Wednesday, June 18, 2008

कौन बनाता है छिनाल...

छिनाल के साथ कौन जन्मा उर्फ छिनरा

छिनाल के जन्म की चर्चा हुई । अजित भाई के शब्दों का सफर में । लेकिन वहाँ छिनाल के साथ जन्म लेने वाले छिनरा पुरुष की चर्चा रह गई । लावण्या जी ने छिनाल की तरह ही पुरुषों के लिए प्रयुक्त होनेवाले समानार्थी शब्द की चर्चा की थी। अवध में जहाँ मैं पैदा हुआ वहाँ जिस और जिन संदर्भों में छिनाल की चर्चा होती है उन्हीं संदर्भों में छिनरा व्यक्ति की भी चर्चा होती है। छिनाल के साथ जो छिनरई करते धरा जाता है सहज ही वह छिनरा होता है। वहाँ दोनों का कद बराबर है-

छिनरा छिनरी से मिले
हँस-हँस होय निहाल।

मेरा कहना है कि किसी भी समाज में अकेली स्त्री छिनाल नहीं हो सकती। उसे सती से छिनाल बनाने में पहले एक अधम पुरुष की उसके ठीक बाद एक अधम समाज की आवश्यकता होती है। छिनाल शब्द की उत्पत्ति पहले हुई या छिनरा की यह एक अलग विवाद का विषय हो सकता है । साथ ही समाज में पहले छिनरा पैदा हुआ या छिनाल। क्योंकि बिना छिनरा के छिनाल का जन्म हो ही नहीं सकता। एक पक्का छिनरा ही किसी को छिनार बना सकता है। तत्सम छिनाल का पुलिंग शब्द भले ही न मिले लेकिन तद्भव छिनरी का पुलिंग शब्द छिनरा जरूर मिलता है...।

छिनरा का शाब्दिक अर्थ है लंपट, चरित्रहीन और परस्त्रीगामी। वहीं छिनाल या छिनार का अर्थ है व्यभिचारिणी, कुलटा,पर पुरुषगामी। रोचक बात यह है कि लोक ने उस स्त्री में छिपे छिनाल को खोज लिया जिसके गालों में हँसने पर गड्ढे पड़ते हों-
हँसत गाल गड़हा परै, कस न छिनरी होय।
क्यों नहीं लोक ने छिनरे के लिए भी कोई पद रच दिया...।
अपने गाँव के चचेरे भाई मटरू की दूसरी शादी में सुनी एक गारी याद आ रही है, यह गारी बाद में मुझे भी संबोधित थी -
मटरू क बहिन बड़ी पक्की छिनार चल देखि आई।

संस्कृत का एक और शब्द है छिन्ना। इसके मायने भी छिनाल ही है। आचार्य राम शंकर शुक्ल रसाल इसका अर्थ व्यभिचारिणी स्त्री ही बताते हैं। उस शब्द के पक्ष में उन्होंने एक पद भी उद्धृत किया है-
छिन्ना शिवा पर्पट तोय पानात।

इसी छिनार और छिनरा से बना है छिनारा....यह व्यभिचार के बदले प्रयोग होनेवाला आम शब्द है। कर्म का पतन अगर और हुआ तो हो गया कुकुर छिनारा।
महाभारत में कुलटा के बराबर का जो शब्द बार-बार सुनाई पड़ता है वह है पुंश्चली। पुंश्चली का अर्थ होता है-त्रपारंडा और स्वैरिणी। कुलटा और व्यभिचारिणी तो होता ही है। वहाँ सूर्य पुत्र कर्ण द्रौपदी को कहता है पुंश्चली। वहाँ भी वह अकेले छिनरी नहीं है साथ में उसके पाँच पति भी तो फुंश्चला हैं...छिनरा हैं।
छिन्न से ही एक और शब्द की याद आती है। वह है उच्छिन्न। इस शब्द का प्रयोग अवध में लिर्मूल हो जाने या चलन खत्म हो जाने के खास संदर्भ में किया जाता है। पूर्णतया उन्मूलित या नष्ट।
नोट- निहाल वाला पद मेरा अपना लिखा है..

