Saturday, August 15, 2009

भारतीय साहित्य में क्या खाक रखा है ?

पराए पत्तल का भात अच्छा लगता है भाई

मैं अपने साथ के किसी भी लेखक कवि आलोचक से कत्तई नाराज नहीं हूँ। मेरा नाराज होने का कोई हक भी नहीं बनता। यदि भारतीय कविता या साहित्य में कुछ है ही नहीं तो वे क्या करें। बेचारे। विपन्न जो ठहरे। वे लोग यदि बात बात पर अपने लेखों में यदि विदेशी कविता के स्वर नहीं छापेंगे तो क्या देशी कविता छाप कर देशज होने का लांछन अपने सिर लेंगे। वे यदि विदेशी भाषा के आलोचकों के विचारों से ऊर्जा नहीं ग्रहण करेंगे तो क्या देशी घुग्घू पंडितो के अछूत विचारों से प्रभावित होकर अपनी तौहीन कराएँगे। वैसे भी पराए पत्तल का भात अच्छा लगता है। ब्लॉग से लेकर साहित्य तक जिसे देखिए विदेशी कविता की माला फेर कर गदगद है। हर कोई छापे उच्चारे पड़ा है। मैं भी उन सब कवियों कविताओं आलोचक और आलोचनाओं का हार्दिक स्वागत करता हूँ। किंतु वे सभी मेरे लिए न तो आदर्श हैं नही कंठहार बनाने का कोई मन है। मैं तो देशी कविता से ही नहीं उबर पा रहा हूँ। हाँ जब देशी को पढ़ कर तृप्त हो जाऊँगा तो देखूँगा बाहर के महान काव्य स्वरों को। यह मेरा हठ है। क्या करूँ।

अभी राहुल सांकृत्यायन का संस्कृत काव्य धारा पढ़ कर मस्त मगन था कि साहित्य अकादमी दिल्ली से प्रकाशित एक दुर्लभ ग्रंथ सदुक्ति कर्णामृत हाथ लग गया। श्री धर दास न इसे 1205 -6 में संकलित सम्पादित किया था। ऐसे प्राचीन ग्रंथ को सुव्यस्थित ढंग से अनूदित और सम्पादित किया है संस्कृत हिंदी के प्रकाण्ड विद्वान राधा वल्लभ त्रिपाठी ने। हर कंटेंट पर पाँच कविताएँ हैं। कुल चार सौ छिहत्तर विषयों पर इस ग्रथ में दो हजार तीन सौ साठ कविताएँ संस्कृत मूल के साथ संकलित है। मैं दावे से कह सकता हूँ कि हर कविता अनमोल है और देशी विदेशी किसी भी कवि या कविता से अपने कथन में कहीं बहुत सुचिंतित और सुगठित है। राधा वल्लभ जी ने हिंदी और संसकृत के बीच एक सुदृढ़ सेतु के रूप में अपनी भूमिका दर्ज कराई है। उनके काम का सत्कार किया जाना चाहिए। आज उनके सदुक्ति कर्णामृत से दो कविताएँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। आगे इसी क्रम में मंगलदेव शास्त्री, राहुल सांकृत्यायन, बशीर अहमद मयूख, नर्मदेश्वर चतुर्वेदी, गोविंद चंद्र पाण्डे, रघुनाथ सिह, प्रभुदयाल अग्निहोत्री, आचार्य राम मूर्ति, कमलेश दत्त त्रिपाठी, मुकुन्द लाठ, जगन्नाथ पाठक, कपिलदेव दिवेदी इत्यादि विद्वानों द्वारा किए गए अनुवादों को इस कामना के साथ छापूँगा कि मित्रों कभी कभार इधर भी देख लो अपने घर में अपने दरिद्र कोठार में । इसी कोठार से मैं मयूख जी की एक कविता पहले भी यहाँ छाप चुका हूँ।
आज आप पढ़े दरिद्र की ग्रृहणी विषय में संकलित पाँच में से दो कविताएँ।

दरिद्र की घरवाली

पूरी तरह बैरागन बन गई है अब वह
गल रहा है उसका तन
तन पर के कपड़े
हो रहे हैं चिथड़े-चिथड़े
भूख से कुम्हलाई आँखों और पिचके पेट वाले
उसके बच्चे
उससे करते हैं निहोरा
कुछ खाने के लिए
दीन बन गई है वह
लगातार बहते आँसुओं से धुला है उसका चेहरा
दरिद्र की घरवाली
एक पसेरी चावल से
काट लेना चाहती है सौ दिन। ( कवि वीर)

गरीब की जोरू

वह भीग चुके सत्तू का शोक मना रही है
वह चिल्ल पों मचाते बच्चों को चुप करा रही है
वह चिथड़े से पानी के चहबच्चे सुखा रही है
बचा रही है बिस्तर पुआल का
इस टूटे टपकते पुराने घर में
टूटे सूप के टुकडे से ढंकते हुए सिर
क्या-क्या नहीं कर रही है गरीब की घरवाली
जबकि देव बहुत जोर से बरस रहे हैं लगातार। ( कवि लंगदत्त)

सदुक्तिकर्णामृत, मूल्य-५०० रूपए, पृष्ठ-८००, संपादक राधा वल्लभ त्रिपाठी, साहित्य अकादमी, रवीन्द्र भवन, 35 फिरोजशाह मार्ग, नई दिल्ली-110001

Wednesday, August 12, 2009

जीना केहिं बिधि होय

घर में कैद हैं

पिछले कई महीनों से बड़ी मुश्किल में हूँ। घर परिवार के अलावा भोजन और भटकन के आस-पास जीवन का रस जुटा था। वहाँ भी सेंध लग गई है। मिठाई खाता रहा हूँ लेकिन जब से नकली मावा और खोया बड़े पैमाने पर पकड़े गये मिठाइयों का स्वाद कम हो गया। बेसन के लड्डू को मैं मिठाई में गिनता नहीं था, लेकिन मजबूरी में आज कल वह भी मीठा हो कर इतरा रहा है। छेने की मिठाई भी उसी तरह मिलावट की मार से पराई हो गई है।

जलेबी बेहद पसंद करता था लेकिन नकली तेल और मिलावटी बेसन ने उससे भी दूर कर दिया है। यही नहीं इन हरामी नक्कालों ने दो वक्त के भोजन को भी बेस्वाद कर दिया है। जब से समझदार हुआ हूँ, गाढ़ी अरहर की दाल में दो चम्मच घी डाल कर खाता रहा हूँ। लगभग हर दिन गुड़ घी रोटी भी गूलता रहा हूँ, लेकिन हड्डी-चर्बी और पता नहीं क्या क्या मिला कर बेंचे जा रहे घी की खबर ने दाल को भी स्नेह से हीन कर दिया और गुड़ घी रोटी से वंचित । घर के दूध से जितना घी बन पा रहा है उसी से किसी तरह मन को संतोष दे रहे हैं।

देर रात में दो से तीन बजे के बीच ठंडे दूध में लाई बिस्किट और थोड़ा सा गुड़ डाल कर खाता था। यह सिलसिला भी पिछले कई सालों से चल रहा है। लेकिन मेरे मुहल्ले चारकोप से ही 1800 लीटर नकली दूध जब से मिला है दूध से दुश्मनी सी हो गई है। मेरे मुहल्ले के मिलावट करने वालों ने तो पानी तक साफ नहीं मिलाया था। जब उन्हें धरा गया तो वहाँ दूध बनाने के लिए लगभग 500 लीटर नाले का गाढ़ा गंदा पानी भर कर रखा मिला। उसके बाद से इस डेरी से उस डेरी भटक रहा हूँ लेकिन किसी भी दूध को ठीक नहीं मान पा रहा हूँ । हर दूध मिलावटी सा दिख रहा है। डर-डर कर चाय पी रहा हूँ। डर-डर कर कॉफी। जीना मुहाल है। मिलावट की मार झेल ही रहा था कि यह आ गया स्वाइन फ्लू। इसने तो रहा सहा भटकने का सुख भी छीन लिया है।

