Tuesday, June 16, 2009

करे कोई भरूँ मैं...ऐसा क्यों है

कल क्या होगा

पिछले तीन महीने से फोन पर मुझे सृजित कह कर गालियाँ दी जा रही हैं। बैंक का कोई रिकवरी एजेंट मेरे घर के नंबर पर फोन करता है और मुझसे कहता है कि मैं सृजित हूँ और मुझ पर उसके बैंक का बकाया है। वह रिकवरी एजेंट मुझसे कहता है कि मैं बैंक के क्रेडिट कॉर्ड से पैसा खाकर गुल हो गया हूँ। और, जब भी मैंने उसे यह समझाने की कोशिश की कि सृजित नहीं हूँ तो उसने मुझे चुन-चुन के गालियाँ दीं। साथ ही उसने यह भी धमकी दी कि मुझे उठा लेगा, देख लेगा, समझा देगा, ठीक कर देगा, सुधार देगा।

उसकी सुंदर, सलोनी और सुघड़ गालियों से मेरा बेटा मानस और मेरी पत्नी आभा भी न बच पाए। जिसने फोन उठाया उसने गाली खाया। अच्छा हुआ कि भानी ने फोन नहीं रिसीव किया।

कल जब उसने रात सवा नौ बजे फोन किया तो मैंने उससे कहा कि भाई आप मेरे घर आ जाओ और मुझसे मिल लो, मुझे देख लो। मैं सृजित नहीं हिंदी का लेखक कवि हूँ मेरा नाम बोधिसत्व है । आओ मेरी पहचान कर जाओ। तो उसने कहा कि हर आदमी यही कहता है। मैंने उसे कहा कि मेरा पैन कार्ड देख लो, ड्राइविंग लाइसेंस देख लो, जो चाहो देख लो और पीछा छोड़ो।

उसने जितनी बार बात की उतने नाम बताए। परसों बोला कि वह हेमलता है। एक दिन कहा कि वह परवेज बोल रहा है और कल बोला कि भाइंदर से जावेद शेख बोल रहा है। आज मैंने कहा कि अपना नंबर दो तो उसने नंबर दिया ९००४०७७१४१। इसके पहले उसने जिन नंबरों से फोन किया वे हैं- ४२१५१९२३, ४२१५१९२५, ४२१५१९२६, 40317600।

मित्रों फिलहाल मामला यह है कि वह कल सुबह 10 बजे मेरे घर आ रहा है। मुझसे सृजित का बकाया वसूलने। बच्चे सुबह स्कूल में होंगे और मैं उठ कर उसका इंतजार करूँगा। जीवन में इस तरह का यह पहला अनुभव है। यदि सच कहूँ तो मुझ पर वैसे भी किसी का कोई बकाया नहीं है न बैंक का न व्यक्ति का।

उलझन केवल एक है कल उसने या उसके लोगों ने कोई बेहूदगी की तो क्या करूँगा। पुलिस में एक सूचना दे रखी है। चारकोप के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जब वे आएँ तो मैं 100 नंबर पर डायल करूँ। अभी मैं और मेरी पत्नी कल की स्थितियों में अपनी-अपनी भूमिका तय कर रहे हैं। आभा का कहना है कि क्यों नाम पता बताया, क्यों घर बुलाया, वे खोजते सृजित को और पाते उसका पता। मेरा कहना था कि अगर वह मेरे नंबर पर फोन कर रहा है और गालियाँ बक रहा है तो इस बात को कब तक टाला जा सकता है। उससे बिना मिले क्या उपाय है। हम दोनों थोड़ा उलझन में हैं कि कल वे सब न जाने क्या करेंगे। क्या कल मैं खुद को बोधिसत्व या अखिलेश साबित कर पाऊँगा या वे मुझे सृजित कह कर पीट जाएँगे। रिकवरी एजेंट्स की करतूतों पर खबर बनाना या लिखना एक बात है उनके चंगुल में आना एकदम अलग। देखते हैं कल क्या होता है।

