Saturday, March 8, 2008

झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....

पत्नी को आजादी मुबारक

कल का दिन मेरे लिए बड़ी अजीब खुशी देनेवाला और दुविधा भरा था....खुशी की बात यह थी कि मेरी पत्नी आभा ने अपनी कविता न सिर्फ पूरी खुद से टाइप की बल्कि अपने से अपने ब्लॉग अपनाघर पर उसे प्रकाशित भी किया....दुविधा की बात यह थी कि उसने इस काम में मेरी कोई मदद नहीं ली....इस पोस्ट के पहले वह अक्सर मेरी मदद लेती थी कम से कम टाइप करने में....मैं उसकी पोस्ट टाइप करने में एक बुद्धिजीवी या कहें कि पति या मित्र या पुरुष की हैसियत से टोका-टाकी किया करता था.....और अक्सर उसे मेरी बेवजह की अड़ंगेवाजी झेलनी पड़ती थी....लेकिन कल उसने भूल और गलतियों की परवाह न करते हुए अपनी पोस्ट चढ़ा दी और मुझे बताया भी नहीं....

पता नहीं किस दुविधा के चलते मैंने कभी उसके लेखन को बहुत मन से उत्साहित नहीं किया...जबकि वह मुझसे पहले से लिखती रही है....यही नहीं...पिछले पंद्रह सालों से मैं अपनी हर कविता उसे सुनाकर उसके सहज सुलभ सुझावों से अपनी रचनाशीलता को बेहतर बनाता रहा हूँ....

लेकिन कल दिन में आभा ने खुद मुख्तारी का ऐलान कर दिया....और मुझे पता भी नहीं चला....जब हमेशा की तरह मैंने ब्लॉग का पन्ना खोला तो उसकी कविता देख कर चकित रह गया.....और मेरे मन में पहला सवाल आया कि गुरू यह तो सच में क्रांति हो गई....लेकिन मैं सच कहूँ....मैं.बहुत खुश हुआ....उसे फोन करके बधाई दी....उसकी पोस्ट को पसंद भी किया....वह बहुत खुश थी....
उसकी बातों में स्वतंत्रता की खुशी और खनक थी....मैं फोन पर उसके चमकते अनार दाना दंत पंक्तियों को देख रहा था....मैं उसकी आँखों में एक आत्मबल की चमक महसूस कर रहा था....एक ऐसी चमक जो यह उद्घोष करती है कि हम तुम्हारे आधीन अब नहीं हैं.... हम तुम्हारे साथ हैं सहचर हैं....गुलाम नहीं हैं....पत्नी हूँ....बोझ नहीं हूँ.....मैं भी हूँ....सिर्फ तुम ही तुम नहीं हो....बच्चू....

मुझे ऐसी ही खुशी और दुविधा तब भी हुई थी....जब मैंने आभा को पहली बार गाड़ी चलाते हुए देखा था...मैं सच कहूँ जब हम इलाहाबाद में साथ पढ़ते थे....और हमरा प्यार एकदम नया था..... तब मेरी बड़ी इच्छा .थी आभा को सायकिल चलाते देखने की...पर वहाँ उसने सायकिल चलाकर नहीं दिखाया......
सायकिल न सही कार ही सही...मित्रों अपने से अपनी गति और दिशा तय करना बड़ी विलक्षण बात होती है....और मेरी पत्नी मेरी एकमात्र सखी ने उस विलक्षणता को पा लिया है....और मैं अपनी सब दुविधाओं को दूर करके उसे बधाई देता हूँ......मैं कामना करता हूँ कि वह और अच्छा और बेहतर लिखे....वह अपने उन तमाम अनुभवों को लिखे जो कि वही लिख सकती है....मुझे उसके लिखे का इंतजार रहेगा.... वह उड़ान भरे ...गिरने की परवाह....न करे....या यह कि आभा .....
झंड़ा ऊँचा रहे तुम्हारा....

चलते-चलते अपने ब्लागर मित्रों से पूछना चाहूँगा कि भाई....तुम्हारे ब्लॉग पर कभी तुम्हारी पत्नी का नाम-चेहरा-दुख-सुख क्यों नहीं झलकता...क्या उसकी स्वतंत्रता को लेकर कोई दुविधा है तुम्हारे सामंती मन में.....क्या ब्लॉग की अनंत खिड़की पर भी तुमने अपना पैत्रिक अधिकार समझ लिया है....क्या यहाँ भी तुम्हारी बपौती है....

भाई...अगर अपनी पत्नी को स्वतंत्र नहीं कर सकते तो...समाज के तमाम तबकों की आजादी समता समन्वय की बातें खोखली नहीं हैं....तुम्हारा सारा प्रगतिबोध आत्मोत्थान का उपादान या सोपान भर नहीं है....या यह तुम्हारा प्राचीन पर्दा प्रथा को शहर के कमरों में जिंदा रखने का एक सोचा-समझा खेल है....क्या है भाई...बताओ....मैं तुम्हारा पक्ष सुनना चाहता हूँ....