सरकार बड़े मजे से कह रही है कि पब्लिक प्लेस पर न जाएँ। अरे भाई घर के अलावा ऐसा कौन सा स्थान बचा है जो पब्लिक प्लेस नहीं है। बच्चों को लेकर पार्क नहीं जा सकता । बेटी को झूले पर नहीं चढ़ा सकता । सिनेमा नहीं दिखा सकता। पसंद की मिठाई नहीं खा सकता। बेफिक्र हो कर दूध और चाय नहीं पी सकता। दाल में घी नहीं डाल सकता, गुड़ घी रोटी नहीं खा सकता। तो कर क्या सकता हूँ। अगर अपने मन का कुछ कर ही नहीं सकता हूँ, बाहर जाकर घूम नहीं सकता केवल घर में कैद हो कर रहना है तो बेहतर है जेल भेज दो वहीं रहेंगे। जो दोगे खा लेंगे। जितने दायरे में रखोगे रह लेंगे। मान लेगें कि मेरी दुनिया इतनी ही रह गई है। इतना ही खाना है इतना ही जीना है।

Tuesday, June 16, 2009

करे कोई भरूँ मैं...ऐसा क्यों है

कल क्या होगा

पिछले तीन महीने से फोन पर मुझे सृजित कह कर गालियाँ दी जा रही हैं। बैंक का कोई रिकवरी एजेंट मेरे घर के नंबर पर फोन करता है और मुझसे कहता है कि मैं सृजित हूँ और मुझ पर उसके बैंक का बकाया है। वह रिकवरी एजेंट मुझसे कहता है कि मैं बैंक के क्रेडिट कॉर्ड से पैसा खाकर गुल हो गया हूँ। और, जब भी मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि सृजित नहीं हूँ तो उसने मुझे चुन-चुन के गालियाँ दीं। साथ ही उसने यह भी धमकी दी कि मुझे उठा लेगा, देख लेगा, समझा देगा, ठीक कर देगा, सुधार देगा।

उसकी सुंदर, सलोनी और सुघड़ गालियों से मेरा बेटा मानस और मेरी पत्नी आभा भी न बच पाए। जिसने फोन उठाया उसने गाली खाया। अच्छा हुआ कि भानी ने फोन नहीं रिसीव किया।

कल जब उसने रात सवा नौ बजे फोन किया तो मैंने उससे कहा कि भाई आप मेरे घर आ जाओ और मुझसे मिल लो, मुझे देख लो। मैं सृजित नहीं हिंदी का लेखक कवि हूँ मेरा नाम बोधिसत्व है । आओ मेरी पहचान कर जाओ। तो उसने कहा कि हर आदमी यही कहता है। मैंने उसे कहा कि मेरा पैन कार्ड देख लो, ड्राइविंग लाइसेंस देख लो, जो चाहो देख लो और पीछा छोड़ो।

उसने जितनी बार बात की उतने नाम बताए। परसों बोला कि वह हेमलता है। एक दिन कहा कि वह परवेज बोल रहा है और कल बोला कि भाइंदर से जावेद शेख बोल रहा है। आज मैंने कहा कि अपना नंबर दो तो उसने नंबर दिया ९००४०७७१४१। इसके पहले उसने जिन नंबरों से फोन किया वे हैं- ४२१५१९२३, ४२१५१९२५, ४२१५१९२६, 40317600।

मित्रों फिलहाल मामला यह है कि वह कल सुबह 10 बजे मेरे घर आ रहा है। मुझसे सृजित का बकाया वसूलने। बच्चे सुबह स्कूल में होंगे और मैं उठ कर उसका इंतजार करूँगा। जीवन में इस तरह का यह पहला अनुभव है। यदि सच कहूँ तो मुझ पर वैसे भी किसी का कोई बकाया नहीं है न बैंक का न व्यक्ति का।

उलझन केवल एक है कल उसने या उसके लोगों ने कोई बेहूदगी की तो क्या करूँगा। पुलिस में एक सूचना दे रखी है। चारकोप के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जब वे आएँ तो मैं 100 नंबर पर डायल करूँ। अभी मैं और मेरी पत्नी कल की स्थितियों में अपनी-अपनी भूमिका तय कर रहे हैं। आभा का कहना है कि क्यों नाम पता बताया, क्यों घर बुलाया, वे खोजते सृजित को और पाते उसका पता। मेरा कहना था कि अगर वह मेरे नंबर पर फोन कर रहा है और गालियाँ बक रहा है तो इस बात को कब तक टाला जा सकता है। उससे बिना मिले क्या उपाय है। हम दोनों थोड़ा उलझन में हैं कि कल वे सब न जाने क्या करेंगे। क्या कल मैं खुद को बोधिसत्व या अखिलेश साबित कर पाऊँगा या वे मुझे सृजित कह कर पीट जाएँगे। रिकवरी एजेंट्स की करतूतों पर खबर बनाना या लिखना एक बात है उनके चंगुल में आना एकदम अलग। देखते हैं कल क्या होता है।

Saturday, May 30, 2009

दीना की याद

लगता नहीं कि दीना नहीं है

हम और दीना नाथ ज्ञानपुर में एक साथ पढ़ते थे। जब हम मिडिल स्कूल बनकट में पढ़ते थे तब दीना नाथ दुबे और दीना नाथ पाल ये दो दीना हमारे अच्छे मित्रों में से थे। आज मैं दीना नाथ पाल को याद कर रहा हूँ। मेरे सहपाठियों में दीना पाल सब से सुलझे और सामाजिक थे। यदि किसी मित्र को बुखार हो तो उसे अपनी सायकिल पर बिठा कर उसके घर छोड़ना और कई दिनों तक उसे स्कूल ले जाना दीना नाथ का कर्तव्य बन जाता था। पढ़ने में तमाम विद्यार्थियों से बेहतर होने पर भी दीना नाथ बहुत आगे तक नहीं पढ़ पाए। किसी-किसी तरह बारहवीं की परीक्षा देकर दीना नाथ मुंबई चले आए। यह बात 1986 की है।

दिना नाथ से बिछड़ना मेरे लिए एक असह्य घटना थी। मैं ज्ञानपुर से इलाहाबाद पढ़ने आ गया। लेकिन हम दोनों चिट्ठियों के जरिए लगातार सम्पर्क में बने रहे। मुंबई आ कर दीना नाथ ने कुछ टेक्निकल कोर्स करके टीवी रिपेयरिंग का काम सीखा और और दहीसर इलाके में अपनी एक रिपेयरिंग की दुकान भी खोल ली। लेकिन दीना नाथ अपने पूरे जीवन से कभी सुखी न रहे। वे पढ़ना चाहते थे। किंतु घरेलू आधार ऐसा था नहीं कि दीना नाथ लग कर कुछ कर सकें। कई चिट्ठियाँ ऐसी रहीं जिनमें दीना नाथ ने जीवन का रण हार जाने जैसा बयान दिया था। मैं पढ़ाई में जैसा भी था दीना नाथ के पसंग बराबर भी नहीं था। भौतिक शास्त्र से लेकर रसायन तक सब में दीना नाथ मेरे तारण हार थे। हमारा गाँव करीब तीन-चार कीलोमीटर के फासले पर था फिर भी दीना नाथ मेरे घर आ कर मुझे पढ़ा जाते। एक पिछड़ी जाति का लड़का मुझ अगड़े के बेटे को पढ़ने आता है यह बात मेरी ताई जी को बहुत दुख देती थी। वे ताना मारते हुए कहतीं कि अब इहै तोहे पढ़ाई। फिर भी मैं पढ़ता रहा क्योंकि मैं सचमुच में दीना नाथ को अपना सखा मानता था। मुझे इसमे कोई उलझन भी नहीं थी।

हम लोग गाँव से कॉलेज तक के लगभग 15 कीलोमीटर रास्ते में फिल्मों का कथानक सुनते सुनाते आते जाते थे। संवाद और गानों के साथ कोई एक मित्र पूरी फिल्म सुनाता था। यह एक अदभुत यात्रा होती थी। शुरू से दि इंड तक किसी भी हिट फ्लाप कैसी भी फिल्म का सिनारियो पूरा का पूरा। इंटरवल पर हम कहीं चाय पीते। दीना नाथ राखी के भक्त थे और अक्सर उनकी फिल्मों की कहानी सुनाते थे।