Tuesday, June 17, 2008

मैं काशीवाला नहीं हूँ

काशी के घाट बुलाते हैं...

काशी यानी बनारस से मेरा थोड़ा अजीब सा नाता है....
वैसे मैं पैदाइशी बनारसी यानी काशीवाला नहीं हूँ....लेकिन काशी जनपद का तो हूँ....जीवन में पहलीबार किसी शहर गया तो वह था बनारस......बनारस के घाट नदी का चौड़ा पाट...पतली गलियाँ....और उनमें सुहाग और पूजा के सामानों की दुकाने ....अपने लिए चूड़ियाँ और सिंदूर खरीदती सुहागिनें और उन्हें ताकती विधवाएँ....और बिसाती...नदी के तट से बँधी हिलती डोलती नावें....जैसे मोक्ष के लिए छटपटाता संन्यासी संसार के बंधन से छूट जाने को व्याकुल हो....।

यह सब मैं बालपन से देखता निरखता आया हूँ....लेकिन पिछले बीस सालों से काशी से दूर हूँ....फिर भी काशी की यही छवि मेरे मन में छपी है......
मैंने ठीक से तैरना काशी की गंगा में सीखा....मैंने जीवन के कई सारे विकट अनुभव बनारस की सीढ़ियों पर पाए....इसलिए काशी जाने और वहाँ सीढ़ियों पर बादलों की छाँव में बैठने और नदी के गंदले प्रवाह को देखने का मन करता है...और जैसे ही मौका मिलता है मैं काशी का रुख कर लेता हूँ....।

कहने को तो कहा जा सकता है कि काशी में क्या रखा है.....मैं कहूँगा कि यदि काशी में कुछ नहीं रखा है तो दुनिया में ही क्या रखा है....पतन किसका नहीं हुआ है....काशी का भी हुआ होगा....समय और बदलाव का दबाव काशी पर भी पड़ा है....लेकिन काशी का नशा मेरे मन से तनिक भी कम नहीं हुआ है.....।

मुझे सबसे अधिक आनन्द काशी की गंगा में नाव से भटकने में आता है....मैं काशी की गंगा का आनन्द लेने के लिए भादौं में जाना पसंद करता हूँ...तब गंगा में खूब पानी होता है....और भीड़ कम....नाव से भटकने के बाद बाद काशी के घाटों पर परिक्रमा करना अच्छा लगता है........वहाँ के घाटों में मणिकर्णिका घाट मुझे बहुत प्रिय है....वहीं पर मेरे बाबा की अंत्येष्ठि हुई....वहीं मेरी आजी भी जलाई गईं....इसलिए भी मैं वहाँ घंटों बैठा करता था....अब भी जब भी बनारस जाता हूँ और कही जाऊँ न जाऊँ...मणिकर्णिका घाट जरूर जाता हूँ....।

बचपन से ही बनारस के घाटों पर जाना और माथे पर चौड़ा तिलक लगाना और पूजा में चढ़ाई गई इलायची और नारियल मिला कर खाना एक नित्य क्रिया थी....घरवालों का दबाव न होता तो भाँग खाने की भी आदत पड़ी ही होती...यह सोचना बड़ा अच्छा लगता है कि अगर मैं भंगड़ होता तो कैसा होता मेरा जीवन.....आज भी पूजा का प्रसाद हो या वैसे ही इलायची और नारियल खाना अच्छा लगता है....यह बनारस को जीना है बनारस को अपने साथ रखना है....।

Friday, June 13, 2008

वैशाली जाने का मन है....


