अपनी पत्नी और बच्चों की कर रहा हूँ...अगर मध्यकाल में मैं रहा होता तो अब तक सब मुझे छोड़ कर चले गए होते...। बेचारे क्या करें...।
कभी-कभी लगता है कि माँ मुझे चाहती है...पर वह अगर मैं फोन न करूँ तो वह कभी फोन नहीं करती...बस चुप रहती है...
उसे मोक्ष चाहिए...वह जीना नहीं चाहती...अगर वह मुझे प्यार कर रही होती तो मोक्ष के बारे में सोचती...। उसे पिता के पास जाना है...। निर्मोही पिता संसार छोड़ कर चले गए हैं..वह भी चली जाना चाहती है....। अब मैं उसका संसार नहीं हूँ...कभी हुआ करता था...
पिता मुझे बहुत चाहते थे....लेकिन अपने अंतिम दिनों में मुझे अपने पास नहीं रहने देते थे...जब मैं उनसे बहुत दुलराता था तो वे मुझे इलाहाबाद भगा देते थे...।
और बहुत साफ-साफ कहते थे मेरे दिन पूरे हुए....।
सच है कि मैं न अच्छा बेटा बन पाया हूँ...न भाई...न पति न पिता न लेखक न कवि...लगातार लग रहा है कि सब अधकचरा है...सारा जीवन....सारा काम ...सारा लेखन....सारे संबंध....
यह बात दोस्तों के बुझे व्यवहार से भी मुझे महसूस होती है...कि मैं कभी अच्छा मित्र नहीं बन पाया.....खोट है मुझमें....मैं कभी पूरी तरह समर्पण नहीं करता....थोड़ा आलोचनात्मक बना रहता हूँ...दिन को रात नहीं कह पाता....या हाँ में हाँ...नहीं कर पाता...तभी तो जिन मित्रों के साथ कभी 22-22 घंटे इलाहाबाद में या गाँव में रमा रहता था...वे बड़ी कठिनाई से बात कर पाते हैं वह भी महीनों-महीनों बाद....।
मैं दावे से कह सकता हूँ...कि अपने परिचितो और मित्रों को सबसे अधिक मैं फोन करता हूँ.....कई बार ऐसा मन करता है कि जाने दो साले को जब वह नहीं कर रहा है तो मैं ही क्यों करूँ....पर करता हूँ....हाल लेता हूँ...देता हूँ...
जो भी मेरे मित्र इस खत को पढ़ें अगर मेरी बात गलत लगे तो....बोलें....मैं उनको सुनने को तैयार हूँ....
अरे चिरकुटों मैं ही नहीं तुम सब भी अजर-अमर नहीं हो....क्या सोचते हो....यहीं रहोगे...और ऐसे ही मुह फुलाकर भटकते रहोगे....और बस। एक दिन एक खबर आएगी बोधिसत्व नहीं....रहा....फिर यह होगा कि तुम नहीं रहोगे....
भाई यह देस बिराना है....।
मगर तुम मेरे लिए दो आँसू बहाने की जगह कहोगे.....बोधिया......नहीं रहा....। मन में कहोगे चूतिया चला गया....। हरामी कभी समझ में ही नहीं आया....जितना बाहर का मिठास था सब दिखावा था उसका...साला अंदर से बड़ा जहर का पीपा था...खूसट ...। विष रस भरा कनक घट था.......कमीना.....। इससे अधिक गाली तो तुम दे नहीं पाओगे...। ब्लॉग जगत में एक गाली विरोधी एक दस्ता है...जो मन की घृणा को अंदर-अंदर पकाता खाता है.... और जब बाहर आती है तो गाली एक दम गुल-गुला हो जाती है....।
पर मैं मानता हूँ....कि मैं बहुत सीधा और सरल नहीं हूँ...या मैं मिट्टी का माधो नहीं हूँ...तुम कह सकते हो...कि मैं बहुत जटिल हूँ...बहुत उलझा हुआ....भी।
हाँ....मैं झगड़ालू हूँ...पर चिरकुट नहीं हूँ...
मैं मक्कार नहीं हूँ....और मेरे लिए भरोसा तोड़ना हत्या से बढ़ कर है....।
मैंने कभी मक्कारी नहीं की है....किसी के भी साथ.....फिर भी आज कल लगातार लग रहा है कि मुझे कोई नहीं चाहता....शायद कुछ लोग हों जो मेरे मरने की हुआ करते हों....उनकी कामना पूरी हो मैं उनके लिए दुआ करूँगा क्यों कि मैं उन्हें प्यार करने की सोचता हूँ....।
Tuesday, February 5, 2008
लड़ कर मरना बेहतर होगा
भाई चाहे राज कहें या उनके ताऊजी मैं तो मुंबई से हटने के मूड में एकदम नहीं हूँ..... मैं ही नहीं मेरे कुनबे के चारों सदस्य ऐसा ही सोचते हैं...लेकिन हम सब और खास कर मैं किसी राज ठाकरे या उसके गुंड़ों से मार ही खाने के लिए तैयार हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरे पास कोई फौज नहीं है न ही कोई समर्थकों का गिरोह ही। मैं तो अभी तक यहाँ का मतदाता भी नहीं हुआ हूँ...बस रह रहा हूँ और आगे भी ऐसे ही रहने का मन है.....
जो लोग मुंबई को अपना कहने का दंभ दिखा रहे हों...वो सुन लें...
कभी भी अगर बीमार न रहा होऊँ तो १५ से १७ घंटे तक काम करता हूँ...इतनी ही मेहनत हर उत्तर भारतीय यहाँ करता है...वे या मैं किसी भी राज या नाराज ठाकरे या उनके मनसे के किसी सिपाही से कम महाराष्ट्र या मुंबई को नहीं चाहते हैं... अगर उनके पास कोई राज्य भक्ति को मापने का पैमाना हो तो वे नाप लें अगर उनसे कम राज्य भक्त निकला तो खुशी से चला मुंबई से बाहर चला जाऊँगा....
लेकिन अगर मेरे मन में कोई खोट नहीं है और मैं एक अच्छे शहरी की तरह मुंबई को अपना मानता हूँ तो मैं अपनी हिफाजत के लिए गोलबंद होने की आजादी रखता हूँ....अगर हमें खतरा लगा तो बाकी भी खतरे में ही रहेंगे...
क्योंकि
तोड़- फोड़ के लिए बहुत कम हिम्मत की जरूरत होती है....लूट और आगजनी से बड़ी कायरता कुछ नहीं हो सकती....रास्ते में जा रहे या किसी चौराहे पर किसी टैक्सी वाले को उतार कर पीटना और उसके रोजीके साधन को तोड़ देना तो और भी आसान है....