हमारे मेल जोल का बहुत स्वागत न था। एक बार तो हद ही हो गई। बात 1995 की होगी। गर्मियों में दीना नाथ मुंबई से गाँव आए। हमारी पहले ही चिट्ठी के जरिए बात हो गई थी। दीना नाथ ने बहुत बड़ा पक्का घर बनवाया था। उसका गृह प्रवेश था। मुझे खुशी थी कि दीना नाथ का खपरैल पक्का हो गया। मैं भी उनके समारोह में पहुँचा। लेकिन पिता जी ने न्योता खाने न जाने दिया। दीना नाथ को यह बात थोड़ी अखर गई। अगले दिन मैं किसी बहाने घूमते घामते दीना के घर पहुँचा। पता चला कि रसोईं तैयार है। लोग खाना खाने जा रहे हैं। संकोच के साथ दीना के पिता ने मुझे भी खाने को कहा। हालाकि उनकी माँ ने रोकना चाहा। कच्ची रसोईं ( अभी भी गाँवों में तली हुई पूड़ियाँ यानी पक्की रसोई तो एक पिछड़े के घर में खाई जा सकती है, लेकिन चावल दाल रोटी जिसे कच्ची रसोईं कहते हैं खाने की परम्परा नहीं है) में किसी ब्राह्मण के बटे को कैसा जिमा सकता है एक गड़ेरिया। लेकिन मैं खाने के लिए बैठ गया। इसी बीच में न जाने कहाँ से मेरे पिता जी आ गए। शायद उन्हें मेरे दीना नाथ के घर जाने की भनक लग गई थी। पिता जी को मित्रता में नहीं भोज भात में आपत्ति थी। और वे बदलने को कतई तैयार न थे। मैं पीढ़े पर बैठा था वे सामने खड़े थे, मेरे हाथ में भात का कौर। मुझे लगा कि पिता जी कुछ बावेला करेंगे। लेकिन उन्होंने सिर्फ और सिर्फ मुझे गरदन के पीछे से कालर पकड़ कर उठाया और जूठे मुह जूठे हाथ घर तक ले आए। मैं विरेध कर सकता था लेकिन मामला हिंसक हो सकता था इसलिए चुपचाप चला आया। उसी रात पिता जी ने मुझे इलाहाबाद के लिए विदा करवा दिया।

इसके बावडूद हम और दीना नाथ सम्पर्क में रहे। लेकिन यह थाली छोड़ कर उठने की घटना मुझे पराजित कर गई थी। पिता जी कि वह हुंकार हमेशा उनके प्रति एक असम्मान का भाव जगाती रहती रहती थी। लेकिन कुछ भी बोलना न हो पाया।
फिर 2002 में मैं मुंबई आ गया हमारी मुलाकाते रहीं। मैंने दीना नाथ के घर जाकर कच्ची रसोईं खाई। दीना नाथ हंसते रहे। उन्हें लगा कि मैं उनका वही पुराना मिड़िल से लेकर इंटर तक वाला मित्र हूँ।

2007 के मार्च महीने में मुंबई के लोअर परेल में रेल ट्रैक पार करते हुए दीना नाथ दुर्घटना का शिकार हो गए। हमने अपने दीना को खो दिया। उसे कहीं जाने की बहुत जल्दी थी। वह सदा के लिए चला गया। हमारी जितनी अच्छी समझदारी भरी दोस्ती दीना नाथ से थी उतनी बहुत कम मित्रों से हो पाई है। हम दोनों को हमारी मैत्री पर अभिमान था। तमाम सामाजिक भेदभाव के बादजूद हम मित्र रहे।

इसमें एक अजीब बात है, दीना को खोकर भी लगता नहीं कि वह नहीं है। उसका मुस्कराता चेहरा सदा सामने रहता है। एक और बात सिनेमा की तरफ मुझे मोड़ने में दीना नाथ का बहुत गहरा योग है। टीवी सीरियल रजनी के दौर में दीना नाथ के चचेरे भाई रजनी यानी प्रिया तेंदुलकर के ड्राइवर होते थे। उनके द्वारा सुने सिनेमा के आंतरिक किस्सों ने मुझे मुझे मुंबई आने का सपना दिया। ये बाते यहाँ नहीं लिख सकता, क्योंकि यह सारा वाकया अपनी चवन्नी के लिए लिखा है तो जल्द ही वहाँ पढ़ें।

Wednesday, April 22, 2009

नाम के लिए हत्या

अब तो नाम लोगे आलोचक


सिर्फ हिंदी के लिए देह धारण करनेवाले आज कितने होंगे। जी हाँ, मात्र हिंदी को समर्पित एक कवि महान कवि, कहानीकार, समीक्षक, संपादक, प्रवक्ता त्तर प्रदेश में हैं किंतु बेहद दुखी और परेशान हैं। अपनी उपेक्षा से तंग आकर उन्होंने अपना नाम बदलने का मन बना लिया है। उनका कहना है कि ऐसा नाम रखेंगे कि लोग देखते रह जाएँगे। और नाम बदलते ही उनका काम हो जाएगा। उनके नाम का महिमा मंडन किए बिना या उनका नाम लिए बिना कोई आलोचक अपना लेख वह किसी भी विधा का हो पूरा नहीं कर पाएगा। अभी यह तय नहीं हुआ है कि नाम क्या रखें। किंतु सूची बन गई है।

हो सके तो आप उनकी मदद कर दें। नाम बस ऐसा हो कि आलोचक, समीक्षक बिना उनको याद किए रह न पाएँ। हिंदी की सेवा का कुछ तो मेवा मिले।

नाम इस प्रकार हैं- और तिरछे अक्षरों में हैं।

आदि, इत्यादि, तथा, जैसे, अन्य, और, गण, असंख्य, अथवा, तमाम, कवि, लेखक, चिंतक, विचारक, नाटक, एकांकी, संपादक, प्रवक्ता, हिंदी, भाँति, तरह, प्रकार, समान, व, सरीखे, कोटि।

कौन सा नाम बेहतर तरीके से उनकी मदद कर पाएगा इसका ध्यान रखिएगा। वे हिंदी में आए क्यों हैं। नाम कमाने ही तो। और ये आलोचक नाम ही नहीं लेते। तो नाम बदलने का काम एक दो दिन में ही सम्पन्न हो जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं तो हिंदी के दो चार कवि आलोचक, समीक्षकों की बलि चढ़ा देंगे अपने हिंदी के ये उपेक्षित समर्पित कवि। यह ठीक न होगा। केवल नाम के लिए हत्या करनी पड़े। मैंने सोचा है कि यदि वे इत्यादि जी, आदि जी, कोटि जी जैसा नाम रख लें तो कैसा रहेगा।

Tuesday, April 14, 2009

चिद्-विलास : पिता के साथ पुरखों का इतिहास



अपने पूर्वजों पर लोग क्यों नहीं लिखते

लेखक लोग अक्सर अपने घर परिवार कुल वंश के बारे में आधी-अधूरी बातें करके छुट्टी पा लेतें हैं। कोशिश करते हैं कि अपनों के बारे में जितनी कम बातें करके काम चल जाए उतना ही कुशल है। क्योंकि घर परिवार पर लिखना फायदे का लेखन नहीं माना जाता। अपने पिता और लाचार माँ पर, अपने पूर्वजों पर लोग नहीं लिखते जबकि किसी पहुँचे हुए आलोचक और सफल सामाजिक की जीवन गाथा ग्रंथित करने के लिए हर कोई कलम उठाए रहता है। बल्कि कहूँ तो कलम तोड़ स्तुति करने को तैयार रहता है।

वैसे भी भला बहुत कम कामयाब व्यक्ति का कोई इतिहास होता है, जीवन वृत्त होता है। लेकिन एक पिता वह असफल रहा हो सफल उसका इतिहास भी होता है और जीवन वृत्त भी। तभी तो डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल ने अपने पिता के जीवनी लिखी है साथ ही अपने कुल कुटुंब और गोत्र का इतिहास भी दर्ज किया है। उन्होंने उस ग्रंथ को नाम दिया है चिद्व विलास।