पहली बीड़ी की याद और यायावर मन

कितनी बार सोचा और तय किया कि बिहार और उत्तर प्रदेश के एक-एक गाँव और छोटे बाजारों और कस्बों तक जाऊँगा...लेकिन जाना नहीं हो पाया....कितनी-कितनी मुश्किल से बिहार में पटना, गया, हजारीबाग, मुजफ्फरपुर और एकाध शहरों के आगे नहीं जा पाया । उत्तर प्रदेश के 15 से 20 जिलों तक ही गया होऊँगा...जिनमें बलिया, गाजीपुर, देवरिया, आजमगढ़, मऊ, मीरजापुर, सोनभद्र, गोरखपुर, बस्ती, अकबरपुर, फैजाबाद, सुल्तानपुर, सिद्धार्थनगर, कौशांबी, इलाहाबाद, बाँदा, चित्रकूट, जौनपुर और प्रतापगढ़ शामिल है..। हो सकता है कि एकाध और जिलों में गया होऊँ...पर इससे क्या मैं कह सकता हूँ कि मैं हिंदी इलाके को जानता हूँ......।

मध्य प्रदेश राजस्थान के कई जिले तो मेरे लिए इतने अपरिचित हैं जैसे वे भारत में नहीं कहीं अफ्रीका या अरब में हो...हम लोग देश के राष्ट्रीय एकता की बात करते हैं...और करना भी चाहिए...लेकिन क्या यह नहीं होना चाहिए कि हमें अपने देश के सब नहीं तो कुछ इलाकों तक तो पहुँच ही लेना चाहिए....।

मेरा मन बार-बार वैशाली जाने को करता है...मैं....सच में वैशाली जाना चाहता हूँ....क्या वहाँ आम्रपाली के होने का कोई निशान मिलता है ... सुनता हूँ कि अभी वैशाली बिहार में नहीं है...अगर हो तो भी न हो तो भी वैशाली जाना है....वैसे मैं झूमरी तलैया भी जाना चाहता हूँ....कभी रेडियो पर रोज वहाँ से फरमाइशें होती थीं...वे गाने सुनने वाले अभी भी वहाँ होंगे क्या...

राजगीर भी जाना चाहता हूँ....देखना चाहता हूँ कि क्या वहाँ अभी भी पांडव पर्वत है जहाँ सिद्धार्थ और बिंबिसार की पहली मुलाकात हुई थी....जहाँ मगध नरेश ने सिद्धार्थ को अपना सेनापति बनने के प्रस्ताव रखा जिसे...सिद्धार्थ ने ठुकरा दिया था...क्या वह गड्ढा अभी भी वहाँ के राजपथ पर होंगे जिसे ह्वेन सांग ने अपने यात्रा विवरण में दर्ज किया था...

फुलवारी शरीफ यह नाम मुझे बहुत पुकारता है....पलामू....डाल्टनगंज....कभी जा पाऊँगा क्या....गोमो स्टेशन कितनी बार गुजरा ....पर एक बार चाय पीने भर का समय ही यहाँ बिता पाया हूँ...यही वह स्टेशन है जहाँ से नेता जी अंग्रेजों की पकड़ से निकल भागे थे...ऐसा याद आता है कि इसी स्टेशन से मैंने चंपा नाम की पहाड़ी को देखा था... कोहरे पेड़ों और भाफ से ढंकी पहाडी ....उसी पहाड़ी को देखते हुए मैंने पहली बार बीड़ी पी थी...और फूट-फूट कर रोया था...बीड़ी का नाम था हिंद सवार . सामने की सीट पर बैठे एक दढ़ियल से माँग कर पी थी ....और मेरी रुलाई पर वह बुड्ढा बहुत परेशान हो गया था....एक बार गोमो की तरफ वहाँ जहाँ ऐसे पहाड़ हैं..जाना चाहता हूँ...

अगले दो-तीन महीने में देशांतर की संभावना है.......लेकिन उसके पहले..एकबार न बिहार अपने बनारस तो जा ही सकता हूँ....जाऊँगा....