आगे.........लगातार.....

17 comments:

अभय तिवारी said...

आज़ादी का अपना सुख है और बन्धन का अपना! दोनों चाहिये!

अनूप शुक्ल said...

सही है। अपनाघर की प्रगति पर बधाई!

Sanjeet Tripathi said...

वाह, ये तो बहुत बढ़िया है!!
बधाई!!
आपके सवाल मेरे लिए तो है नही शायद ;)

anuradha srivastav said...

आभा जी के इस कदम के लिये हम भी खुश हैं।

आनंद said...

भाभी जी का प्रयास प्रशंसनीय है। और उन्‍हें आत्‍मनिर्भर बनता देखकर आपकी खुशी साफ-साफ दिखाई पड़ रही है। इसी तरह आत्‍मनिर्भर बनें, और इसी भावना के साथ एक दूसरे को सहयोग दें। हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं।

मैं भी अपनी पत्‍नी को इसी तरह प्रयास करने के लिए प्रोत्‍साहित करता हूँ। फिलहाल जो भी काम करती है, उसमे मेरी सलाह और मदद लेती है। जिस दिन वह आत्‍मनिर्भर होकर बिना मेरी मदद लिए कुछ काम करेगी, उस दिन मैं क्‍या महसूस करूँगा, यह अभी से बताना मुश्किल है।

Udan Tashtari said...

अरे वाह!!!

आभा भाभी को तो महिला दिवस की फिर से बधाई...और आपको??? हा हा!!

Gyandutt Pandey said...

आप कितने भाग्यवान हैं। मेरी पत्नीजी तो मुझसे बतौर टाइपिस्ट काम लेती रहती हैं।
और करना ही पड़ता है जी!

बोधिसत्व said...

धीरे-धीरे रे मना धीरे सब कछु होय
माली सींचै सौ घड़ा रितु आए फल होय।
भाभी जी को बैठा दीजिए की बोर्ड के आगे....बस वो कर लेंगी...मुझे पूरा यकीन है....

आशीष said...

इंकलाब जिंदाबाद

chandrapal said...

बोधि बाबु ,आपने वाकई मे क्या महिला दिवस मनाया है.बधाई , लेखक हमेशा तमाम प्रगति की बाते करने के बाद भी अपने घर मे वो बाते नही ला सकता जो वो हमेशा अपनी रचनाओ या मंच पर कहता रहता है.पर आपने जो किया है वो काफी नही है ,जोड़ तोड़ कर के एक पुरुस्कार भाभी जी को भी दिलादो. बाकि मे भी ब्लॉग लिखना सिख रहा हूँ .जल्द ही आप से मुखातिभ होता हूँ।
आपका
चंद्रपाल

विनय जायसवाल said...

galati ke liye mafi. edit karane ka samay nahin mila tha.

बोधिसत्व said...

चंद्रपाल जी मैं आपको जानता नहीं...और जिन्हें जानता नहीं उनके सुझाव मेरे लिए अकारथ हैं...आप का मंगल हो...

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

pta nhi sir g...aap mujhe jante hain ki nhi...aapka ek pathk bhr hoon....jra btaen jiski ptni nhi ho vh kise aajad krae...kiske bare me likhe vh apne blog pr...kise sikhae blog likhna....vaise bhabhee to ab aapke jod ki kvita bhi likhne lgi hain...sirf blog hi nhi...unhe badhaee...aapko nhi

vijay gaur said...

kavita ke sath sath ghar pariwar or apne jiwan se yon sakchhatkar karana achchha laga.

हिंदी-आलेख said...

बोधिसत्व जी
बहुत अच्छा -
गुडी-गुडी फील हुआ इसे पढ़ कर !

Dinesh Shrinet said...

सुंदर पोस्ट, उतनी ही सार्थक जितनी की कोई कविता. दांपत्य में निहित प्रेम की हल्की सी लाली छिपी है इस पोस्ट में. सारी कोशिश एक बेहतर संसार बनाने की है तो फिर उसे अपने आसपास भी तो शुरू किया जाए. आपके लिखे में निजी जिंदगी के प्रति एक किस्म का आशावाद है. बहुत से लेखक अपनी निजी जिंदगी से इस कदर असंतुष्ट रहते हैं कि उसका जिक्र बड़े ही कटखने अंदाज में करते हैं. आपकी पोस्ट से प्रेरणा पाकर शायद मैं भी कुछ लिखूं...

बोधिसत्व said...

दिनेश हम सब को अपने आस-पास के जीवन पर लिखना ही चाहिए....आप के लिखे का इंतजार रहेगा...