Saturday, May 30, 2009

दीना की याद

लगता नहीं कि दीना नहीं है

हम और दीना नाथ ज्ञानपुर में एक साथ पढ़ते थे। जब हम मिडिल स्कूल बनकट में पढ़ते थे तब दीना नाथ दुबे और दीना नाथ पाल ये दो दीना हमारे अच्छे मित्रों में से थे। आज मैं दीना नाथ पाल को याद कर रहा हूँ। मेरे सहपाठियों में दीना पाल सब से सुलझे और सामाजिक थे। यदि किसी मित्र को बुखार हो तो उसे अपनी सायकिल पर बिठा कर उसके घर छोड़ना और कई दिनों तक उसे स्कूल ले जाना दीना नाथ का कर्तव्य बन जाता था। पढ़ने में तमाम विद्यार्थियों से बेहतर होने पर भी दीना नाथ बहुत आगे तक नहीं पढ़ पाए। किसी-किसी तरह बारहवीं की परीक्षा देकर दीना नाथ मुंबई चले आए। यह बात 1986 की है।

दिना नाथ से बिछड़ना मेरे लिए एक असह्य घटना थी। मैं ज्ञानपुर से इलाहाबाद पढ़ने आ गया। लेकिन हम दोनों चिट्ठियों के जरिए लगातार सम्पर्क में बने रहे। मुंबई आ कर दीना नाथ ने कुछ टेक्निकल कोर्स करके टीवी रिपेयरिंग का काम सीखा और और दहीसर इलाके में अपनी एक रिपेयरिंग की दुकान भी खोल ली। लेकिन दीना नाथ अपने पूरे जीवन से कभी सुखी न रहे। वे पढ़ना चाहते थे। किंतु घरेलू आधार ऐसा था नहीं कि दीना नाथ लग कर कुछ कर सकें। कई चिट्ठियाँ ऐसी रहीं जिनमें दीना नाथ ने जीवन का रण हार जाने जैसा बयान दिया था। मैं पढ़ाई में जैसा भी था दीना नाथ के पसंग बराबर भी नहीं था। भौतिक शास्त्र से लेकर रसायन तक सब में दीना नाथ मेरे तारण हार थे। हमारा गाँव करीब तीन-चार कीलोमीटर के फासले पर था फिर भी दीना नाथ मेरे घर आ कर मुझे पढ़ा जाते। एक पिछड़ी जाति का लड़का मुझ अगड़े के बेटे को पढ़ने आता है यह बात मेरी ताई जी को बहुत दुख देती थी। वे ताना मारते हुए कहतीं कि अब इहै तोहे पढ़ाई। फिर भी मैं पढ़ता रहा क्योंकि मैं सचमुच में दीना नाथ को अपना सखा मानता था। मुझे इसमे कोई उलझन भी नहीं थी।

हम लोग गाँव से कॉलेज तक के लगभग 15 कीलोमीटर रास्ते में फिल्मों का कथानक सुनते सुनाते आते जाते थे। संवाद और गानों के साथ कोई एक मित्र पूरी फिल्म सुनाता था। यह एक अदभुत यात्रा होती थी। शुरू से दि इंड तक किसी भी हिट फ्लाप कैसी भी फिल्म का सिनारियो पूरा का पूरा। इंटरवल पर हम कहीं चाय पीते। दीना नाथ राखी के भक्त थे और अक्सर उनकी फिल्मों की कहानी सुनाते थे।

हमारे मेल जोल का बहुत स्वागत न था। एक बार तो हद ही हो गई। बात 1995 की होगी। गर्मियों में दीना नाथ मुंबई से गाँव आए। हमारी पहले ही चिट्ठी के जरिए बात हो गई थी। दीना नाथ ने बहुत बड़ा पक्का घर बनवाया था। उसका गृह प्रवेश था। मुझे खुशी थी कि दीना नाथ का खपरैल पक्का हो गया। मैं भी उनके समारोह में पहुँचा। लेकिन पिता जी ने न्योता खाने न जाने दिया। दीना नाथ को यह बात थोड़ी अखर गई। अगले दिन मैं किसी बहाने घूमते घामते दीना के घर पहुँचा। पता चला कि रसोईं तैयार है। लोग खाना खाने जा रहे हैं। संकोच के साथ दीना के पिता ने मुझे भी खाने को कहा। हालाकि उनकी माँ ने रोकना चाहा। कच्ची रसोईं ( अभी भी गाँवों में तली हुई पूड़ियाँ यानी पक्की रसोई तो एक पिछड़े के घर में खाई जा सकती है, लेकिन चावल दाल रोटी जिसे कच्ची रसोईं कहते हैं खाने की परम्परा नहीं है) में किसी ब्राह्मण के बटे को कैसा जिमा सकता है एक गड़ेरिया। लेकिन मैं खाने के लिए बैठ गया। इसी बीच में न जाने कहाँ से मेरे पिता जी आ गए। शायद उन्हें मेरे दीना नाथ के घर जाने की भनक लग गई थी। पिता जी को मित्रता में नहीं भोज भात में आपत्ति थी। और वे बदलने को कतई तैयार न थे। मैं पीढ़े पर बैठा था वे सामने खड़े थे, मेरे हाथ में भात का कौर। मुझे लगा कि पिता जी कुछ बावेला करेंगे। लेकिन उन्होंने सिर्फ और सिर्फ मुझे गरदन के पीछे से कालर पकड़ कर उठाया और जूठे मुह जूठे हाथ घर तक ले आए। मैं विरेध कर सकता था लेकिन मामला हिंसक हो सकता था इसलिए चुपचाप चला आया। उसी रात पिता जी ने मुझे इलाहाबाद के लिए विदा करवा दिया।