मैं यह सब कायरता भरा कृत्य करने के लिए गोलबंद नहीं होना चाहूँगा बल्कि मैं ऐसे लोग का मुँह तोड़ने के लिए उठने की बात करूँगा जो हमें यहाँ से हटाने की सोच रहे हैं....
मेरा दृढ़ मत है कि उत्तर बारत के ऐसे लोगों को आज नहीं तो कल एक साथ आना होगा .....उत्तर भारतीयों को एक उत्तर भारतीयों को सुरक्षा देने वाली मनसे के गुंड़ो को मुहतोड़ उत्तर देने वाली उत्तर सेना बनाने के वारे में सोचना ही पड़ेगा....
जो लोग आज भी मुंबई में अपनी जातियों का संघ बना कर जी रहे हैं....मैं उन तमाम जातियों को अलग-अलग नहीं गिनाना चाहूँगा....उत्तर भारत से बहुत दूर आ कर भी आज भी बड़े संकीर्ण तरीके से अपने में ही सिमटे हुए लोगों से मैं कहना चाहूँगा कि
...
आज जरूरत है सारे उत्तर भारतीयों को एक साथ आने की जिन्हें यहाँ भैया कह कर खदेड़ा जा रहा है....
उनमें अमिताभ बच्चन भी हैं जो कि अभिनय करते हैं...और शत्रुघन सिन्हा भी
उनमें हसन कमाल भी हैं...जो कि लिखते हैं...और निरहू यादव भी जो कि सब कुछ करते हैं.........
उनमें राम जतन पाल भी हैं जो किताब बेंचते हैं और सुंदर लाल भी जो कि कारपेंटर हैं...
जिनका दावा है कि हम काम न करें तो मुंबई के आधे घर बिना फर्नीचर के रह जाएँ......
तो आज नही तो कल होगा.....
संसाधनों के लिए दंगल होगा....
और इसके लिए तैयार रहने को मैं कायरता नहीं मानता। ऐसा मैं अकेला ही नहीं सोच रहा ऐसे लाखों लोग हैं जो अपनी मुंबई को छोड़ने के बदले लड़ कर मरना बेहतर समझेंगे।
Wednesday, January 30, 2008
हिचकियाँ बता रही हैं कि कोई मुझे याद कर रहा है
पिछले कई दिनों आभा यानी मेरी पत्नी मेरे पीछे पड़ी हैं कि तुम महीने में एक पोस्ट लिख कर ब्लॉग जगत में जिंदा कैसे रह सकते हो। लगातार न लिखो तो भी महीने में कम से कम सात-आठ पोस्ट तो लिखो। देखो सब कितना लिख रहे हैं..
सो आज जो कुछ लिख रहा हूँ..आभा की चिंता से । कुछ लोग कह सकते हैं कि बोधिसत्व ने अपने ब्लॉग पर अपने परिवार की फोटो ही नहीं लगा रखी है वे तो पोस्ट भी अपनी पत्नी के कहने से छापते हैं...
ऐसे विघ्न संतोषी लोगों को मैं या कोई भी क्या कह सकता है...मुझे उनकी परवाह नहीं है॥क्यों कि मैं अपनी खुशी के लिए लिखता हूँ मुझे किसी से कोई दिशा निर्देश नहीं चाहिए...लिखने पढ़ने या अभिव्यक्ति के मामले में किसी को नसीहत देने को मैं अभिरुचि की तानाशाही मानता हूँ। और कैसी भी तानाशाही का समर्थन कोई भी कैसे कर सकता है अगर वह जिंदा है। वही व्यक्ति हर तरफ अपने मन का होता देखना चाहेगा जिसके अंतर में एक बीमार तानाशाह रहने लगा हो वही दूसरों को ताना भी मार सकता है कि ऐसा लिखो और ऐसा दिखो।
दोस्तों आज सुबह से लगातार हिचकी आ रही है। पानी पीकर हिचकी को शांत करने की कोशिश की लेकिन कामयाबी न मिली। हिचकी शांत करने का और कोई उपाय जानता नहीं हूँ क्या करूँ । कुछ लोग हिचकी को छींक की तरह अनैच्छिक क्रिया मान सकते है। लेकिन मेरा मन नहीं मान रहा है।
मुझे लग रहा है कि कोई मुझे याद कर रहा है। पत्नी कह रही है कि मैं तो यहीं हूँ फिर कौन याद कर रहा है...मेरी उलझन देख उसी ने फिर कहा कि हो सकता है माता जी याद कर रही हों। मां को फोन किया वो सच में याद कर रही थी । उसने कहा कि वह मुझे हर पल याद करती रहती है...।
उससे बात करने के बाद भी हिचकी आती जा थी...तो बारी-बारी से अपनी बहनों और भाइयों और भाभियों सबसे बात की लेकिन अभी भी हिचकी बंद नही हुई है..
मुंबई में अभय से बात किया कि तो पता चला कि वो भी मुजे याद कर रहे थे...भाई शिव कुमार मिश्र से हो रही बातचीत में मेरा जिक्र था...
काफी देर से परेशान हूँ...अभी भी हिचकी चल रही है...
मित्रों और मित्रानियों और अपने चाहने न चाहने वालों से यह नम्र निवेदन है कि वे या तो याद करना बंद करें या मुझे फोन कर लें।
क्यों कि मैं बहुत देर से हिचकी से परेशान हूँ।
नोट- इसी हिचकी के कंटेंट को कविता में भी लिखा है जो कि अमर उजाला में भाई अरुण आदित्य को छापने के लिए भेज रहा हूँ।
Friday, January 18, 2008
वे बड़े साधारण लोग थे
वे बड़े साधारण लोग थे..उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे...
किसी का नाम भगतिन था तो
किसी का ब्रह्म नारायण
एक और थी जिसका नाम सरिता था....
एक नें मुझे विन्ध्याचल की पहाडियों में खो जाने से बचाया।
अपने मुंडन के बाद मैं
पता नहीं कैसे चला जा रहा था पहाड़ियों की ओर
मुझे तो पता भी हीं था कि मैं भटक गया हूँ...
वे ब्रह्म नारायण थे मेरे पिता के बाल सखा
जिन्होंने मुझे देखा गलत दिशा में जाते
और ले आए वापस।
फिर मैं खो गया था मेले की अपार भीड़ में
बैठा था भूले – भटके शिविर में
नाम भी नहीं बता पा रहा था किसी को
कि मेरे गाँव की भगतिन ने देख लिया मुझे
झपट लिया मुझे उस खेमे में आकर
ले आई मां के टेंट में
जो घंटे भर से खोज रही ती मुझे जहाँ-तहाँ बिललाती।।
थोड़ा और बड़ा हुआ तो
खो गया एलनगंज में
अपने चाचा के डेरे पर आया था
बीमार ताई को देखने आई थी माँ
तो आ गया था मैं भी...
