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Sunday, October 14, 2007

बनारस के गुंडा शायर तेग अली का बदमाश दर्पण




असल बनारसी शायर

हिंदी में आज कोई गुंडा कवि नहीं है। जिसे देखिए रिरियाता सा घूम रहा है। पर कभी बनारस में ऐसे शायर थे जो बाकायदा गुंडे थे। बनारस की मिट्टी का असल रंग अगर कहीं निखर कर आया है तो वह तेग अली के बदमाश दर्पण में। भारतेंदु मंडल के इस बेजोड़ गुंडा शायर के लेखन का केवल यही बदमाश दर्पण की एक मात्र उपलब्ध पोथी है।
हिंदी के युवा कवियों को मैं इस शायर से प्रेरणा लेने की अपील कर रहा हूँ।

तेग अली वाकई गुंडा थे। उनका पेशा ही गुंडई था। अगर आपको प्रसाद जी की कहानी गुंड़ा के नायक नन्हकू सिंह की याद हो तो आप आसानी से तेग अली को समझ सकेंगे। गुंडों की परम्परा में तेग अली आखिरी बाँके थे। यह परम्परा उन्नीसवीं सदी के अंत तक कायम रही। गुंडई के साधनों से बिछुआ और लाठी बरछे से लैस तेग अली जब कलम पकड़ते थे तो वहाँ भी करामात दिखाते थे। तभी तो उनका स्थान भारतेंदु मंडल में पक्का था।
तेग अली बनारस का जन्म बनारसमें ही हुआ था और वे शहर के उत्तरी भाग में मुहल्ला तेलियानाला मुत्तसिल भदाऊँ में रहते थे। वह मन मिजाज से पूरे बनारसी थे। उन्होंने बदमाश दर्पण को काशिका भाषा में रचा यानी बनारस की स्थानीय जबान में।
तेग अली तबीयत से शौकीन थे। तेल फुलेल और इत्र गजरा के साथ ही रसना रसायन के भी रसिक थे। आप उनके साहित्य में बनारस का असल माल पाएँगे। असल रूप रंग।

कुछ बदमाश दर्पण के बारे में

बाबू राम कृष्ण वर्मा ने 1895 में तेग अली की 23 गजलों का दीवान बदमाश-दर्पण नाम से प्रकाशित कराया था। बाद में लगभग 60 साल बाद खुदा की राह के संपादक पं. पुरुषोत्तम लाल दवे ऋषि ने कोई संस्करण छापा । फिर संवत् 2010 में बहती गंगा के रचनाकार रुद्र काशिकेय ने ज्ञानमंडल से बदमाश दर्पण को प्रकाशित कराया जो सालों से अनुपलब्ध है। खुशी की बात है कि बदमाश – दर्पण को बनारस के विश्वविद्यालय प्रकाशन ने फिर से 2002 में छाप दिया है। इसबार इसे संपादित किया है नारायण दास जी ने। कम लोगों को पता है कि नारायण दास जी जगन्नाथ दास रत्नाकर के पौत्र हैं और विद्या व्यसनी हैं।

आप के लिए उसी ऐतिहासिक ग्रंथ की छठवीं गजल हाजिर है। इसका भावानुवाद भी नारायण दास जी का ही किया है।

एक गजल


सुनत बाटी


केहू से बाट रजा तूं सटल सुनत बाटी।
ई काम करत नाही नीक हम कहत बाटी।।1।।

सहर में, बाग में, ऊसर में, बन में धरती पर।
तूँ देखले हौअ बवंडर मतिन् फिरत बाटी।।2।।

न कौनो काम करीला न नौकरी बा कहूँ।
बइठ के धूर क रसरी रजा बटत बाटी।।3।।

कहै लै फूल के गजरा त सब केहू हमके।
पै तोहरे आँखी में कांचा मतिन गड़त बाटी।।4।।

नाहीं मुए में लगउल रजी तूं कुछ धोखा।
पै आँख मून के देखीला तब जिअत बाटी।।5।.

न घर तू आव ल हमरे न त बोलाव ल।
ए राजा रामधै तोहसे बहुत छकत बाटी।।6।.

गजल का भाव

मेरे सुनने में आ रहा है कि आजकल तुम किसी और से जुड़े हो लेकिन मैं तुमसे कह देता हूँ कि तुम यह काम अच्छा नहीं कर रहे हो।।1।।

मैं तुम्हारे लिए नगर में, वन उपवन में उजाड़ खंड में, यानी पूरी पृथ्वी पर मैं बवंडर यानी चक्रवात की तरह घूम रहा हूँ, यह तो तुमने देख ही लिया है।।2।।

राजा न कहीं नौकरी करता हूँ, न मेरा कोई रोजगार धंधा है, बस बैठे-बैठे धूल की रस्सी बना कर जीवन यापन कर रहा हूँ।।3।।

सब लोग तो मुझे फूलों का हार कहते हैं लेकिन मैं तुम्हारी आँखों में काँटो की तरह गड़ता रहता हूँ।।4।।

मुझको मार डालने में राजा तुमने कोई कसर नहीं छोड़ी है मगर आँख मूँद कर तुम्हारी सूरत का तसव्वुर कर लेता हूँ, इसीलिए अब तक जिंदा हूँ।।5।।

राम कसम ए राजा मैं तुमसे बहुत परेशान हो गया हूँ, कि न तुम कभी मेरे घर आते हो न कभी मुझे अपने घर बुलाते हो।।6।।