इसके बावडूद हम और दीना नाथ सम्पर्क में रहे। लेकिन यह थाली छोड़ कर उठने की घटना मुझे पराजित कर गई थी। पिता जी कि वह हुंकार हमेशा उनके प्रति एक असम्मान का भाव जगाती रहती रहती थी। लेकिन कुछ भी बोलना न हो पाया।
फिर 2002 में मैं मुंबई आ गया हमारी मुलाकाते रहीं। मैंने दीना नाथ के घर जाकर कच्ची रसोईं खाई। दीना नाथ हंसते रहे। उन्हें लगा कि मैं उनका वही पुराना मिड़िल से लेकर इंटर तक वाला मित्र हूँ।

2007 के मार्च महीने में मुंबई के लोअर परेल में रेल ट्रैक पार करते हुए दीना नाथ दुर्घटना का शिकार हो गए। हमने अपने दीना को खो दिया। उसे कहीं जाने की बहुत जल्दी थी। वह सदा के लिए चला गया। हमारी जितनी अच्छी समझदारी भरी दोस्ती दीना नाथ से थी उतनी बहुत कम मित्रों से हो पाई है। हम दोनों को हमारी मैत्री पर अभिमान था। तमाम सामाजिक भेदभाव के बादजूद हम मित्र रहे।

इसमें एक अजीब बात है, दीना को खोकर भी लगता नहीं कि वह नहीं है। उसका मुस्कराता चेहरा सदा सामने रहता है। एक और बात सिनेमा की तरफ मुझे मोड़ने में दीना नाथ का बहुत गहरा योग है। टीवी सीरियल रजनी के दौर में दीना नाथ के चचेरे भाई रजनी यानी प्रिया तेंदुलकर के ड्राइवर होते थे। उनके द्वारा सुने सिनेमा के आंतरिक किस्सों ने मुझे मुझे मुंबई आने का सपना दिया। ये बाते यहाँ नहीं लिख सकता, क्योंकि यह सारा वाकया अपनी चवन्नी के लिए लिखा है तो जल्द ही वहाँ पढ़ें।

Wednesday, April 22, 2009

नाम के लिए हत्या

अब तो नाम लोगे आलोचक


सिर्फ हिंदी के लिए देह धारण करनेवाले आज कितने होंगे। जी हाँ, मात्र हिंदी को समर्पित एक कवि महान कवि, कहानीकार, समीक्षक, संपादक, प्रवक्ता त्तर प्रदेश में हैं किंतु बेहद दुखी और परेशान हैं। अपनी उपेक्षा से तंग आकर उन्होंने अपना नाम बदलने का मन बना लिया है। उनका कहना है कि ऐसा नाम रखेंगे कि लोग देखते रह जाएँगे। और नाम बदलते ही उनका काम हो जाएगा। उनके नाम का महिमा मंडन किए बिना या उनका नाम लिए बिना कोई आलोचक अपना लेख वह किसी भी विधा का हो पूरा नहीं कर पाएगा। अभी यह तय नहीं हुआ है कि नाम क्या रखें। किंतु सूची बन गई है।

हो सके तो आप उनकी मदद कर दें। नाम बस ऐसा हो कि आलोचक, समीक्षक बिना उनको याद किए रह न पाएँ। हिंदी की सेवा का कुछ तो मेवा मिले।