Thursday, May 29, 2008

बछड़े और बेटियों का वध कर देते हैं वे

देखने में यह बात अजीब है। लेकिन उन लोगों को बेटियों और बछड़ों की जरूरत नहीं है...। उनके लिए वह महिला कुलबोरन है कुलक्षिनी है जो बेटियाँ पैदा करती है...ऐसी बहुए अक्सर दुरदुराई जाती हैं लात खाती हैं....जो बेटियाँ पैदा करती हैं...वहीं वे बहुए लक्ष्मी हैं जिनकी कोख से लगातार बेटे जन्म लेते हैं...।
बेटियों के अस्वागत या दुत्कार का यह आलम है कि लोग आम बात-चीत में भी यह नहीं कहते की फलाँ को बच्ची होने वाली है...सभी यही कहते पाए जाते हैं कि उसे बच्चा होने वाला है।
आप वहाँ बेटी-बेटे के कोख में बनने और पैदा होने के वैज्ञानिक आधारों को समझने-समझाने की बात नहीं कर सकते....बेटा बेटी एक समान की बात....दीवारों पर अच्छी लगती है घर के आँगन में नहीं॥

अगर बेटी हो जाती है तो पहले उसको कम रख रखाव से मारने की कोशिश होती है, उसके बीमार पड़ने पर कहा जाता है कि ठीक हो जाएगी...बेटियाँ मरती नहीं हैं...। दुख की बात यह है कि ऐसी बातें औरतें भी आराम से करती पाई जाती है...। लेकिन जब बेटा बीमार होता है या जब बेटा मरता है तो लोग छाती पीट कर रोते हैं उसका पैदा होना और मरना दोनों हाहाकार लेकर आता है...वहीं जब बेटी मर रही होती है या मर जाती है तो लोग धीरे से बल्कि कहूँ तो चेहले पर एक मुस्क्यान लाकर केवल बताते हैं कि उसकी बेटी जो अभी हुई थी मर गई...फिर कोई कहेगा कि मरना ही था तो पहले मर जाती...। और बात आई-गई खतम सी हो जाती है...।

यह सारी स्थितियाँ मैं ने खुद देखी हैं...यह देश के अन्य हिस्सों का सच भी हो सकता है फिलहाल मैं भदोही, मीरजापुर और बनारस की बात कर रहा हूँ...यहाँ अगर गाय या भैंस को बेटी हो यानी बछिया और पड़ियाँ हो तो सब खुश होते हैं....लेकिन अगर बछड़ा या पड़वा हो जाए तो उसका दूध बंद...। उसके मुह पर एक खोल चढ़ा दिया जाता है...कोशिश की जाती है कि वह बछड़ा या पड़वाँ जल्द से जल्द मर जाए । जिससे उसके हिस्से का भूसा-चारा भी बचे । दैव- दुर्योग से अगर वह गाय-भैंस पुत्र अपने आप नहीं मरता तो जरा सी उम्र बढ़ते ही उसे काटने के लिए कसाई को बेच दिया जाता है...।
बेटी बोझ है क्योंकि उसे विदा करना है, उसकी पढ़ाई पर खर्च नहीं करना है क्योंकि उसे पढ़ाने का वैसा सीधा फायदा नहीं जैसा बेटे को पढ़ाने का है...