वैसे डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्येता होने का साथ ही पट्टी प्रतापगढ़ में एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के प्राचार्य हैं। उनका पौराणिक भारत पर गहन अध्ययन है। कूर्म पुराण के सांस्कृतिक अध्ययन, प्राक् एवं प्रागितिहासिक भारतीय पुरातत्व जैसे कई प्रकाशित हैं। इतिहास की कई और पुस्तकों के साथ ही विवादास्पद सेतुबंध रामेश्वरम् पर एक ग्रंथ प्रकाशनाधीन है। यह ग्रंथ सेतुबंध के तमाम पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डालेगा।


जैसा कि मैंने अभी कहा कि चिद् विलास एक कुटुंब के बनने और समाज में अपनी जगह बनाने की बड़ी रोचक गाथा के रूप में सामने आता है। कैसे एक गर्ग गोत्र में लखनौरा शुक्लों की एक शाखा अलग से बनती है। कैसे एक वंश अपने पिछले इतिहास को भूलते याद करते स्थानांतरित होते हुए भी अपने अतीत से जुड़ा भी रहता है। कैसे एक पिता अप्रत्यक्ष रूप से अपने पुत्र को साथ ही अगली कई पीढ़ियों को दिशा देता है। पुस्तक में डॉ.शुक्ल की लेखकीय शक्ति बार-बार चमत्कृत करती है। खासकर उन स्थलों पर जब वे पिता को खो देते हैं। वे प्रसंग सचमुच मर्माहत करने वाले हैं। कुछ अंश आप भी पढ़े-
एक-
उनकी( पिता की) शवयात्रा की तैयारी पूरी कर ली गई। हमलोगों ने उन्हें कंधा दिया। और रसूलाबाद श्मशान घाट ले जाया गया। पिता का वह चेहरा जिसे मैंने जिंदगी में सैकड़ों बार छुआ और अनुभव किया था, राख में परिवर्तित हो रहा था। सांसों को खींचे मैं पीछे हट आया।

दो-
सारी उम्र वे हम भाइयों व बहनों को ऊँचा उठाने, में जीवन में गुणवत्ता भरने और समाज के सभ्यनागरिक बनाने में जुटे रहे। आज हम सब खुले में आश्रय रहित अनुभव कर रह थे। छत्रछाया हट चुकी थी। उन्होंने ढाल की भाँति हमें सुरक्षा दी थी।

तीन-
पिता जी को बरामदे में जमीन पर लिटाया गया था। उनका चेहरा मात्र खुला था। जिसमें किसी फ्रकार की आभाहीनता परिलक्षित नहीं हो रही थी। लगता था कि यौगिक साधना में शरीर को शिथिल किए हुए हैं।

पूरे ग्रंथ को पढ़ने के बाद इसे फिर से पढ़ने को मन करता है। समाजेतिहास के साथ ही एक अलग तरह की औपन्यासिकता चिद् विलास को अलग मुकाम देती है। आजकल के बोझिल लेखन तुलना में शुक्ल जी का लेखन काफी रोचक और पठनीय है, तमाम सामाजिक संदर्भ अपने आप जुड़ते जाते हैं। यदि आप सब इस ग्रंथ को पढ़ना चाहें तो। पारिजात प्रकाशन, 247 सी/5, ओम गायत्री नगर इलाहाबाद से इसे प्राप्त कर सकते हैं। विनय पत्रिका के मार्फत सम्पर्क करनेवालों के 40 प्रतिशत की विशेष रियायत दी जाएगी।

· ग्रंथ के अन्यान्य प्रकरणों पर और लिखना चाहता था लेकिन अभी इतना ही।

Saturday, April 11, 2009

फिल्म सरपत का असर और दाम्पत्य




साथ-साथ हैं

तीन चार दिन हुए, मित्र अभय की फिल्म सरपत देखी। फिल्म का ऐसा प्रभाव रहा कि घर आकर एक कविता लिखी। मैंने ऐसी बहुत कम कविताएं लिखी हैं जो कि किसी रचना से प्रभावित हो या प्रेरित हो। लेकिन सरपत ने तो मन को चीर दिया। फिल्म देखने के बाद मैं वहाँ बहुत देर तक कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था। एक उछाह, एक जलन एक लगाव की भावना से भर गया था। आज उस कविता को ब्लॉग पर चढ़ाने जा रहा था कि पत्नी आभा ने कहा कि इस कविता पर थोड़ा और काम करो। सो आज रपत पर लिखी मेरी कविता रुक गई। आप सब क्षमा करें।

उसके बाद हम दोनों बाकी के ब्लॉग पढ़ने लगे। साथ-साथ । घर में अक्सर ऐसा ही होता है कि एक पढ़ रहा होता है या कुछ छाप रहा होता है कि दूसरा आ धमकता है कि क्या है जो पढ़ा जा रहा है, क्या चढ़ा रही हो, रहे हो, क्या टिप्पणी कर रहे हो, कर रही हो जैसे प्रश्न शुरू हो जाते हैं। और बिना माँगे सलाह देने और रास्ता दिखाने का लोकतांत्रिक अधिकार लागू किया जाने लगता है।

किसे टीप दें। किसे पसंद करें। किसे रहने दें सब पर किच-किच होती है किंतु ब्लॉग-पढ़ाई साथ में जारी रहती है। हम दोनों की पसंद नापसंद एकदम जुदा है। जिसे जाहिर करने की यहाँ कोई जरूरत नहीं है। किटकिटाते खिलखिलाते हम कई-कई पोस्ट साथ-साथ पढ़ते हैं। आप इसे दाम्पत्य सुख माने या कुछ और लेकिन होता कुछ ऐसा ही है। क्या करें।

Saturday, March 28, 2009

तेरी किताब की ऐसी तैसी



रहूँगा न मैं घर के भीतर

घर किताबों से भर सा गया है। हर तरफ मेरी किताबें...मेरे लिए किताबें। थक रहा हूँ किताबों से। ऊब सी न हो जाए उसके पहले सोच रहा हूँ कि किताबों की खरीद पर रोक लगा दूँ। मेरे पास जिनकी किताबें हैं उन्हें बजिद लौटा रहा हूँ। प्रकाशकों के यहाँ से गलत आ गई किताबें उन्हें वापस कर रहा हूँ। कई आकर्षक शीर्षकों वाली किताबें छल गईं हैं। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कुछ नए कवियों कहानीकारों के संग्रहों को भी वापस कर रहा हूँ। प्रकाशक पता नहीं क्या सोच कर किताबें छाप देते हैं। कोई अजीब आलोचक न समझ में आने वाली भाषा और वाक्यों में उस किताब के बारे में कुछ लिख देगा। बस हो गया काम तमाम।


नई किताबों के लिए सच में घर में कोई जगह ही नहीं बची है। मन खट्टा सा हो रहा है। टांड तक पर किताबें लदी है। आज निर्णय ले रहा हूँ कि 2010 के मार्च तक किसी किताब को घर में घुसने नहीं दूँगा। तेरी किताब की ऐसी तैसी। किताबों से बैर नहीं है । यह वाक्य छापकर दुखी हूँ लेकिन दशा ऐसी ही है। पढ़ने का अवसर कम होता जा रहा है और किताबें गंजती जा रही हैं। किसी भी बात की हद होती है। मेरे यहाँ किताब की हद हो गई है। एक अभिनेता मित्र के यहाँ 300 किताबें कल पहुँचा चुका हूँ। वे खुद उलझन में हैं कि उन किताबों का क्या करेंगे।


घर है कोई लाइब्रेरी नहीं। बच्चे संकोची हैं बोलते नहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि भानी के तकिए में मैं किताबों को भर दूँ। अपनों पर यह भी तो एक तरह का टार्चर है कि उन्हें किताबों से लाद दो। हाँ सचमुच में अति हो गई है।

किताबों की छंटनी के समय सोचता रहा कि क्या यह केवल मेरा घर है। और दुखी हो रहा हूँ । अगर यही हालात रहे तो घर अपना नहीं रह जाएगा केवल किताबें रह जाएगीं। निराला कि एक पंक्ति याद आ रही है-