नाम इस प्रकार हैं- और तिरछे अक्षरों में हैं।

आदि, इत्यादि, तथा, जैसे, अन्य, और, गण, असंख्य, अथवा, तमाम, कवि, लेखक, चिंतक, विचारक, नाटक, एकांकी, संपादक, प्रवक्ता, हिंदी, भाँति, तरह, प्रकार, समान, व, सरीखे, कोटि।

कौन सा नाम बेहतर तरीके से उनकी मदद कर पाएगा इसका ध्यान रखिएगा। वे हिंदी में आए क्यों हैं। नाम कमाने ही तो। और ये आलोचक नाम ही नहीं लेते। तो नाम बदलने का काम एक दो दिन में ही सम्पन्न हो जाए तो अच्छा रहेगा। नहीं तो हिंदी के दो चार कवि आलोचक, समीक्षकों की बलि चढ़ा देंगे अपने हिंदी के ये उपेक्षित समर्पित कवि। यह ठीक न होगा। केवल नाम के लिए हत्या करनी पड़े। मैंने सोचा है कि यदि वे इत्यादि जी, आदि जी, कोटि जी जैसा नाम रख लें तो कैसा रहेगा।

Tuesday, April 14, 2009

चिद्-विलास : पिता के साथ पुरखों का इतिहास



अपने पूर्वजों पर लोग क्यों नहीं लिखते

लेखक लोग अक्सर अपने घर परिवार कुल वंश के बारे में आधी-अधूरी बातें करके छुट्टी पा लेतें हैं। कोशिश करते हैं कि अपनों के बारे में जितनी कम बातें करके काम चल जाए उतना ही कुशल है। क्योंकि घर परिवार पर लिखना फायदे का लेखन नहीं माना जाता। अपने पिता और लाचार माँ पर, अपने पूर्वजों पर लोग नहीं लिखते जबकि किसी पहुँचे हुए आलोचक और सफल सामाजिक की जीवन गाथा ग्रंथित करने के लिए हर कोई कलम उठाए रहता है। बल्कि कहूँ तो कलम तोड़ स्तुति करने को तैयार रहता है।

वैसे भी भला बहुत कम कामयाब व्यक्ति का कोई इतिहास होता है, जीवन वृत्त होता है। लेकिन एक पिता वह असफल रहा हो सफल उसका इतिहास भी होता है और जीवन वृत्त भी। तभी तो डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल ने अपने पिता के जीवनी लिखी है साथ ही अपने कुल कुटुंब और गोत्र का इतिहास भी दर्ज किया है। उन्होंने उस ग्रंथ को नाम दिया है चिद्व विलास।

वैसे डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्येता होने का साथ ही पट्टी प्रतापगढ़ में एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के प्राचार्य हैं। उनका पौराणिक भारत पर गहन अध्ययन है। कूर्म पुराण के सांस्कृतिक अध्ययन, प्राक् एवं प्रागितिहासिक भारतीय पुरातत्व जैसे कई प्रकाशित हैं। इतिहास की कई और पुस्तकों के साथ ही विवादास्पद सेतुबंध रामेश्वरम् पर एक ग्रंथ प्रकाशनाधीन है। यह ग्रंथ सेतुबंध के तमाम पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डालेगा।


जैसा कि मैंने अभी कहा कि चिद् विलास एक कुटुंब के बनने और समाज में अपनी जगह बनाने की बड़ी रोचक गाथा के रूप में सामने आता है। कैसे एक गर्ग गोत्र में लखनौरा शुक्लों की एक शाखा अलग से बनती है। कैसे एक वंश अपने पिछले इतिहास को भूलते याद करते स्थानांतरित होते हुए भी अपने अतीत से जुड़ा भी रहता है। कैसे एक पिता अप्रत्यक्ष रूप से अपने पुत्र को साथ ही अगली कई पीढ़ियों को दिशा देता है। पुस्तक में डॉ.शुक्ल की लेखकीय शक्ति बार-बार चमत्कृत करती है। खासकर उन स्थलों पर जब वे पिता को खो देते हैं। वे प्रसंग सचमुच मर्माहत करने वाले हैं। कुछ अंश आप भी पढ़े-
एक-
उनकी( पिता की) शवयात्रा की तैयारी पूरी कर ली गई। हमलोगों ने उन्हें कंधा दिया। और रसूलाबाद श्मशान घाट ले जाया गया। पिता का वह चेहरा जिसे मैंने जिंदगी में सैकड़ों बार छुआ और अनुभव किया था, राख में परिवर्तित हो रहा था। सांसों को खींचे मैं पीछे हट आया।