थक गया था खोज कर पर
नहीं मिल रही थी चाचा के घर की गली
वह तो सामने के फ्लैट में रहने वाली एक भली सी लड़की ने देखा
मुझे चौराहे की भीड़ में सुबकते
ले आई घर किसी को बताया भी नहीं कि
मैं खो गया था....नाम था उसका सरिता
तब वह बारहवीं में पढ़ती थी
किसी गणित के अध्यापक की बेटी थी।
एक बार तो डूब ही रहा था गाँव के सायफन में
खेतों को सींचने के लिए पानी की नाली का चमकता हुआ पानी
जाता था घर के बहुत पास से
सायफन पड़ता था घर के एकदम पिछवारे
उसी के तल में चमक रही थी एक दुअन्नी
जिसे पाने के लिए मैं उतर गया पानी में
दुअन्नी लेकर मैं डूब रहा था कि आ गए नन्हकू भगत
उन्होंने देख लिया मुझे डूबते
और निकाल लिया बाहर...
बच गया एक बार फिर
बचा लिया गया ऐसे ही कितनी बार खोने से डूबने से।
भाइयों और बहनों
पिछले कई सालों से खो गया हूँ मैं कहीं
डूब रहा हूँ कहीं
नहीं आ पा रहे मुझ तक ब्रह्म नारायाण
भगतिन का कुछ पता नहीं चल रहा
सरिता भी पता नहीं कहाँ है
कहाँ हैं भगत
मैं कह नहीं सकता।
वे बड़े मामूली लोग थे..
उनके तो नाम भी अजीब हिंदी टाइप के थे ।
Sunday, December 16, 2007
अहे निष्ठुर परिवर्तन
परिवर्तन एक सच है। एक ऐसा सच जिस पर किसी के मानने या न मानने का कोई असर नहीं पड़ता। परिवर्तन कई स्तरों पर चलता है। जिसे हम किसी भी तरह रोक नहीं पाते। यह परिवर्तन का ही कमाल है कि मैं देखता रहा और चिट्ठाजगत ने मुझे इलाकाई बना दिया। मैं पूँछ पटक कर रह जाता तो भी चिट्ठाजगत के सेहत पर क्या असर पड़ता। वे परिवर्तनशील हैं और बदलता हुआ समाज या व्यक्ति बहुत सारा उलट-पुलट कर ही देता है। जिसे सिर झुका कर स्वीकार करने में ही किसी की भी भलाई होती है....।
ऐसे आफतकाल में शुभचिंतक आते हैं ध्यान दिलाने जगाने कि बचो...सम्हलो...पर तब तक तो देर हो ही चुकी होती है... ज्ञान भाई ने जगाया कि देखो तुम्हे इलाकाई बनाया जा रहा है... मित्र अभय ने कहा कि मैं तुम्हें सही जगह कर देता हूँ...पर मैं चुपचाप देखते-सुनते रहने के अलावा क्या कर सकता था। मैंने माना कि इस इंकलाबी दौर में चुप्पी ही बचाएगी...
बिहारी ने कहा हा कि-
पावस आवत जान के भई कोकिला मौन
अब तो दादुर बोलिहैं, हमहिं पूछिहैं कौन।
मैं बेवकूफ हूँ, पर उतना बड़ा बेवकूफ नहीं हूँ कि अपनी भलाई को भूल जाऊँ और चिट्ठा जगत के परिवर्तन पर फड़फड़ा कर अपना घाटा करवालूँ। अपने मुंशी प्रेमचंद जी ने कहा ही है कि जिस पैर के नीचे अपनी गरदन दबी हो उसे सहलाने में ही फायदा है...पूज्य पिता जी कहते थे-
विप्र टहलुआ, अजा धन, औ कन्यन कइ बाढ़ि
इतने से धन ना घटे तो करौ बड़न से रारि।
सो मैं सब पंचों की बात मान, बलवान चिट्ठाजगत के अदृश्य पैरों को सहला रहा हूँ...और उनका आभारी हूँ कि मुझे कम से कम इलाकाई तो मान रहे हैं...वे लोग।
मैं अपने को इलाकाई पाकर बहुत खुश हूँ...कम से कम इस बदलाव के ग्लोबल दैर में मैं लोकल तो हूँ....जरा सोच कर देखिए ग्लोबल बनाम लोकल, अन्तर्राष्ट्रीय बनाम इलाकाई... कितना अच्छा लगता है....किसी भी परिवर्तन के स्वागत के पीछे मेरी सोची-समझी नीति कुछ ऐसी ही होती है और आपसे मैं कहना चाहूँगा कि जब बदलाव की विकट सुनामी नुमा आँधी चले तो घास की तरह दुबक जाइए घरती माँ के आँचल में....अपने जैसों के साथ गोल बनाकर बचाव कर लीजिए अपना.... अगर आप दुबकेंगे नहीं तो आप उखड़ जाएँगे....चाहे आप जहाजिया पेड़ हों या अट्टालिका प्राकार....
आप इसे मेरा पलायनवाद या समर्पणवाद मान लें....मैं तो इसे परिवर्तनवाद ही मानता हूँ....जो कि सचमें निष्ठुर होता है...
अगर मैं परिवर्तन को न मानूँ तो चिट्ठाजगत का क्या उखाड़ लूँगा....। वह आदमी किसी का क्या बिगाड़ सकता है जो धुरंधर भी न हो...लिक्खाड़ भी न हो, सामाजिक न हो। जो साहित्य, संगीत, कला विहीन हो , साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीन हो...वह बेचारा वलि के अलावा किस काम में आ सकता है....कवि तो और किसी काम के नहीं होते...उनकी इस समाज को कोई जरूरत कभी नहीं रही.... ब्लॉगर भी किसी का क्या कर सकता है...सिवाय एक पोस्ट में अपनी छुपी नीति का इजहार करने के...।
सो भाइयों हर बदलाव का स्वागत करो....मस्त रहो...और उस बदलाव का तो गा-बजाकर स्वागत करो जिस पर जोर न चले....जो बेकाबू हो....
अपनी बात के पक्ष में पुराने लोगों को उद्धृत करना एक परम्परा रही है...मैं भी परम्परा का पालन कर रहा हूँ....अहमद फराज को उद्धृत करके....
जख्म को फूल तो सरसर को सबा कहते हैं....
जाने क्या दौर है, क्या लोग हैं क्या कहते हैं...।
जब तलक दूर है तू तेरी परस्तिश कर लें...