रहूँगा न मैं घर के भीतर
जीवन मेरे मृत्यु के विवर।

Friday, March 27, 2009

बहुत कठिन है अकेले रहना


बिन बच्चों घर भूत का डेरा

सालों बाद ऐसा हुआ है कि घर में अकेला हूँ। तीन दिन से प्रेत की तरह इस कमरे से उस कमरे में घूम रहा हूँ। लगातार किसी ना किसी से फोन पर बात कर रहा हूँ। या फोन का, किसी के आने की राह देख रहा हूँ। आभा और बच्चे गाँव गए हैं । इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ वे सब मुझे घर में अकेला छोड़ कर निकल गए हों। अक्सर हम साथ ही बाहर गए हैं। यहाँ तक कि शादी के बाद यदि आभा दो दिन के लिए भी मायके गई हो तो मैं घंटे दो घंटे बाद बिन बुलाए बताए वहाँ हाजिर हो जाता रहा हूँ।

बच्चों को गाँव मिला है। सब वहाँ मस्त हैं। कल फोन पर आभा ने बताया कि भानी ने गाँव पहुँचने के बाद से मुझे पूछा तक नहीं है। उसे मुझसे बात तक करने की फुरसत नहीं है। यही हाल बेटे मानस का भी है।
तीन दिनों में ही मुझे समझ में आ रहा है कि अकेला रहना एक अभिशाप की तरह है। हालाकि यह कैद ए तनहाई ३० को खत्म हो जाएगी। अकेलेपन का रचनात्मक क्या विनाशात्मक प्रयोग भी नहीं कर पा रहा हूँ। हाँ इतना जरूर किया है कि घर से थोड़ा कूढा हो गई किताबों को हटाया है। और एक तुलसी का पौधा लगाया है । उसे देख कर लग रहा है कि वह लग गई है। दिन में जब भी घर में होते हैं उसे पानी दे आते हैं देख आते हैं। याद आ रही है इलाहाबादी कथाकार केशव प्रसाद मिश्र की कहानी और तुलसी लग गई। आप में से किसी के पास होतो पढ़ाने का उपाय करें।

Wednesday, March 25, 2009

सुदिन की याद नहीं चाहती थीं पांती काकी

पांती काकी के लिए प्रार्थना करें

आखिर हम सब की पंता या पांती काकी विदा हुई । खूब धूमधाम से उनके सारे संस्कार किए गए। ब्रह्म भोज हुआ। महापात्र विदा हुए। दो तीन बार गऊ दान हुआ। एक तीन बाई डेढ़ की वैकल्पिक वैतरनी बनाकर गऊ की पूछ पकड़ काकी के स्वर्ग पहुँचने का रास्ता बनाया ब्राह्मणों ने। एक बृद्धा महाबाभनी मेरी काकी बन कर आई। उसका खूब सत्कार हुआ। एक कंचन पुरुष की प्रतिमा और एक ब्राह्मण दम्पती की युगल रजत प्रतिमा भी महापात्रों को दी गई। काकी अगले जनम में सुहागन रहें इसके लिए सिंदूर और मंगल सूत्र भी दान दिया गया।

काकी पहले भी सम्मानित थीं। कभी किसी ने उन्हें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कुछ कहा हो घर में इसकी याद किसी को नहीं है। बस काकी के मन में निपूती और वंश हीनता का घाव था जो कि उन्हें सालता रहा। वे पुरखों की सम्पदा से बेदखल थी। लेकिन माया महा ठगनी होती है। काकी ने अपने न रहने पर होने वाले संस्कारों के लिए कुछ जोड़ रखा था। उनके बैंक खाते में श्राद्ध आदि के लिए 33 हजार रुपए जमा थे। ये पैसे उनको निश्चित रूप से उनके प्रिय भाई श्री उमाशंकर जी ने दिए होंगे। उनके रुपयों के साथ ही उसके पाँच भतीजों ने सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए पैसे खर्च करके काकी के अंतिम सब काम किए। हम सब के बड़े भैया अवधेश कुमार मिश्र ने बड़े प्यार, श्रद्धा और विधि विधान से काकी मोक्ष के उपाय किए। 21 मार्च 2009 को काकी की तेरहवी सम्पन्न हुई। इसके बाद बस अब काकी की तिथि आएगी और जाएगी। हम उन्हें कभी कभार याद करेंगे।

जो फरा सो झरा जो बरा सो बुताना है। जेते जीव आए हैं जगत में सबहीं को जाना है। इस आधार पर जाना और जीना तो हम सब को है। लेकिन काकी ऐसे नहीं जाना और जीना चाहती थीं। वे अक्सर कहा करती थीं कि सुदिन को दुर्दिन में याद करके कलपना रोना ही सबसे बड़ा दुख है। काकी सुदिन को याद करके रोने भी लगीं थीं। मृत्यु के कुछ दिनों पहले वे भगवान को कोसने भी लगीं थीं। काकी का छोटा सा कमरा उनके जाते ही सूना सा हो गया था। काकी के जाने का हाहाकार वहाँ ही नहीं सारे गाँव में छाया हुआ था, खास कर उन औरतों में जिन्हें काकी कुछ देकर मदद करती थी। बचपन में काकी के उधार की वसूली मैं करता था। उस प्रसंग पर कभी बाद में बात करूँगा।

आप सब की प्रर्थनाएँ काकी तक पहुँची होंगीं । क्योंकि प्रार्थना और बददुआ कभी निस्फल नहीं जाती। काकी के लिए दुआ करें। यह भी दुआ करें कि यदि उन्हें कहीं जमन मिले तो भरपूर सुख मिले। उनके इस जनम के सारे मनोरथ सारी कामनाएँ पूरी हों। हिंदी के कवि रमेश पांडेय काकी से उनके गाँव भिखारीराम पुऱ जाकर मिले थे। उन्होंने उन पर एक कविता लिखी थी। जो उनके अनचाहें ही संपादित होकर पहल में प्रकाशित हुई थी। काकी के न रहने पर मेरी रमेश पाण्डे से बात हुई थी। वे काकी को लेकर काफी भावुक थे। यहाँ पढ़ें वह कविता।

पान्ती काकी

मैं पान्ती काकी के बारे में
पूछता हूँ
और लोगों की आँखों में
पढ़ता हूँ दुख तन्त्र
लोग कमला दासी के
बारे में पढ़ते हैं
किताब में
कविताओं में

Sunday, March 15, 2009

नहीं रहीं मेरी काकी

मैं तुम्हें देख नहीं पाया काकी

मेरी पान्ती काकी का 9 मार्च को देहान्त हो गया। उनके न रहने की सूचना मैंने आप सब को होली के चलते नहीं दी। काको लगभग 77 साल की थीं। वैसे वे मेरी ताई थीं। लेकिन हम सारे बच्चे उनको काकी ही कहते थे। जीवन के तमाम अकल्पनीय दुख उन्हें सहने पड़े। वे बेऔलाद और विधवा थीं। उन्हें उनकी पुश्तैनी सम्पदा से बेदखल कर दिया गया गया था। ऐसी दशा में किसी भी स्त्री का जीवन कितना विकट हो सकता है इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। यह स्वीकार करने के अलावा कोई राह नहीं है कि हम उन्हें उनका कोई भी हक नहीं दिला पाए हालाकि उन्होंने कभी ऐसी कोई माँग नहीं की। मैंने उनके ऊपर एक कविता लिखी थी जो कि मेरे पहले संग्रह में संकलित है। अपना तीसरा कविता संग्रह दुख तंत्र मैंने काको को समर्पित किया था। जिसपर काको बहुत खुश हुईं थी। किताब में अपना नाम देखना उन्हें बहुत भला लगा था। लेकिन यह सब क्या मेरी काको के लिए काफी है। उन के जीवन पर मैंने काफी कुछ लिखा है जिसका एक बड़ा हिस्सा उन्हें सुनाया भी था। विनय पत्रिका के शुरुआत में मैंने उन पर एक पोस्ट में कुछ लिखा भी था। आप उन पर लिखे को वहाँ पढ़ सकते हैं।