दो-
सारी उम्र वे हम भाइयों व बहनों को ऊँचा उठाने, में जीवन में गुणवत्ता भरने और समाज के सभ्यनागरिक बनाने में जुटे रहे। आज हम सब खुले में आश्रय रहित अनुभव कर रह थे। छत्रछाया हट चुकी थी। उन्होंने ढाल की भाँति हमें सुरक्षा दी थी।

तीन-
पिता जी को बरामदे में जमीन पर लिटाया गया था। उनका चेहरा मात्र खुला था। जिसमें किसी फ्रकार की आभाहीनता परिलक्षित नहीं हो रही थी। लगता था कि यौगिक साधना में शरीर को शिथिल किए हुए हैं।

पूरे ग्रंथ को पढ़ने के बाद इसे फिर से पढ़ने को मन करता है। समाजेतिहास के साथ ही एक अलग तरह की औपन्यासिकता चिद् विलास को अलग मुकाम देती है। आजकल के बोझिल लेखन तुलना में शुक्ल जी का लेखन काफी रोचक और पठनीय है, तमाम सामाजिक संदर्भ अपने आप जुड़ते जाते हैं। यदि आप सब इस ग्रंथ को पढ़ना चाहें तो। पारिजात प्रकाशन, 247 सी/5, ओम गायत्री नगर इलाहाबाद से इसे प्राप्त कर सकते हैं। विनय पत्रिका के मार्फत सम्पर्क करनेवालों के 40 प्रतिशत की विशेष रियायत दी जाएगी।

· ग्रंथ के अन्यान्य प्रकरणों पर और लिखना चाहता था लेकिन अभी इतना ही।

Saturday, April 11, 2009

फिल्म सरपत का असर और दाम्पत्य




साथ-साथ हैं

तीन चार दिन हुए, मित्र अभय की फिल्म सरपत देखी। फिल्म का ऐसा प्रभाव रहा कि घर आकर एक कविता लिखी। मैंने ऐसी बहुत कम कविताएं लिखी हैं जो कि किसी रचना से प्रभावित हो या प्रेरित हो। लेकिन सरपत ने तो मन को चीर दिया। फिल्म देखने के बाद मैं वहाँ बहुत देर तक कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं था। एक उछाह, एक जलन एक लगाव की भावना से भर गया था। आज उस कविता को ब्लॉग पर चढ़ाने जा रहा था कि पत्नी आभा ने कहा कि इस कविता पर थोड़ा और काम करो। सो आज रपत पर लिखी मेरी कविता रुक गई। आप सब क्षमा करें।

उसके बाद हम दोनों बाकी के ब्लॉग पढ़ने लगे। साथ-साथ । घर में अक्सर ऐसा ही होता है कि एक पढ़ रहा होता है या कुछ छाप रहा होता है कि दूसरा आ धमकता है कि क्या है जो पढ़ा जा रहा है, क्या चढ़ा रही हो, रहे हो, क्या टिप्पणी कर रहे हो, कर रही हो जैसे प्रश्न शुरू हो जाते हैं। और बिना माँगे सलाह देने और रास्ता दिखाने का लोकतांत्रिक अधिकार लागू किया जाने लगता है।

किसे टीप दें। किसे पसंद करें। किसे रहने दें सब पर किच-किच होती है किंतु ब्लॉग-पढ़ाई साथ में जारी रहती है। हम दोनों की पसंद नापसंद एकदम जुदा है। जिसे जाहिर करने की यहाँ कोई जरूरत नहीं है। किटकिटाते खिलखिलाते हम कई-कई पोस्ट साथ-साथ पढ़ते हैं। आप इसे दाम्पत्य सुख माने या कुछ और लेकिन होता कुछ ऐसा ही है। क्या करें।