वहीं बछड़े को बदलते समय में ट्रैक्टरों ने फालतू बना दिया है....एक दो हल बैल की खेती हो बड़े किसान सब ट्रैक्टर पर निर्भर करने लगे हैं...इसलिए बछड़े और पड़वे की कोई आवश्यकता नहीं रही...
बछिया गाय होगी दूध देगी....बेटी दहेज लेगी दूर होगी...इस लिए बछिया चाहिए बेटी नहीं...
बेटा चाहिए बछड़ा नहीं...।
ऐसे माहौल में बेटियाँ रोज मर-मर कर बड़ी होती है...
हो सकता है पिछले महीने भर में स्थितियाँ बदली हों...क्योंकि सुना है दुनिया तेजी से बदल रही है पर लगभग यही हालत है...बेटी को मारो या मरने दो....बछड़े को मरने दो या मारो...। बेटा जिलाओ....बछिया जिलाओ....।

Saturday, May 24, 2008

प्रमोद और प्रत्यक्षा उर्फ साधु वचन का मर्म

वो एक बात बहुत नागवार गुजरी है.....जिसका फसाने में कोई जिक्र नहीं था....मेरी कुछ बातों के जरिए प्रमोद जी और प्रतयक्षा जी को अपनी हीनता उजागर करने का मौका मिला है और दोनो बुद्धिजीवी मित्र निकाल भी रहे है....साहित्यकारों की ब्लॉग में दुर्दशा पर उठाये गए मेरे सवाल इन दो साहित्यकारों को रास नहीं आए और बात मेरे चरित्रांकन पर आ गई........प्रमोद जी और प्रत्यक्षा जी ने मिल कर उखाड़-पछाड़ शुरू कर दी मैं भी ....उन दोनों ब्लॉगर लेखकों की तमाम जुगलबंदी पढ़ने पर बहुत सारी बातें मुझे निकलती दिख रही हैं.....जैसे-

1-मुँहफट होने और खरी-खरी कहने का पैदाइशी हक सिर्फ प्रमोद जी को है, अगर और कोई ऐसा करता है तो गलत करता है ......प्रमोद जी की मुँह फटई उनका गुन है...उनकी खरी, खरी है...बाकी की खरी, में खोट है....
2-मैंने किसी प्रत्यक्षा को कभी फोन नहीं किया है और अगर मेरे फोन से उन्हें फोन गया होगा तो उस संदर्भ को वे मुझसे बेहतर समझ सकती हैं....
3-मैंने किसी सलेक्ट सर्किल में कभी प्रत्यक्षा का नाम लिया हो ऐसा मुझे याद नहीं...यह उनका भ्रम है कि लोग उनके बारे में बात करके दिन बिताते हैं...
4- हो सकता है जब प्रत्यक्षा ब्लॉगगिंग का बी कर रहीं थी मैं गाँव में बथुआ बो रहा होऊँ....तो क्या मुझे अभी ब्लॉगर बनने का हक या कुछ कहने का अधिकार नहीं रह जाता.....क्या ब्लॉग वेद हैं....जिस पर केवल प्रत्यक्षा का ही हक है....किसी बोधिसत्व का नहीं...
5-लोगों को फोन करने और बात करने का हक भी सिर्फ प्रमोद और प्रत्यक्षा को है....बाकी कोई करे तो गलत है...हालाकि मैंने किसी को फोन नहीं किया है....साहित्यकारों की दुर्दशा वाली पोस्ट को छोड़ कर