बीमार तो कई दिनों से थीं लेकिन 9 मार्च की सुबह से ही उनकी स्थिति बिगड़ने लगी थी। मैं वहाँ से बराबर संम्पर्क में था। माँ से बात हुई उसने कहा कि सब ठीक हो जाएगा। ऐसा कई बार हुआ भी था काकी जाते-जाते रुक जाती थीं। मैं सपरिवार वैसे भी 23 मार्च को गाँव जा रहा था। 3 मार्च को उनसे बात भी हुई थी। फोन पर उनकी आवाज से अधिक उनके दमें की हफनी सुनाई पड़ रही थी। मृत्यु उनके लिए भय का कोई कारण नहीं रह गया था। उन्होंने कहा भी कि अभी मरनेवाली नहीं 23 को आओ तो मिलती हूँ। लेकिन काके से मुलाकात न हो पाई । 9 की शाम को मुझे गाँव से फोन आया कि काको नहीं रहीं।

मैं किसी भी हाल में बनारस पहुँचना चाहता था। काको की इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार बनारस में हो। लोग उन्हें बनारस ले जाने की तैयारी में थे और मैं उनके पास पहुँचने के लिए भाग रहा था। रात 11 की फ्लाइट से टिकट भी बुक हो गया था। लेकिन उनके पास उपस्थित मेरे समझदार भाई लोग उनके लिए बरफ का भी इंतजाम नहीं कर पाए । जिस कारण उनको देर तक रोकना असंभव हो गया था। मुझे फोन आया कि हालात ठीक नहीं हैं। शरीर बिगड़ रहा है। गाँव के बूढ़े बुजुर्गों का कहना था कि भोर में ही उनका संस्कार कर दिया जाए। और यही हुआ। उन्हें 5 बजे भोर में अग्नि को समर्पित कर दिया गया। मेरी काको स्वाहा हो गईं। मैं एयरपोर्ट से वापस घर लौट आया। उनको आखिरी बार देखने भी नहीं पहुँचा।

काको से सितंबर में मिला था। तब वे ठीक थीं। लेकिन जीवन से उकताहट अपने चरम पर था। काको तब भी जीना नहीं चाहती थीं। काको दरअसल कभी भी जीना नहीं चाहती थीं। वे केवल समय बिता रहीं थी। उन्हें इस जीवन में मिला ही क्या था जो वे और जीने की सोचतीं।

मेरी काको को सैकड़ों भजन याद थे। भागवत की कथाएँ मैंने बचपन में उनसे ही सुनी। जब भी मैं या घर के बच्चे बीमार होते काको सिरहाने रहती। कहती कुछ नहीं है बस मैं मंत्र पढ़ देती हूँ तुम ठीक हो जाओगे। उनके पास बर्र के काटने से लेकर नजर, टोना, बुखार, अधकपारी तक के मंत्र थे। मंत्रों पर बाद में भरोसा नहीं रह गया था लेकिन जब भी काको झाड़-फूँक लिए सामने आतीं मैं चुप हो जाता। और काको मंत्र पढ़ने लगती। बहुधा हमें उनके मंत्रों से आराम मिलता था। मेरा मानना है कि काको अपने भगवान से हमारे लिए प्रर्थना करती थी। वे भगवान से कहती रही होगीं मेरे बच्चे को ठीक कर दे भगवान। और उनका भगवान हमारे दु:ख तकलीफ हर लेता था। अभी अपनी प्रर्थनाओं मंत्रों से हमारे दु:ख हरने वाली काको नहीं रहीं। हर मुश्किल का हल जानने वाली दुबली पतली दमा, दुर्भाग्य और दायादों की मारी मेरी काकी नहीं रहीं। काकी पर लिखी मेरी 1988 की कविता मैं यहाँ प्रकाशित कर रहा हूँ। यह कविता श्रद्धांजलि है मेरी।

काकी

काकी,
तेरा हाथ टूटा
मैं देखने नहीं पहुँचा

मुझे दु:ख है
तेरे हाथ के इलाज में
मैं कुछ कर न सका।

काकी मुझे याद है
तुम दबाया करती थीं
मेरे पाँव
दुखने पर
काकी, तूने
मेरी चड्ढ़ी का नाड़ा
बाँधा है
बझने पर
खोला भी है।

काकी,
मुझे याद तो नहीं
लेकिन मैं
सोच सकता हूँ
तूने किया होगा
मेरा तेल उबटन
“ लाला बड़ा होयिं
भइया बाढ़यिं ”
कह कह कर।

काकी,
मैं कुछ इस तरह
फँसा हूँ यहाँ
जैसे बंदर
चने की हाँड़ी में
मुट्ठी बाँध कर फँसता हैं,

काकी मैं तुम्हारे पास आना चाहता हूँ
पर आ नहीं सकता
काकी, मैं
तुम्हारे पास आऊँगा,

काकी
तुम माँख न मानना
मैं अभी नहीं आ सकता।

नोट- मैं माफी चाहूँगा आज भी काकी की फोटो नहीं चढ़ा पा रहा हूँ। फिर चढ़ाऊँगा। मैं 17 मार्च से 27 मार्च तक भदोही गाँव में रहूँगा। काकी का त्रयोदशाह 21 मार्च को है।

Friday, February 27, 2009

कुछ भी खोने का साहस नहीं बचा है मन में

उगना रे मोर कितै गेला

परसों घर से किताब लेकर निकला। हालाकि किताब और कलम लेकर निकलना मेरी आदतों में शामिल हो गया है। जब से होश सम्हाला है मुझे याद नहीं कि कभी घर से बिना किताब या कलमे के निकला होऊँ। मुझे याद नहीं कि कभी किसी से कलम माँग कर कुछ लिखा हो। जेब में चवन्नी न हो लेकिन एक कलम चमकती रहेगी। बगल में छुरी न हो लेकिन एक पोथी दबी रहेगी। जब घर से निकलता था तो पिता जी कहते थे देखो लैस होकर निकला है। वे मेरी इस किताबी आदत को बहुत बढ़ावा नहीं देते थे। कहते थे कि कभी-कभी बिना किताब के भी निकला करो। किताब के बाहर की दुनिया बहुत बड़ी है। लेकिन मैं बिना किताब के अपने को निहत्था पाता था।


लेकिन मेरी किताब के साथ जीने की आदत गई नहीं। हालात तो यहाँ तक है कि अगर तकिए के नीचे किताब ना हो तो मैं सो नहीं सकता। नीद गुम जाती है। वह किताब कैसी भी हो ......उपन्यास हो, कहानी हो कविता हो या जीवन चरित, लेकिन होनी चाहिए एक किताब।

सो परसों भी अपनी एक प्रिय पोथी लेकर या पिता जी के शब्दों में कहें लैस होकर निकला। लेकिन वह किताब कहीं राह में छूट गई। किसी प्रोडक्शन हाउस, किसी चाय की दुकान या कहीं। मैं याद नहीं कर पा रहा हूँ कि आखिर वह विद्या पति पदावली रह कहाँ गई। नागार्जुन सम्पादित वह पदावली तो खैर मिल जाएगी लेकिन उस पोथी के साथ जो गया वह कहाँ मिलेगा। बस उसे खोकर थका सा पा रहा हूँ। क्योकि मन कुछ भी खोकर पस्त हो जाता है। लगता है भीतर कुछ खोने का सहस ही नहीं बचा है।

लेकिन अभी क्या कर सकता हूँ। सिवाय जिसे खो दिया उसे याद करने के । आप कह सकते हैं कि ऐसा क्या खो गया। खोई हुई उस किताब में मेरे बेटे मानस के हाथ की छाप और उसकी एक फोटो चिपकी थी । घर में ऐसी कई किताबें हैं जिनमें बिटिया भानी या बेटे के हाथ का छाप है। मानस की वह फोटो और हाथ का छाप तब का था जब वह दो साल का भी नहीं था।
जब से खोया तब से मैं लगातार रह रह कर गा रहा हूँ विद्यापति का एक पद उगना रे मोर कितै गेला। मुझे नहीं लगता कि वह पोथी अब मिलने वाली है। हर उस जगह फोन किया जहाँ गया था, उन दो तीन दुकानों के चक्कर लगाए लेकिन नहीं मिली । अब मिलने की संभावना भी नहीं है। बस गाते या बिसूरते रहने के। हालाकि उस किताब मे मेरे पते का स्टीकर चिपका है। हो सकता है कोई फोन आए....