Saturday, March 28, 2009

तेरी किताब की ऐसी तैसी



रहूँगा न मैं घर के भीतर

घर किताबों से भर सा गया है। हर तरफ मेरी किताबें...मेरे लिए किताबें। थक रहा हूँ किताबों से। ऊब सी न हो जाए उसके पहले सोच रहा हूँ कि किताबों की खरीद पर रोक लगा दूँ। मेरे पास जिनकी किताबें हैं उन्हें बजिद लौटा रहा हूँ। प्रकाशकों के यहाँ से गलत आ गई किताबें उन्हें वापस कर रहा हूँ। कई आकर्षक शीर्षकों वाली किताबें छल गईं हैं। पहली बार ऐसा हो रहा है कि कुछ नए कवियों कहानीकारों के संग्रहों को भी वापस कर रहा हूँ। प्रकाशक पता नहीं क्या सोच कर किताबें छाप देते हैं। कोई अजीब आलोचक न समझ में आने वाली भाषा और वाक्यों में उस किताब के बारे में कुछ लिख देगा। बस हो गया काम तमाम।


नई किताबों के लिए सच में घर में कोई जगह ही नहीं बची है। मन खट्टा सा हो रहा है। टांड तक पर किताबें लदी है। आज निर्णय ले रहा हूँ कि 2010 के मार्च तक किसी किताब को घर में घुसने नहीं दूँगा। तेरी किताब की ऐसी तैसी। किताबों से बैर नहीं है । यह वाक्य छापकर दुखी हूँ लेकिन दशा ऐसी ही है। पढ़ने का अवसर कम होता जा रहा है और किताबें गंजती जा रही हैं। किसी भी बात की हद होती है। मेरे यहाँ किताब की हद हो गई है। एक अभिनेता मित्र के यहाँ 300 किताबें कल पहुँचा चुका हूँ। वे खुद उलझन में हैं कि उन किताबों का क्या करेंगे।


घर है कोई लाइब्रेरी नहीं। बच्चे संकोची हैं बोलते नहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि भानी के तकिए में मैं किताबों को भर दूँ। अपनों पर यह भी तो एक तरह का टार्चर है कि उन्हें किताबों से लाद दो। हाँ सचमुच में अति हो गई है।

किताबों की छंटनी के समय सोचता रहा कि क्या यह केवल मेरा घर है। और दुखी हो रहा हूँ । अगर यही हालात रहे तो घर अपना नहीं रह जाएगा केवल किताबें रह जाएगीं। निराला कि एक पंक्ति याद आ रही है-

रहूँगा न मैं घर के भीतर
जीवन मेरे मृत्यु के विवर।

Friday, March 27, 2009

बहुत कठिन है अकेले रहना


बिन बच्चों घर भूत का डेरा

सालों बाद ऐसा हुआ है कि घर में अकेला हूँ। तीन दिन से प्रेत की तरह इस कमरे से उस कमरे में घूम रहा हूँ। लगातार किसी ना किसी से फोन पर बात कर रहा हूँ। या फोन का, किसी के आने की राह देख रहा हूँ। आभा और बच्चे गाँव गए हैं । इसके पहले कभी ऐसा नहीं हुआ वे सब मुझे घर में अकेला छोड़ कर निकल गए हों। अक्सर हम साथ ही बाहर गए हैं। यहाँ तक कि शादी के बाद यदि आभा दो दिन के लिए भी मायके गई हो तो मैं घंटे दो घंटे बाद बिन बुलाए बताए वहाँ हाजिर हो जाता रहा हूँ।

बच्चों को गाँव मिला है। सब वहाँ मस्त हैं। कल फोन पर आभा ने बताया कि भानी ने गाँव पहुँचने के बाद से मुझे पूछा तक नहीं है। उसे मुझसे बात तक करने की फुरसत नहीं है। यही हाल बेटे मानस का भी है।
तीन दिनों में ही मुझे समझ में आ रहा है कि अकेला रहना एक अभिशाप की तरह है। हालाकि यह कैद ए तनहाई ३० को खत्म हो जाएगी। अकेलेपन का रचनात्मक क्या विनाशात्मक प्रयोग भी नहीं कर पा रहा हूँ। हाँ इतना जरूर किया है कि घर से थोड़ा कूढा हो गई किताबों को हटाया है। और एक तुलसी का पौधा लगाया है । उसे देख कर लग रहा है कि वह लग गई है। दिन में जब भी घर में होते हैं उसे पानी दे आते हैं देख आते हैं। याद आ रही है इलाहाबादी कथाकार केशव प्रसाद मिश्र की कहानी और तुलसी लग गई। आप में से किसी के पास होतो पढ़ाने का उपाय करें।