हम जिसे छू न सकें उस को खुदा कहते हैं...।
मैं कि पुरशोर समुंदर थे मिरे पाँवों में
अब के डूबा हूँ तो,सूखे हुए दरियाओं में ....।
इसलीए कहता हूँ कि जब समय परिवर्तनशील होता है तो आदमी सूखी नदी में डूब जाता है....और लोग घाव को भी फूल और आँधी को हवा कहने लगते हैं...। अस्तु।
Tuesday, December 11, 2007
यश और मोक्ष नहीं निस्तेज जूतों की तलाश करते हैं वे
(जूते चमकाने वाले बच्चों के लिए)
वे जूतों की तलाश में
घूमते हैं ब्रश लेकर
और मिलते ही बिना देर लगाए
ब्रश को गज की तरह चलाने लगते हैं
जूतों पर
गोया जूते उनकी सारंगी हों ।
दावे से कहा जा सकता है कि
उन्हें जूतों से प्यार है
जबकि फूल की तरह खिल उठते हैं
जूतों को देखकर वे ।
जब कोई नहीं होता
चमक खो रहे वे
जूतों से गुफ़्तगू करते हैं।
भरी
दोपहरी में वे
जमात से बिछुड़े जोगी की तरह होते हैं
जिसकी सारंगी और झोली
छीन ली हो बटमारों ने ।
उन्हें बहुत चिढ़ है उन पैरों से
जिनमें जूते नहीं ।
बहुत पुरानी और अबूझ पृथ्वी पर
उस्ताद बुंदू खाँ और भरथरी के चेलों की तरह
यश और मोक्ष नहीं
निस्तेज जूतों की तलाश करते हैं वे।
रचना तिथि-१९-०२-1996
Friday, December 7, 2007
मैं नशेड़ी हूँ....

करीब महीने भर हुए मुझे एक किताब की याद आई। वह किताब थी किस्सा शीत-बसंत । कहीं बात चल रही थी पहले प्यार की । पहले प्यार की चर्चा से मुझे शीत-बसंत याद आई । शीत-बसंत मुझे मेरे बड़े भैया ने इलाहाबाद से लाकर दी थी। यह बात होगी १९७५ या ७६ की । मैं ६ या 7 साल का था। निक्कर पहन कर गाँव की कोलियों या गलियों में फिरा करता था। हर घर और हर आँगन मेरा अपना हुआ करता था। हर नई दुलहन जो अक्सर मेरी भाभी होती थी को देखने कभी भी पहुँच जाता था और कह भी देता था कि दुलहन देखने आया हूँ...। दुलहन देखने के बाद पाहुर के लड्डू लेकर भाग पड़ता था। आज याद करता हूँ तो लगता है कि मैं दुलहन देखने कम लड्डू पाने अधिक जाया करता था। ऐसे ही दिनों में मुझे वह किताब मिली किस्सा शीत-बसंत
दो तीन दिनों में पूरी किताब पढ़ गया । किताब खतम करने के बीच कभी रोता कभी डरता। कहानी एक सौतेली रानी और और उसके दो सौतेले राज कुमारों की थी। जैसा होता है बाद में सब कुछ ठीक हो जाता है। पर बीच में जलनखोर रानी दोनों राजदुलारों को मारने का हुक्म दे देती है। लेकिन वफादार सेवक शीत-बसंत की जगह किसी जानवर का दिल लाकर दे देते हैं और रानी के कलेजे को ठंडक पहुँच जाती है...।
तो शीत-बसंत और रानी मेरे पहले पात्र हैं जिनके बारे में मैंने पढ़ा और शीत बसंत पहली किताब। बहुत खोजने के बाद भी वह पुरानी किताब नहीं मिली । पर कांदिवली में एक दिन भाई अभय तिवारी के साथ भटकते हुए सड़क की दुकान से कुछ अलग छापेवाली दूसरी प्रति मिल गई। लगभग तीस साल बाद फिर पढ़ा और अवधेश भैया की बहुत याद आई। मुझ पर उनका बहुत प्रेम था । मैं उनसे १६-१७ साल छोटा जो हूँ। मुझे पढ़ने की ओर भैया ने ही प्रेरित किया। आगे इसी क्रम में सारंगा सदाबृज, नल-दमयंती, जैसी दर्जनों किताबें उनके स्नेह से पढ़ने को मिलीं। वे इलाहाबाद से नंदन, पराग, बालहंस, बाल भारती, चंपक, लोटपोट, और अमर चित्र कथा की तरह की किताबें हर यात्रा में लाते थे....। जिन्हें मैं बिना रुके पढ़ता जाता। हालांकि इसी पढ़ने के क्रम में मैंने घर में भाभियों द्वारा छिपा कर रखी गई इंद्रलोक आजाद लोक जैसी पार्थिव पोथियाँ भी पढ़ लीं।
हालांकि आज तक नहीं जान पाया हूँ कि मेरी चार भाभियों में कौन पढ़ता था उन पवित्र-पोथियों को।
जो भी रहा हो.....मैं मानता हूँ कि मैं नशेड़ी हूँ....किताबों को पाने और पढ़ने का नशा है मुझे.....जो शायद इस जीवन में न उतरे....।
Thursday, December 6, 2007
अयोध्या और पागलदास
( पखावज वादक स्वामी पागलदास के लिए, जिनका २० जनवरी १९९७ को अयोध्या में देहावसान हो गया)
अयोध्या में बसकर
उदास रहते थे पागलदास
यह बताया उस मल्लाह ने
जिसने सरयू में प्रवाहित किया उन्हें।
मैंने पूछा-
आखिर क्यों उदास रहते थे पागलदास
अयोध्या में बसकर भी।
उसने कहा-
कारण तो बता सकते हैं वे ही
जो जानते हों पागलदास को ठीक से
मैं तो आते-जाते सुनता था
उनका रोदन
जिसे छुपाते थे वे पखावज की थोपों में।
मैंने कहा, मुझे उनके स्थान तक ले चलो
उनके किसी जानकार से मिलाओ।
मैंने पागलदास के पट्ट शिष्यों से पूछा
क्या अयोध्या में बसकर
सचमुच उदास रहते थे पागलदास।
शिष्य कुछ बोले-बासे नहीं
बस थाप देते रहे,
मेरे आग्रह करने पर
उन्होंने मुझे दिखाया उनका कक्ष
जहाँ बंद हो गया था आना जाना डोलना
पागलदास के पखावज भी भूल गए थे बोलना।