6-किसी बूढ़े प्रकाशक को खुश करने की बात मैंने सामान्य संदर्भ में कही थी...जिस पर बिदक कर ये दोनों साहित्यकर्मी अपनी दाढ़ी के तिनके नोच रहे हैं...और उस नोच-खसोट का प्रदर्शन कर रहे हैं....
7-मैं परिपक्व इंसान नहीं हूँ.... यह तो मैं भी जानता हूँ... .कोई नहीं होता ...बस दो ही लोग परिपक्व है.... प्रत्यक्षा जी और प्रमोद जी...आप दोनों परिपक्व होने की बधाई स्वीकार करें....
8-मित्रता वही है जो प्रमोद और प्रत्यक्षा की है...बाकी दुनियादारी है....स्वार्थ का गठबंधन है...अगर अभय तिवारी मेरे बारे में कुछ लिखते हैं या मुझे खलनायक नहीं मानते तो यह भी उनका अपराध है..
9-कोई यदि बोधिसत्व का समर्थन करेगा तो वह अकेला पड़ जाएगा.....यह धमकी देकर प्रत्यक्षा जी क्या कहना चाहती है.....क्या किसी ब्लॉगर को अकेला करने की सोचना कुंठित और तानाशाही चरित्र की निशानी नहीं है....
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10-किसी की बात को छिछला कहने का डीग्रेड आदि शब्दों से नवाजने का हक सिर्फ प्रत्यक्षा को है.....क्योंकि वे ही ऐसा कर सकती है....
10- मेरी पत्नी आभा की किताब अगर किसी को साध के छपानी होती जैसा की आप संकेत कर रही है....तो भी अभी नहीं छपती क्यों कि उसे ढ़लती उमर ( यह शब्द मेरे नहीं आदरणीय प्रमोद जी के हैं) का अपराधबोध नही है...जैसा कि प्रमोद जी के मुताबिक आपको है...
11- अगर आभा लेखन में दम नहीं होगा और छपास बलवती होगी तो हो सकता है कि आभा को भी किसी को साधना ही पड़े...
...
12-लीद, लड़ियाना, लथर-पथर...होना सब प्रमोद जी की बपौती है....वह उन्हीं के पास रहे....
14- प्रत्यक्षा काम-काजी महिला हैं.....लोगों को हैंडिल करना जानती हैं.... खास कर कर्मचारी या मजदूर वर्ग को....मैं उनसे आग्रह करूँगा कि किसी को बदले की भावना और संदेह के आधार पर हैंडिल न करें......
15- प्रमोद जी से उम्मीद करूँगा कि उनके मन में मेरे प्रति जो भी घृणा या हिकारत होगी मेरी इस पोस्ट पर ही निकाल लेंगे.....क्योंकि मैं हो सकता हैं आगे खुद पर थूकने का कोई भी मौका उन्हें न दूँगा..
16- मेरी पत्नी को निशाना बनाने के बाद अब मेरे परिवार में केवल भानी और मानस यानी मेरी बेटी और बेटा ही खल पात्र बनने से रह गए हैं....प्रत्यक्षा और प्रमोद जी मौका मत चूकिए । प्रमोद जी आप तो परसों-चौथा दिन मुझे देखने और बच्चों से मिलने घर भी आए थे....कोई न कोई धारणा तो बनाई होगी....उनके बारे में भी उसे भी लिख दीजिए...दबाकर दस बरस बाद निकालने से बेहतर होगा कि आज और अभी निकालें...हम सपरिवार आपकी राय का स्वागत करेंगे......

Friday, May 23, 2008

चपे रहो प्रहरी प्रमोद जी


मैं लिखना नहीं चाहता था लेकिन लिख रहा हूँ

अजदकेश प्रमोद जी करुणा के अवतार हो गए है....अवधर दानी हो गए हैं.....मुंबई में रहते हैं सिनेमा टीवी के लिए लिखते भी हैं.....और न लिख पाने पर छटपटाते भी हैं....खुद दुखी रहते हैं...लेकिन इस महाद्वीप में किसी का दुख उनसे न सहा जाता है न देखा....और जब दूसरों को दुख से उबार रहे होते हैं तो सामने वाले को बिना दुख में डुबाए उनको सुख नहीं मिलता....। शिव तो सर्व कल्याणक थे..लेकिन प्रमोद जी केवल दुख दाता हैं......मोटे शब्दों में वे प्रतिशोधी सखा है....।

मेरी एक - दो पोस्ट से ही नहीं उन्हें मेरे समूचे लेखन और खुद मुझसे अपार तकलीफ है.....और तकलीफों के कम से कम तीन अनुभव तो उन्होंने सहेज कर रखे ही हैं.....अपने अजदकी चरित के मुताबिक वो पूरी तरह से अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष साबित करने में लग गए हैं.....सामान्य रूप से कही गई मेरी बातों को वे पता नहीं किस-किस से जोड़ कर देख रहे हैं....।

