Friday, April 4, 2008

लौट गए पिता, मैं जवानी सेता रहा

परसों अभय भाई आए थे...बातों-बातों में पिताओं का जिक्र आया। हम दोनों पिता हीन हैं...और माँ से दूर हैं...परसों की बात के दौरान मैंने अपने पिता के मरन की बात की...। उसी संदर्भ में एक ताजी और दो पुरानी कविताएँ छाप रहा हूँ...पिताओं को श्रद्धांजलि हैं यह।

(१)
कोई चिह्न नहीं है
पिता
अब घर में कोई चिह्न नहीं है तुम्हारा
सब धीरे धीरे मिट गया
कुछ चीजों को ले गए महापात्र
कुछ जला दीं गईं
तुम्हारा चश्मा पड़ा रहा तुम्हारे तहखाने में
कई महीने
फिर किसी ने उसे
गंगा में प्रवाहित कर दिया ।

तुम्हारे जूते
तुम्हारी घड़ी
तुम्हारी टोपियाँ सब कहाँ खो गईं जो
खोजने पर भी नहीं मिलतीं।

जब तुम थे
तब घर कैसे भरा था तुम्हारी चिजों से
हर तरफ तुम होते या तुम्हारी चीजें होतीं....
कितने तो गमछे थे तुम्हारे
कितने कुर्ते
कितनी चुनदानियाँ
कितने सरौते...
पर खोजता हूँ तो कुछ भी नहीं मिलता घर में कहीं
जैसे किसी साजिश के तहत तुम्हारी चीजों को
मिटा दिया गया हो।

ले दे कर बस एक चीज बची है
जो लोगों को दिलाती है तुम्हारी याद
वो मैं हूँ....तुम्हारा
सबसे छोटा बेटा।

पता नहीं क्यों लोग मुझे नहीं करते प्रवाहित
नहीं कर देते किसी को दान।
(४ अप्रैल २००८)

(२)
लौट गए पिता
आए थे पिता
कुछ-कुछ उदास
कुछ-कुछ हताश।

लौट गए पिता
बिल्कुल उदास
बिल्कुल हताश।

(2)
क्यों
गाँव में
पड़ा होगा सोता
बेराते होंगे पिता
धान में पानी

मैं यहाँ पर
बंद घर में
से रहा हूँ
जवानी !
-सिर्फ कवि नहीं से दो कविताएँ ।
रचना समय- १९८७-८८ में कभी।
शब्दार्थ-
सोता=जब सब सो जाएँ, बेराना=सींचने की प्रक्रिया, से रहा हूँ=पोस रहा हूँ, जैसे मुर्गी अंडे सेती है।

13 comments:

Gyandutt Pandey said...

पीढ़ियां जाती नहीं। हममें जीती हैं। उदास न हो मित्र।

मीत said...

बहुत अच्छी बातें. बहुत अच्छे विचार. दिल से निकली थीं, सो दिल तक पहुँच गयीं.

अनूप शुक्ल said...

उदास कर गयीं ये कवितायें।

Udan Tashtari said...

मन भर आया. क्या किजियेगा!!

Shiv Kumar Mishra said...

पिता तो हमेशा जीवित रहेंगे...आप में.

आशीष said...

कुछ नहीं कहूंगा, बस दुखी हो गया हूं थोड़ा

anuradha srivastav said...

आज शिद्दत से पापा की याद आयी।

Aflatoon said...

मैं दुखी नहीं हूँ ।

Sanjeet Tripathi said...

पहली कविता तो ऐसा लगा जैसे मेरे दिल की आवाज़ लफ़्ज ब लफ़्ज हो!! मैं भी सबसे छोटा ही हूं!
यकीन नही करेंगे आप पिताजी के जाने के लंबे समय बाद तक उनके चश्में, उनकी छड़ियां मौजूद ही थी फ़िर ………

भाई साहब आंखें नम हो गई!

अभय तिवारी said...

अभी भी पिता के बारे में बात करने को शब्द पूरे नहीं पड़ते..

जोशिम said...

कल पहले पोस्ट पढी थी, (लगभग उस समय जब लगी शायद) तो पता नहीं क्यों पहली वाली नहीं दिखी थी - दूसरी जो दिखी थी उस पर पूछना था कि आपके जैसे बेटे के होते हुए पिता उदास हताश कैसे हो सकते थे, - आज पहली पढी तो पिता ही जैसे दिख गए - अपने पिता की एक चुनही अभी भी पास है, घर - जहाँ जाना धीरे धीरे कम हो रहा है आज भी उनसे भरा है - फटे, कुरते, सदरी तमाम कागजात, लेकिन बगैर गूंजती आवाज़ के - बहुत चिरंजीव लिखा है -बाकी कहना तो सब ऊपर ही कह गए - आपके और इसे पढने वाले सभी की स्मृतियों को सादर - साभार - मनीष

बोधिसत्व said...

मनीष भाई
आपकी प्रतिक्रिया से मेरा उत्साह बहुत बढ़ गया है....अच्छा लगा।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही भावुक हे आप की कविता,फ़िर पिता पर आप को बहुत प्यार था अपने पिता जी से, आप की कविता से लगता हे अब आप होसला रखे ओर पिता जी के सपने साकार करे,पिता से बढ कर कोई नही