मैं अयोध्या में ठूँढ़ता रहा
पागलदास के जानकारों को
और लोग उनका नाम सुनते ही
चुप हो
बढ़ जाते थे।
बहुत दिन बीतने पर
मिले पागलदास के संगी
जो कभी संगत करते थे उनके साथ
उन्होंने मुझसे पूछा -
क्या करेंगे जानकर कि
अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास रहते थे पागलदास।
उन्होंने कहा-
क्यों उदास हैं आप बनारस में
बुद्ध कपिलवस्तु में
कालिदास उज्जयिनी में
फसलें खेतों में
पत्तियाँ वृच्छों पर, लोग दिल्ली में, पटना में
दुनिया जहान में क्यों उदास हैं
आप सिर्फ यही क्यों पूछ रहे हैं
कि अयोध्या में बसकर भी क्यों उदास थे पागलदास।
मैंने कहा -
मुझे उनकी उदासी से कुछ काम नहीं
मुझे बुद्ध, कालिदास या लोगों की उदासी से
कुछ लेना-देना नहीं
मैं तो सिर्फ बताना चाहता था लोगों को
कि इस वजह से अयोध्या में बसकर भी
उदास रहते थे पागलदास।
उन्होंने बताया-
पागलदास की उदासी की जड़ थे पागलदास
मैंने कहा यह दूसरे पागलदास कौन हैं
क्या करते हैं।
उन्होंने बताया-
जैसे अयोध्या में बसती है दूसरी अयोध्या
सरजू में बहती है दूसरी सरजू
वैसे ही पागलदास में था दूसरा पागलदास
और दोनों रहते थे अलग-थलग और
उदास।
जो दूसरे पागलदास थे
वे न्याय चाहते थे
चाहते थे रक्षा हो सच की
बची रहे मर्यादा अयोध्या की
सहन नहीं होता था कुछ भी उल्टा-सीधा
क्रोधी थे।पहले पागलदास की तरह
सिर्फ अपने भर से नहीं था काम-धाम
पहले पागलदास की तरह उदास होकर
बैठ नहीं गए थे घर के भीतर।
मैंने कहा-
अन्याय का विरोध तो होना ही चाहिए
होनी ही चाहिए सच की रक्षा
पर उदासी का कारण तो बताया नहीं आपने।
उन्होंने कहा-
जो पागलदास
सच की रक्षा चाहते थे
चाहते थे न्याय
वध किया गया उनका
मार दिया गया उनको घेर कर उनके ही आँगन में
एकान्त में नहीं
उनके लोगों की मौजूदगी में
और पहले पागलदास को छोड़ दिया गया
बजाने के लिए वाद्य
कला के सम्वर्धन के लिए।
दूसरे पागलदास की हत्या से
उसको न बचा पाने के संताप से
उदास रहने लगे थे पागलदास
दूसरे पागलदास के न रहने पर
उनको संगत देने वाला बचा न कोई
उन्होंने छोड़ दिया बजाना, भूल गए रंग भरना
तज गिए समारोह, भूल गएकायदा, याद नहीं रहा भराव का ढ़ंग
बचने लगे लोगों से, लोम-विलोम की गंजायश नहीं रही।
बहुत जोर देने पर कभी बजाने बैठते तो
लगता पखावज नहीं
अपनी छाती पीट रहे हैं।
इतना कह कर वे चुप हो गए
मुझे सरजू पार कराया और बोले-
जितना जाना मैंने
पागलदास की उदासी का करण
कह सुनाया
अब जाने सरजू कि उसके दक्षिण तरफ
बस कर भी क्यो उदास रहे पागलदास।
रचना तिथि- २१-०९-1997
Friday, November 30, 2007
हम न मरब मरिहैं संसारा
तीस दिनों से ब्लॉग पर लेखन-रस नहीं चखा पर उसका नशा लगातार छाया रहा। कितनी बार सोचा कि लिखूँ , छापूँ , टिप्पणियाँ दूँ, लेकिन पता नहीं क्यों नहीं लिख पाया। मैं जीवन में कभी इतना व्यस्त नहीं रहा हूँ कि लिखने के लिए समय न निकले। और न ही इतना व्यस्त रहना चाहूँगा कि न लिख पाऊँ। न लिखने का कारण और लिखने का बाहाना महान लेखकों को शोभा दे सकता है हम टुटपुँजिया लेखकों को नहीं। हमारी तो जिंदगी ही लेखन पर आधारित है।
इस बीच मैं कहीं कुछ और लिखने में लगा था। एक फिल्म की स्क्रिप्ट में कुछ लिखता रहा और एक किताब संपादित की। 25 के करीब फिल्में देखीं और हप्ते भर नदी के जल में स्नान किया। तीन दिन पेड़ की छाया में बैठा और खेत से मूलियाँ उखाड़ कर खाता रहा। कुल मिलाकर मस्त रहा। बस ब्लॉग पर लिख नहीं पाया। बाकी सब चकाचक रहा।
आज कुछ लिखने के लिए नहीं बस आप लोगों के सामने हाजिर होने के लिए लिख रहा हूँ....। यह बताने के लिए कि मैं मरा नहीं हूँ क्योंकि गाँवों से जुड़े लोग मरते नहीं। वे धूल झाड़ कर उठ खड़े होते हैं और मैं गाँव वाला ही हूँ....मारने से नहीं मरूँगा। साथ ही मुझे जिलाने वाला साहित्य संजीवनी भी मिली हुई है। मैं बनारसी हूँ और एक बनारसी कवि कबीर के शब्दों में दावे से कह सकता हूँ कि -
हम न मरब मरिहैं संसारा
हमकू मिला जियावन हारा।
मैं जिंदा हूँ तो हिंदी के कारण । मैं जिंदा रहूँगा तो हिंदी के चलते। हिंदी मेरी माँ है मेरी जननी। यह मुझे बचाए रखेगी। हम खुद भी हिंदी हैं.....और हिंदी मरना नहीं जानता या जानती।
आज और कुछ नहीं लिख रहा हूँ। क्योंकि लिखते नहीं बन रहा है । फिर भी लिख रहा हूँ क्योंकि नवंबर महीने से मेरी कोई दुश्मनी नहीं है। मैं नहीं चाहता कि विनय पत्रिका के इतिहास में यह लिखा जाए कि मैंने इस माह को लेखन के लायक नहीं पाया। मैं नहीं चाहता कि नवंबर के खाते में कुछ न दर्ज हो। आखिर यह महीना मेरे जीवन में बहुत महत्व रखता है । इसी माह में मुझे मेरी पत्नी के प्रथम दर्शन हुए। तब वह मेरी सहपाठिनी थी। इसी माह में मैंने 1997 में अपने प्यारे पिता को खोया अर्ध-अनाथ हुआ। बीते तीस दिनों में बहुत कुछ किया जो कि मैं आप सब को बताना नहीं चाह रहा। हालाकि बता देने से कुछ घट नहीं जाएगा पर बताने का मन नहीं है।