हिंदी प्रदेश की यही दिक्कत है आप एक काम की या कैसी भी बात करते हैं.....तो सामनेवाला उस पर लड़ियाने याने नंगे होकर कूदने लगता है॥ लड़ियाने में और नंगई में प्रमोद जी सबके सरदार हैं....और कम से कम मुझे उनसे अच्छाई का कोई प्रमाण पत्र नहीं चाहिए.....और नहीं मैं उनसे नंगई का कोई गुर सीखना चाहूँगा।

रही बात प्रमोद जी के सवालों पर चुप रहने की तो यही कहा जा सकता है कि फालतू टाइप के आमोदी-प्रमोदी यानी बचकाने सवालों के उत्तर देने की फुर्सत में मैं नहीं हूँ....और हर महान प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है....... और जब महा महान प्रश्न सामने होते हैं....तो हींहीं करने या दाँत चियारने के अलावा कुछ करने का मन नहीं करता.....लेकिन अगर प्रमोद जी इतने उत्तराकांक्षी हैं तो मैं सार्वजनिक रूप से उनके सभी प्रश्नों का उत्तर देने को तैयार हूँ....वो करें सवाल.....।

जवानी में आदमी सामना करता है....ढलती उमर में चुगलखोर हो जाता है....वह लगाने बुझाने लगता है....बुढ़ापे में आदमी पर दुख कातर हो जाता है....किसी के लिए भी रोने लगता है....मैं यह नहीं कहूँगा कि प्रमोद भाई ढल गए हैं या बुढ़ा गए हैं....पर लक्षण सही नहीं हैं....उन्हें. अपना धीरज नहीं खोना चाहिए.....प्रहरी प्रमोद की भूमिका की उमर नहीं रही.....उनकी.....अब....। अंग रक्षक बनने का खेल हम लोग तो पढ़ाई के दिनों में खेलते थे...पर प्रमोद जी अभी भी मौका तलाश ही लेते हैं....इलाहाबादी लत जो लगी है...।
मैं उम्मीद रखूँगा कि इस पोस्ट के बाद भी प्रमोद जी लड़ियाते हुए.....बिना किसी राग-विराग के ढलती संझा में अर्थ का अनर्थ करने और औरों के घाव सहलाने या दुख को कम करने का व्रत छोड़ नहीं देंगे.....चपें रहेंगे.......।

Thursday, May 22, 2008

पर उपदेस कुसल बहुतेरे........

कहाँ जा रहे हैं साहित्यकार और ब्लॉगर

मेरा दिल बहुत साफ है.....इतना साफ है कि आर पार दिखता है....पर दर्पण बनने के लिए आर-पार देखना बंद करना पड़ता है तो क्या करूँ....बंद करूँ या संन्यासी सा बना रहूँ.....कम से कम अभी इस वक्त मेरे मन में कोई कामना या महत्वाकांक्षा या लालसा नहीं है.....मुझे पाठक नहीं चाहिए...मुझे लोकप्रियता नहीं चाहिए, मुझे शास्त्रीयता से बेहद प्यार है.....जहाँ-जहाँ शास्त्र या शास्त्रीयता देखता हूँ.....बलखाने लगता हूँ.....लांगूल हिलाने लगता हूँ.....वहीं... लोकप्रियता के प्रत्यक्ष होते ही इतना डर जाता हूँ कि आँखे बंद कर शास्त्रीयता-शास्त्रीयता का जाप करने लगता हूँ....