Saturday, January 31, 2009

मिलना केहिं बिधि होय

मिलने न मिलने के बीच
परसों मित्र अभय से बात हुई। मिलने की हुड़क जगी। लेकिन मिल नहीं पाया। हम अक्सर चाहते हुए भी मित्रों से नहीं मिल पाते। जिनसे मिलना अच्छा लगता है उनसे मुलाकात नहीं हो पाती । अभय के घर से बस हजार मीटर के फासले पर मैं था लेकिन मिलाप नहीं कर पाया । ऐसे ही ठुमरी वाले विमल भाई तो कुल ८ सौ मीटर की दूरी पर डेरा जमाते हैं लेकिन मुलाकात नहीं होती। यूनुस भाई भी कुल हजार पंद्रह सौ मीटर की दूरी पर विराजते हैं लेकिन ले दे कर उनसे चार छ मुलाकाते ही निकलती हैं। इसके उलट जिनको देखने से दुख उपजता है ऐसे कितनों से रोज बार बार मिलना पड़ता है। न चाहते हुए भी दाँत चियारना पड़ता है। हें हें करना पड़ता है। मन लात मारने का होता है और हम पाँव दाबते रहते हैं।

मुझे लगता है मिलना तो सभी चाहते हैं ...लेकिन मौका नहीं मिल पाता होगा... जैसे परसों मुझे नहीं मिला । परसों शाम से घर पर बेटी भानी लगातार मेरे लिए रो रही थी। पापा.......आ जाओ। पापा। और मैं उससे कहता जा रहा था कि आ रहा हूँ बेटा। बस चल रहा हूँ पहुँच रहा हूँ । लेकिन असल में मैं उससे झूठ बोल रहा था। मैं कहीं, एक साहित्यिक या कहें कि वैचारिक बतकचरे में उलझा था। अवध से कुछ वाम पंथी मित्र आए थे । मैं केवल उनसे मिलने के लिए ही भागा हुआ अंधेरी तक गया था।

किसी हिसाबी आदमी से आप 10 साल बाद मिलें और मिलते ही गलती से खुद ही पुरानी दफ्न बातों को छेड़ बैठें तो क्या होगा। आप समझ सकते हैं । हम कुछ दफ्न बातों में उलझ कर रह गए थे और बात किसी किनारे पहुँच नहीं रही थी। वे अपने स्थान पर सही थे क्यों कि वे शुद्धतावादी थे लेकिन शायद मैं नहीं था क्यों कि मैं मज्झिम निकाय पर चलने की बात कर रहा था।

बहस के केंद्र में शहीद भगत सिंह थे। उनके छोटे भाई कुलतार सिंह थे। क्रांतिकारियों से सूना होता जा रहा देश था। भुखमरी थी। बेकारी थी । अवसरवाद था। अवसाद था। क्रांति की खोज में देशाटन पर निकले मित्र थे । उनकी शुद्धता से भरी बातें थीं। इसी सब सिलसिले में अभय से मिलने का मामला रह गया।
हाइवे से गुजरते हुए बनराई आरे कॉलोनी का वह मित्र इलाका बगल में छूटता गया । वो सूना सा रास्ता जिससे होकर पहले मैं गोरेगाँव स्टेशन से पैदल अभय के घर आया-जाया करता था। कुल 10 मिनट लगते थे खरामा-खरामा। लेकिन परसों वह 10 मिनट नहीं थे। क्रांति केन्द्रित बहस और भानी का विलाप बीच में दीवार बन गया ।
मैंने अभय से कहा कि मैं आता हूँ गुरू....कल आता हूँ । उसने भी कहा कि ठीक है, बात होती है। कल कल बीत गया है। न मैं गया न बात ही हुई। मैं दिन में कुछ चिरकुटो से बतियाता हुआ सोच रहा था कि हम अक्सर कितना कम मिल पाते अपने उन मित्रों से जिनसे हम बहुत मिलना चाहते हैं। देखते हैं अपने क्षेत्र संन्यासी मित्र से कब और केहिं बिधि मिल पाता हूँ।

Saturday, January 10, 2009

जितेन्द्र की अलग आवाज

आप भी सुने टांड की आवाज
किसी ने कहा है कि कवि को लुभा सकती है तारों की चमक और वह मोहित हो सकता है जंगल में हिलती एक पत्ती से भी। कवि के लिए हर आवाज मायने रखती है। जीतेन्द्र चौहान ऐसे ही कवि हैं जो हर बड़ी छोटी आवाजों को सुनते हैं और अपने तरीके से उसे दर्ज करते हैं। इंदौर, नई दुनिया में काम कर रहे जितेन्द्र के अब तक दो कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। पहला संग्रह पुरखों के बीच 1998 में आया था और उसके ठीक 10 साल बाद आया है नया संग्रह टांड से आवाज। हिंदी कविता के जोड़ भाग से अलग रचनारत इस सहज सरल कवि को अभी बहुत कुछ लिखना है। हिंदी को समृद्ध करना है। कवि बहादुर पटेल अपने ब्लॉग मैं संतूर नहीं बजाता में उनकी एक कविता प्रकाशित कर चुके हैं। यहाँ आप पढ़ें उसके दोनों संग्रहों से एक-एक कविता।

तुम्हारे जाने के बाद

तुम्हारे जाने के बाद
घर ही उठकर
चला गया है
तुम्हारे साथ

मेरे पास तो
सिर्फ
दीवारें बची हैं (पुरखों के बीच)

प्रेम की बूँदों से

हम तो
बाँस के जंगल में
लगी आग की
सुलगती राख हैं
हम तो
शादी के इंतजार में
जिनकी आँखों के
सपने सूख गए
छोड़ गए
आँखों के नीचे
अपने स्याह निशान
ऐसी मंगली बहनों के भाई हैं
हम तो प्रेम बावड़ी से निकले
बादल हैं भरे हुए
जहाँ भी गए
तर ब तर कर दिया
प्रेम की बूँदों से । ( टांड से आवाज)

आप पढ़े इस संग्रह की सारी कविताएँ और फिर बताएँ कि कैसी है टांड की आवाज ।

Friday, January 2, 2009

भूलना चाहता हूँ

कुछ भी भूलता क्यों नहीं

बचपन से सुनता आ रहा हूँ कि बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि ले। लेकिन न जाने कितनी बातें, कितनी घटनाएँ हैं हैं जो चाह कर भी नहीं भुला पाया हूँ अब तक। पढ़ी हुई सैकड़ों कहानियाँ, कविताएँ, देखे हुए हजारों चेहरे मिटते नहीं दिमाग से।

गाँव का पुराना मकान । उसके घर । उसमें बिताई 17-18 साल की रातें और दिन और दोपहरें जस की तस बसी हैं जेहन में । घर के पास एक गोशाला थी । उसमें कई गाय और भैंसें होती थी। वह गोशाला नहीं है लेकिन उसकी एक एक छवि है मन में। उस गोशाले के साथ उसमें भँधे पशुओं के लाम और ऱूप तक याद हैं। एक भैंस थी जो दूध नहीं छोड़ती थी। हम सब ने उसका नाम मन चोट्टिन रखा था। कल एक वैसे ही भैंस दिखी यहाँ। मुझे लगा कि यह उसके ही कुल गोत्र की होगी। वह मेरे घर चंड़ी गठ से आई थी। पता किया तो यह भैंस भी चंड़ी गठ से आई थी। उसके मालिक ने बताया कि यह दूध ही नहीं छोड़ती। इलाज चल रहा है। मैंने मन ही मन कहा कि यह और मेरी मन चोट्टिन सच में एक ही वंश के होंगे।
क्या कोई उपाय है कि सब कुछ या जितना कुछ उड़ाना चाहो एक साथ एक झटके में उड़ा दो। बाकी काम का बचा लो। क्यों कि दिमग में उमड़-घुमड़ मची रहती है। अब तक जो कुछ भरा है उसे कैसे भूलें। कोई उपाय हो तो बताएँ।