मित्रों कल शायद कुछ और लिखूँ या शायद महीने भर के लिए फिर गायब हो जाऊँ.....पर आप लोग यह बात गाँठ में बाध लीजिए कि मैं कुछ दिनों के लिए गुम हो सकता हूँ मर नहीं सकता।
Wednesday, October 31, 2007
महान शायर चिरकीन की राष्ट्रीय चेतना
उर्फ सब चिरका ही चिरका है
आज की अजदकी पोस्ट और उस पर ज्ञान भाई की धुरंधर टीप नें मुझे बेजोड़ शायर चिरकीन की याद दिला दी। इसलिए आज की विनय पत्रिका में फैल रही हर बू बास के लिए अजदक भाई ही एक मात्र जिम्मेदार हैं। मैं तो सिर्फ अजदक भाई की आज की पोस्ट रूपी टट्टी की आड़ से चिरकीन की शायरी बिखेर रहा हूँ। यानी चिरका कर रहा हूँ या गू कर रहा हूँ।
लोग बताते हैं कि चिरकीन साहब अलीगढ़ में रहते थे और हर मुद्दे को चिरके से जोड़ने की महारत रखते थे। विद्वानों का मत है कि चिरकीन का मूल अर्थ है बिखरी हुई टट्टी। आप समझदार हैं टट्टी का अर्थ झोपड़े की टाटी नहीं करेंगे ऐसा मुझे भरोसा है। टट्टी मतलब हाजत या कहें कि गू या हगा। चिरकीन की काव्य कला अद्भुत थी। बड़े-बड़े शायर उनसे पनाह माँगते थे। अच्छे-अच्छे मुशायरों में चिरकीन ने चिरका बिखेर दिया था। इस आधार पर कहा जा सकता है कि चिरकीन प्रात काल में स्मरणीय हैं। वंदनीय है। आप सब के पास अगर इस महान शायर के युग इत्यादि के बारे में कोई ठोस जानकारी हो तो दें। चिरकीन पर रोशनी डाल कर चिरका साहित्य को बढ़ावा दें। साहित्य में फैली एक ही तरह की सड़ान्ध या बदबू को बहुबू से भरें। कभी इलाहाबादी मित्र अली अहमद फातमी ने बताया था कि चिरकीन का दीवान भी अलीगढ़ से उजागर हुआ था।
चिरकीन का साहित्य सदैव चिरके पर ही केन्द्रित रहा। चिरका ही उनका आराध्य था । इसीलिए
जितने भी स्वरूप हो इस मल या गू के या जितने भी रंग हों सबको चिरकीन ने अपनी शायरी में जगह दिया है। मुझे कुछ ही शेर याद आ रहे है जो आपकी खिदमत में पेश हैं। अगर कुछ इधर उधर हो तो चिरकीन भक्त और अभक्त क्षमा करेंगे।
राष्ट्रीय एकता
चिरकिन चने के खेत में चिरका जगा–जगा
रंगत सबकी एक सी , खुशबू जुदा-जुदा।
स्वागत
बाद मुद्दत के आप का मेरे घर पर आना हुआ
तेज की घुमड़न हुई और धड़ से पाखाना हुआ।
इश्क
वस्ल के वक्त महबूबा जो गू कर दे
सुखा के रख लीजे, मंजन किया कीजे।
श्रद्धा-भक्ति
चिरका परस्त बन तू ए चिरकीन
आखिर क्या रखा है दोनों जहाँ में।
अगर कोई ज्यादती हो गई हो तो सच में माफी दें। या माफ करें...
Tuesday, October 30, 2007
भिखारी ठाकुर से मुलाकात

कल बहुत अजीब सपना देखा । मुझे सपने में विदेशिया वाले भिखारी ठाकुर मिले और अपना दुखड़ा लेकर बैठ गए । मैं उनके दुख से द्रवित हुआ और मेरी आँखे भी भर आईं। सपने में मैं दिल्ली में था और वहाँ की एक संस्था में नेरूदा की जन्म शती पर भाषण सुन रहा था। वहीं गेट के बाहर भिखारी ठाकुर से मुलाकात हुई। वे अंदर जाना चाह रहे थे पर कोई उन्हे पैठने नहीं दे रहा था। वहाँ सब थे पर भिखारी ठाकुर के लिए जगह नहीं थी। नेरुदा पर करीब दर्जन भर आलेख पढ़े गए। फिर उनकी ग्रंथावली का लोकार्पण हुआ। लोग गदगद थे। नेरूदा की कविताओं के मद में मस्त।
बाहर निकलते समय भी भिखारी ठाकुर वहीं खड़े दिखे। मैं बच कर निकल जाना चाह रहा था पर वे लपक कर पास आए और पूछा कैसा रहा। नेरूदा पर कैसा बोले लोग। मैं भिखारी की उदारता पर हतप्रभ था। आँ ऊँ...कर के निकल गया।
सपना टूटने पर मुझे याद आया कि पिछले साल भिखारी ठाकुर की जन्म शती थी और मुझे उन पर एक आलेख लिखना था । पर जीवन की लंतरानियों की आड़ में मैं लिख नहीं पाया। हालाकि तैयारी मैंने पूरी कर ली थी। बिहार राष्ट्र भाषा परिषद से भिखारी ठाकुर की ग्रंथावली भी मंगा ली थी और कथाकार संजीव का उपन्यास सूत्रधार भी। कुछ और लेखादि का संकलन भी कर लिया था पर बाद में लिखना टल गया। शायद दो लोग भिखारी पर पत्रिका निकाल रहे थे वही पीछे हट गए।
यहाँ यह बाताना रोचक रहेगा कि भिखारी ठाकुर से मेरा परिचय कथाकार शेखर जोशी जी ने कराया था। जब उन्होंने जाना कि मेरे गाँव का नाम भिखारी राम पुर है तो उन्होंने पूछा था कि यह विदेशिया वाले भिखारी ठाकुर का गाँव तो नहीं.....। उसके बाद मैंने भिखारी ठाकुर पर जगदीश चंद्र माथुर का एक बहुत संजीदा संस्मरण पढ़ा ....फिर तो भिखारी सचमुच में अपने हो गए अपने गाँव वाले.....