क्यों न करूँ....बंद आँखे.....जब शास्त्रीयता का लोकप्रियता से इतना बड़ा बैर साबित कर दिया गया है....तब तो सावधान होकर ही जीना पड़ेगा......क्योंकि हमें तो कहीं जाना है....जहाँ सिर्फ शास्त्रीय हो कर ही मैं जा सकूँगा.....लोकप्रिय हो कर नहीं.....मैं वह परम् पद इस ससुरी लोक प्रियता के झाँसे में कैसे कुर्बान कर दूँ.....लोकप्रियता का भी कोई चरित्र होता है.....

लोकप्रियता तो एक दिन की लाली है....शास्त्रीयता तो सार्वकालिक है...कुछ नए साहित्यिक साधु और साध्वियों से सुनते हैं जो मजा शास्त्रीयता का है वह लोकप्रियता में कहाँ है......हाँ गाहे बगाहे दोनों का मजा लेने में गुरेज नहीं....बस सावधानी जरूरी है...

अब गार्गी, व्यास, बाल्मीकि, कालीदास, तुलसी, सूर, मीरा, कबीर, मीर,गालिब, भारतेंदु, इकबाल, प्रसाद, पंत, महादेवी, निराला, परसाई, श्रीलाल शुक्ल क्या खाक शास्त्रीयता के पद का मजा पा सकेंगे....भूल से लोक प्रिय जो हो लिए....कितना पछता रहे होंगे सब अनाड़ी, छाती पीट रहे होंगे कि काश पहले पता चल गया होता तो लोकप्रिय होने की चिरकुटई से बच लिए होते.....इतना ओछा काम क्यों करें जिससे जीवन भर की कमाई खाक हो जाए....धिक्कार है लोकप्रियता धिक्कार है....सब वहीं से लौट आते जहाँ से लोक प्रियता की गंदी गली शुरू होती है....गली के कोने पर भले ही मजार बन जाता या समाधि पर उस गली में दाखिल न होते....पर क्या करें.....अब पछताने से क्या होता है.....हाथ मचते हैं और रोते हैं....इश्क पर समझाते थे साले सब लोकप्रियता....पर चुप रह जाते थे...

आज के सच्चे उपदेशक तब कहाँ थे....गलती हो गई....तो हो गई...।
पाठकों की चिट्ठियों का न सही तो साधुओं के सिर हिलने का इंतजार किया.....इसका ध्यान रखा कि जो कह रहा हूँ वह सब समझ तो रहे हैं न.....यहीं तो महान अपराध हुआ...... जिस पाठक की बुद्धि संकुचित है उसकी परवाह करोगे तो क्या रचोगे.....

इसलिए हे ब्लॉगरों अगर साहित्यकारों वाले महान स्थान पर या उसके आगे का मुकाम, ऊँचाई, मंजिल, पाना चाहते हो वहाँ अपना झंडा गाड़ना या फहरना चाहते हो तो पाठकों की प्रतिक्रिया, उनकी राय पर लात मारो और अपने मन की लीद बिखेरो.....वह कागज के पन्नों ब्लॉग पर छपते ही प्रसाद हो जाएगी....तो लीद करो और मस्त रहो....जैसे साहित्य की दुनिया में आज कवि-कथाकार मस्त है.....
बस एक काम करो....कुछ कविता कथा नुमा लिखो....किसी प्रकाशक को साधो और उनके एकाध बूढ़े मालिकान को बाकी तो सध ही जाएगा....
भाइयों मैं भी वहीं जाना चाहता था जहाँ सब साहित्यकार ब्लॉगर जा रहे थे...पर साहित्यकार भी कहाँ पहुचे हैं समझ नहीं पा रहा हूँ......उसके आगे कहाँ जाऊँ....कोई है जो राह दिखाए.....कहाँ जाऊँ....क्या करूँ....कोई साधू-साध्वी हो तो बताए.....कहाँ पहुँचे हैं....ब्लॉगर या जो साहित्यकार ब्लॉग कर रहे हैं वो जहाँ पहुँच गये हैं......और वह पवित्र स्थान कहाँ हैं जहाँ हम सब जाना चाहते हैं और उसके आगे भी