Wednesday, December 31, 2008

क्या होगा कल नया जो अब तक नहीं था

२००८ विदा

2009 से कुछ घंटे की देरी पर हूँ। आप भी उतनी ही दूरी पर है। हम सब के जीवन से ३६५ दिन या यूँ कहें कि एक और साल गया।
अगले साल को लेकर न कोई बड़ी उलझन है न कोई बड़ी योजना। बस कुछ छोटी योजनाएँ हैं कुछ छोटे सपने जिन्हें पूरा करने की फिराक में जा सकता है यह 2009।

मैं कोई धंधेबाज तो हूँ नहीं कि एक-एक दिन का एक-एक काम का हिसाब रखूँ। लेकिन यह तो कह ही सकता हूँ कि 2008 में ऐसा क्या नहीं हुआ जो 2009 में हो जाएगा। मेरे लिए यह साल का बदलाव केवल कैलेंडर का पन्ना पलट जाना । बल्कि मैं सोचता हूँ कि पंछियों का कोई नया साल होता होगा क्या। क्या पेड़ पौधे भी अपना नया साल मनाते होंगे। क्या नदियों के पास भी उनके पानी का, बहने का कोई हिसाब होता होगा कि नहीं।
तो कल को एक नया दिन नहीं बल्कि पिछले तमाम दिनों का एक सिलसिला मान कर खुश रहें....और करते रहे अपने रोज मर्रा के काम। कल सुबह कुछ भी ऐसा नहीं होगा जो कि आज या बीते कल या 2001 या 1968 की किसी 1 जनवरी को नहीं हुआ होगा।
लेकिन आप सब को यह साल अच्छा रहे.....शुभ कामनाएँ।

Sunday, November 30, 2008

मैं बचा हूँ कुशल से हूँ

मैं सही सलामत हूँ

मैं इसलिए बचा हूँ
क्योंकि मैं घर में बैठा हूँ.....
यदि मैं भी वहाँ होता गेटवे या ताज पर तो
आप सब मेरा शोक मना रहे होते।
मैं इसलिए बचा हूँ क्योंकि मैं
वहाँ नरीमन हाउस में नहीं था
ओबरॉय में नहीं था जहाँ गोलियाँ चल रही थीं....
जहाँ मौत का महौल था।
मैं सच में केवल इसलिए बचा हूँ क्योंकि
मैं बच-बच कर रह रहा हूँ
मैं बच-बच कर जीने का अभ्यासी हो गया हूँ
जब से पैदा हुआ यही सिखाया गया
सब यही कहते पाए गए हैं कि बच के रहना
उधर नहीं जाना, उससे नहीं लड़ना
घर में रहना
सावधान रहना
अपना ध्यान रखना....
और मैं
घर में हूँ
अपना ध्यान रख रहा हूँ
किसी से नहीं लड़ रहा हूँ
बच कर रह रहा हूँ
इसीलिए अब तक
बचा हूँ।

Friday, October 31, 2008

प्रभु जी काहे दिए गुरु कपटी

गुरु महिमा

हर किसी के जीवन में गुरु का बहुत महत्व है...मेरे जीवन में भी है....मैं अपने गुरुओं का बहुत ऋनी हूँ....और सदैव श्रद्धा से स्मरन करता हूँ.....किन्तु बहुत से चेले ऐसे होते हैं जिन्हें अच्छे गुरु नहीं मिलते। एक कहावत है पानी पिओ छान के , गुरु करो जान के। पानी छानने के लिए तो भाँति-भाँति के फिल्टर मिलते हैं...किन्तु गुरु को जानने के लिए कोई हिल्टर नहीं मिलता...मैं तमाम बड़ी कंपनियों से निवेदन करूँगा कि वे एक गुरु जाँचक यंत्र बनाएँ....जिससे चेलों को ऐसा कष्ट न हो जैसा निचे लिख रहे चेले को हुआ है.....
यह मेरा नहीं एक पिछे रह गए चेले का दुख है....उसके दुख को समझें....उसे अच्छा गुरु मिलो यह दुआ करों...

चेला चौपदी

प्रभु जी काहे दिए गुरु कपटी
जात हैं जब गुरु से ग्यान माँगन को, मारत डंडा झपटी।। प्रभु जी।।
जात हैं जब गुरु की सेवा करन को , देत उठाइके रपटी।। प्रभु जी।।
जात हैं जब गुरु से मुक्ति माँगन को, गर धरत हैं लपटी।। प्रभु जी।।
जब गुरु कहत मौन रहन को, गुरुनी गारी देत है डपटी ।। प्रभु जी।।

Friday, October 24, 2008

भानी हिंदी हैं.....



तुमको सुनना पड़ेगा....

भानी की छुट्टियाँ हैं...दीपावली की.....मेरा घर में काम करना मुश्किल हो गया..है...। थोड़ी-थोड़ी देर पर वह यमदूत की तरह हाजिर होती है और अपनी बात सुनने को कहती है...मेरी मजाल की मैं भानी की बात न सुनूँ....न सुनने पर कहती है कि तुमको सुनना पड़ेगा नहीं तो घर से निकाल दूँगी....।

परसों उन्होंने डरा-धमका कर जो बात सुनाई आप भी पढ़ें...
भानी से उनकी किसी दोस्त ने पूछा कि तू क्या है....उसका प्रश्न न समझते हुए भानी ने कहा कि तू क्या है...। उस लड़की ने कहा कि मैं गुजराती हूँ....भानी ने साथ में खड़ी दूसरी लड़की से पूछा कि तू क्या है...उस लड़की ने कहा कि मैं मराठी हूँ.....अब बारी थी भानी के उत्तर की । जब भानी को कोई बात ना सूझी तो भानी ने कहा कि वह हिंदी है....। लड़कियों ने उनकी बात मान ली । यह किस्सा बता कर भानी ने मुझसे यह जानना चाहा कि उन्होनें सही बताया या गलत । मैंने कहा कि तुमने सही बताया....।

भानी खुश होकर खेलने चली गईं....मैं उसके उत्तर से और जल्दी चले जाने से बहुत खुश हुआ....कि चलो गई ....लेकिन थोड़ी ही देर में वह फिर हाजिर थी.....पापा तुम्हें गुजराती आती है....मुझे आती है...बताऊँ...बैठ जाओ को क्या बोलते हैं....फिर उन्होंने अपना गुजराती ज्ञान पूरा सुनाया.....और मुझे अज्ञानी पाकर विजेता सी बाहर चली गई....।
विजय दशमी पर गरबा के लिए जाती भानी का चित्र......

Tuesday, October 7, 2008

शायर बेटे को खुसरो की नसीहत

आम लोगों के रूह की आवाज सुनो

शायर कवि संगीतज्ञ सूफी संत अमीर खुसरो ने अपने जीवन के अंतकाल में अपने बेटे गयासुद्दीन अहमद को कुछ नसीहतें दी थीं...हो सकता है खुसरो की नसीहतें आपके भी काम आए...

पहली नसीहत यह है गयास बेटे मैंने हिंद की खाक को अपनी आँखों का सुरमा बना लिया है, इसलिए तू भी हिंद को ही अपना सब कुछ समझना ।

दूसरी नसीहत यह है क्योंकि तू भी शायरी करने लगा है, इस लिए मैं चाहूँगा कि हिंदवी जुबान में ही शायरी करना।

तीसरी नसीहत यह है कि गयास अपनी शायरी का कोई भी हिस्सा शाहों की खुशामद में बर्बाद मत करना , जैसा कि मैंने किया है...। मैं चाहता हूँ कि तू हिंद के आम लोगों में घुल मिल कर उनकी रूहों की आवाज सुन और फिर उस रूह की आवाज को ही अपनी शायरी की रूह बना लेना।

अब गयास ने अपने प्यारे अब्बा की किस नसीहत पर कितना अमल किया मैं कह नहीं सकता ना ही यह बता सकता हूँ कि आज वह कौन शायर कवि है जो आम लोगों के रूह की आवाज सुन रहा है और उस आवाज को अपनी शायरी की रूह बना रहा है...मुझे तो कोई नहीं दिख रहा है...आप को दिखे तो बताएँ...