रात में फिर सोया तो ठाकुर को लेकर एक और डरावना सपना देखा। भिखारी को लोर्का, मायकोवस्की, लेर्मंतोब, नाजिम हिकमत, ब्रेख्त जैसे कुछ कवियों से गिड़गिड़ाकर अपने बैठने की जगह माँगते पाया। इस बार भी सपने में दिल्ली ही थी। लोग भिखारी की भाषा नहीं समझ रहे थे। वहाँ मैजूद विद्वान लोग भिखारी को सुन रहे थे पर बाद में मिलना...बाद में....ओ दादा.....ओ......बाद में चलो.....हटो....बाद में ...कल दोपहर में लंच के बाद....वो.....टल हट....कह कर लगभग दुरदुरा रहे थे।
पर भिखारी ठाकुर थे कि हिलने का नाम तक नहीं ले रहे थे। कह रहे थे कि जब अंग्रेज ससुरे चले गए तो तुम सब कब तक रहोगे....हमें बेदखल नाही कै सकत। तुम सब दल्लाल हो....संसकिरती के नाम पर हमका आड़े नाहीं कै सकत....हम इहाँ से कतऊँ न जाब....ई हमार दिल्ली हऊ....। तब तक संजीव, ऋषिकेश सुलभ और संजय उपाध्याय और , शत्रुघ्न ठाकुर, तेतरी देवी , धर्मनाथ माझी जैसे सैकड़ों लोग आ गए और भिखारी ठाकुर जिंदाबाद के नारे लगाने लगे....मैं कुछ देर सकते में खड़ा रहा फिर नारा लगानेवालों के साथ हो गया....और जोर-जोर से भिखारी ठाकुर जिंदाबाद का स्वर बुलंद करने लगा....।
सपना फिर टूट गया...पर थोड़ी राहत रही....क्यों कि इस बार भिखारी ठाकुर....वही विदेशिया वाला.....रो नहीं रहा था बल्कि लड़ने को खड़ा था और उसके लोग डटे हुए थे....और बाकी भिखारी के शब्दों में संसकीरत के दल्लाल सब सकते में थे।
सुबह हुई तो सोचा कि विदेशिया की तकलीफ भरी लड़ाई से आप सब को परिचित करा दूँ....
परिचय तो हो गया....भिखारी से विस्तार में मिलना चाहें तो पढ़े कथाकार संजीव का उपन्यास सूत्रधार.....
परिचय के बाद अब पढ़े एक अंश भिखारी विदेशिया नाटक से....
यह हिस्सा प्यारी विलाप का है.....
Friday, October 26, 2007
कथाकार सूरज प्रकाश का लिंग

मुंबई के ब्लॉगाकाश में एक और सूरज प्रकाशित हुआ है या कहें कि उगा है । इस नए ब्लॉगर का नाम है सूरज प्रकाश और उनका ब्लॉग है कथाकार ।सूरज प्रकाश वैसे भी मुंबईवालों को अपने प्रकाश से चकित करते रहे हैं पर यहाँ चौकाने वाली बात है उनका लिंग जिसकी तरफ मेरा ध्यान बनारसी ब्लॉगर भाई अफलातून जी ने खीचा। कथाकार का ब्लॉगीय प्रोफाइल पढ़कर परेशान हो गये अफलातून जी ने मुझसे पूछा कि यह कथाकार सीपीआई एम एल या लिबरेशन से जुड़े हैं क्या। क्योंकि कथाकार का लिंग है माले। मेरी जानकारी में कथाकार सूरज प्रकाश का लिंग भले ही माले हो पर उनका माले की राजनीति और माले गाँव में हुए धमाकों से कोई सीधा या टेढ़ा नाता नहीं है।
इस कथाकार के लिंग निर्धारण में भारतीय वामपंथियों और लेखकों का कोई लेना देना नहीं है। पर यह बात मैं दावे से नहीं कह सकता । माले के कुछ लोगों को जानता मानता हूँ पर उनकी तमाम गतिविधियों का मुझे कुछ पता नहीं रहता।
अफलातून जी की ही तरह मैं भी कथाकार के लिंग को लेकर उलझन में हूँ। पुरुष- स्त्री और तीसरे लिंग के अलावा यह माले लिंग क्या बला है। इस लिंग के बारे में मेरा अज्ञान मुझे तकलीफ दे रहा है। जिनके पास लिंग ज्ञान हो या जो ज्ञान लिंगी हों मुझे और अफलातून जी को बताएँ कि माले लिंग की और तारीफ क्या है।
सूरज प्रकाश एक अच्छे कथाकार हैं। मुंबई से जुड़ी कहानियों का संपादन मुंबई एक के नाम से कर चुके हैं। कभी-कभी कविता लिख कर कवियों को डराते रहते हैं। चार्ली चैपलिन की आत्मकथा का उनका अनुवाद आधार प्रकाशन पंचकूला से प्रकाशित हो चुका है। साहित्य की दुनिया में कुछ कर गुजरने के लिए इस बेचैन और परेशान आत्मा का ब्लॉग जगत में स्वागत है। आप लोग नामी- बेनामी- गुमनामी टिप्पणियों से सूरज को अर्ध्य दें आलोचना करें यह आप पर है।
Thursday, October 25, 2007
मास्को में माँ का नाच

मेरी दो कविताओं के बारे में एक सूचना मुझे परसों मिली। यह सूचना मुझे मेरे कवि मित्र श्री अनिल जनविजय ने मास्को से दी। मेल पर बातचीत के दौरान जनविजय जी ने बताया कि मेरी दो कविताएँ वे मास्को विश्वविद्यालय में एमए हिंदी की कक्षाओं में पढ़ाते हैं।
मास्को में माँ का नाच तो पिछले तीन सालों से वे पढ़ाई जा रही है, पर मुझे सूचना तीन दिन पहले मिली है और मैं खुश हूँ। वहाँ पढ़ाई जा रही मेरी दूसरी कविता है इलाहाबाद में निराला। निराला वाली कविता मैं ब्लॉग पर पहले छाप चुका हूँ।
मैं आप सब को यह बाताना चाहूँगा कि श्री अनिल जनविजय खुद एक बहुत अच्छे कवि हैं उनके कई संग्रह प्रकाशित हैं । वे कविता कोश नाम से नेट पर हिंदी कविताओं का एक अलग भंडार भी संजो रहे हैं।
आज मैं आप सब के लिए अपनी कविता माँ का नाच छाप रहा हूँ । आप पढ़ें और अपनी बात रखें।
माँ का नाच
वहाँ कई स्त्रियाँ थीं
जो नाच रहीं थीं गाते हुए
वे एक खेत में नाच रहीं थीं या
आँगन में यह उन्हें भी नहीं पता था
एक मटमैले वितान के नीचे था
चल रहा यह नाच।
कोई पीली साड़ी पहने थी
कोई धानी,
कोई गुलाबी, कोई जोगन सी
सब नाचते हुए मदद कर रहीं थीं
एक दूसरे की
थोड़ी देर नाच कर दूसरी के लिए
हट जाती थीं वे नाचने की जगह से।
कुछ देर बाद बारी आई माँ के नाचने की
उसने बहुत सधे ढ़ंग से
शुरू किया नाचना
गाना शुरू किया बहुत पुराने तरीके से
पुराना गीत।
माँ के बाद नाचना था जिन्हें वे भी
और जो नाच चुकीं थीं वे भी अचंभित
मन ही मन नाचती रहीं माँ के साथ।
मटमैले वितान के नीचे
इस छोर से उस छोर तक नाचती रही माँ
पैरों में बिवाइयाँ थीं गहरे तक फटीं
टूट चुके थे घुटने कई बार
झुक चली थी कमर,
पर जैसे भँवर घूमता है
जैसे बवंडर नाचता है वैसे
नाचती रही माँ।
आज बहुत दिनों बाद उसे
मिला था नाचने का मौका
और वह नाच रही थी बिना रुके
गा रही थी बहुत पुराना गीत
गहरे सुरों में।
अचानक ही हुआ माँ का गाना बंद
पर नाचना जारी रहा
वह इतनी गति में थी कि
घूमती जा रही थी,
फिर गाने की जगह उठा
विलाप का स्वर
और फैलता चला गया उसका वितान
वह नाचती रही बिलखते हुए
धरती के इस छोर से उस छोर तक
समुद्र की लहरों से लेकर जुते हुए खेत तक
सब भरे थे उसकी नाच की धमक से
सब में समाया हुआ था उसका बिलखता हुआ गाना।
रचना तिथि - 1 अप्रैल १९९९
Tuesday, October 23, 2007
साल भर बाद सूर्य को देखा

आप लोग यकीन नहीं करेंगे आज लगभग साल भर बाद उगता हुआ सूरज दिखा। पहले जब गाँव में रहता था या इलाहाबाद में लगभग हर दिन का सूर्योदय देख ही लेता था। तब रात दो या तीन बजे तक जागने की चर्या नहीं थी। यहाँ मुंबई में सुबह जग जाने के बाद भी अगर घर से बाहर न निकलें तो सूरज का दर्शन दुर्लभ है। आज सूरज दिखा तो बड़ा अच्छा लगा। वह उतना ही चमकदार और ऐश्वर्यशाली था जितना मेरे बचपन में या किशोरावस्था में हुआ करता था। उसे देर तक देखता रहा।
क्या रहा निहारता रहा। उसे पूर्ववत पाकर अच्छा लगा, पर बहुत कुछ याद आया।
बचपन में मैं सूर्य का उगना अपने कचौड़ी नामा घर की छत से देखा करता था। सुबह मेरे बाबा सूर्य को जल चढ़ाते फिर कक्का फिर कुछ और लोग। हम बच्चे उन सबको ऐसा करते देखते। बाबा पीतल के बड़े से लोटे में कुछ कनेल के फूल डाल लेते या गेंदे के और कोई मंत्र बुदबुदाते हुए अपने स्थान पर घूमते। वे एक ग्रह की तरह सूर्य की धरती पर रह कर परिक्रमा करते थे। वे हम लोगों के लिए एक साक्षात ग्रह थे। हमें उनकी परिक्रमा एक खास लय दिखती। सूर्य पूजन के बाद बाबा जल की कुछ बूँदे अपनी गोखुरी शिखा पर भी छिड़कते।
आज सुबह सूर्य को उगता देख कर बाबा की बड़ी याद आई। वे बड़े पराक्रमी पुरुष थे। उन्होंने अपने कुल को एक बड़ी चमक दी थी मान दिलाया था इलाके में। वे एक धाकड़ और बेजोड़ वैद्य थे । वैद्यक पर उनकी एक पोथी बनारस के प्रकाशक ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स बुकसेलर से छपी थी। एक तरह से वे मेरे इलाके के पहले कुछ लेखकों में भी माने जा सकते थे।
सूर्योदय के बीच में बाबा का यह अवांतर प्रसंग छोड़ कर मैं फिर सूर्य पर लौटता हूँ। जब हम छ: सात साल के हुए सूर्योदय के घंटों पहले बिस्तर छोड़ने लगे थे । मेरे एक ताऊजी जो एजी ऑफिस इलाहाबाद में चीफ एकाउंटेंट वगैरह थे उन्हें महुआ बीनने में बड़ा मजा आता। रास्ता चलने वालों से महुए के रस भरे फूल टूट जाते थे । तो ताऊजी हम सब बाल बृंदों को लेकर भोर में महुआरी बारी पहुँच जाते । सबसे पहले जिन पेड़ों के नीचे से राह गई होती थी हम उनके नीचे महुआ बीन कर एक पतली राह बना देते । डगर चलू लोगों के आने जाने के लिए। मुझे याद है कि दोनो हाथों से महुए के फूलों को बिना चोट लगाए हम दनादन महुआ बीनते । घंटे भर में महुए के ढेर लग जाते। तब अक्सर ऐसा होता कि जब हम महुआ बीन कर घर लौट रहे होते थे पीछे से सूर्योदय होता। ताऊजी हम सब से कहते कि हमेशा सूरज से पहले उगना चाहिए । और हम खुश होते कि लो आज भी सूर्य देव पिछड़ गए। हम अग्गी रहे। ऐसी कई बातों को आज के सूर्योदय ने याद दिला दिया।
आज न बाबा है न ताऊजी पर महुए के फूल तो गिरते ही होंगे। बाबा न सही सूर्य को कोई न कोई तो अर्ध्य देता ही होगा। बाबा के लोटे से जलधार के साथ घरती की ओर गिरते वे फूल बड़े लुभावने होते थे। महुए के पेड़ से धरती की ओर गिरता हुआ हर फूल बड़ा सलोना होता था। एक दम निर्मल, रसभरा। दूर-दूर तक महुए की मदमाती सुगंध छाई होती। महुए को बचाने के लिए ताऊजी न सही वहाँ जो लोग होंगे महुए को कुचलने बचाते तो होंगे । अगर रस पाना है तो किसी भी चीज को कुचल जाने से नष्ट हो जाने से बचाना ही होगा।
महुए के फूल बीनने पर बच्चन जी की एक कविता है । उसी अंचल और भूमि की उपज है वह कविता । बच्चन जी की जन्म शती पर उस कविता को छापना चाह रहा था पर संकलन ही नहीं मिल रहा है। यह कविता शायद त्रिभंगिमा में थी। गीत की जो पंक्तियाँ याद आ रही हैं वो नाकाफी है। शुरुआती पंक्तियाँ हैं -
लइके मुड़वा पर डलइया महुआ बीनई जाब।
क्या करूँ....उसकी जगह पर वह गीत पढ़ें जो मुझे बेहद प्रिय है
जो बीत गई
जो बीत गई सो बात गई !
जीवन में एक सितारा था,
माना, वह बेहद प्यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अम्बर के आनन को देखो,
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले,
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मानाता है।
जो बीत गई सो बात गई !
यह गीत और है पर अब बहुत हुआ। सूर्योदय से महुआ, महुआ से बाबा फिर ताऊजी फिर बच्चन जी । धागा बढ़ता ही जा रहा है....बस करता हूँ। जो बीत गई ओ बात गई।
