Sunday, May 9, 2010

माँ तो माँ है वह तो प्यार करेगी ही

अपनी माँ को प्यार करें
आज मदर्स डे है। इस अवसर पर अपने पहले संग्रह सिर्फ कवि नहीं से तीन कविताएँ यहाँ छाप रहा हूँ। मैं मुंबई में हूँ। माँ गाँव में है। निरपेक्ष हो कर सोचने पर न खुद को लायक पाता हूँ न सुपुत्र। मुझे और उसे साथ-साथ होना था। लेकिन नहीं हूँ। क्या करूँ। आज माउंट आबू से लौटा हूँ। वहाँ से माँ के लिए खास करके कुछ सामान खरीदा था। सोचा था कि जाउँगा तो लेकर जाऊँगा। लेकिन सब गाड़ी में भूल आया। घर आकर बहुत पछताया। लेकिन अभी पछता कर क्या कर सकता हूँ। बस ऐसे ही माँ के खयालों में उलझा था तो लगा कि मेरे चारों संग्रहों में माँ पर कुछ कविताएँ हैं। यह ऐसे ही तो नहीं होगा। इसके पीछे माँ का प्यार दुलार ही है। मैं जानता हूँ कि मैं कैसा भी हूँ माँ तो माँ है। वह तो प्यार करेगी ही। माँ के उन्ही प्यार और दुलार की गवाही देती हैं मेरी ये कविताएँ । यहाँ इतना ही और कह सकता हूँ कि आज ही नहीं हर दिन अपनी माँ को प्यार करें।

माँ को पत्र

मैंने सपना देखा माँ
तुम धान कूट रही हो
तुम आटा पीस रही हो
तुम उपरी पाथ रही हो
तुम बासन माँज रही हो
तुम सानी-पानी कर रही हो
तुम रहर दर रही हो
तुम उघरी फटी धोती सी रही हो

तुम मुझे डाक से
कपड़े सिलाने के लिए
रुपए भेज रही हो।


दिल्लगी

माँ,
अगर बनी रही दिल्ली
तो दिल्लगी नहीं करता मैं
घर एक
दिल्ली में बनाऊँगा
तुम्हें दिल्ली
दिखाऊँगा।


दिया-बाती

माँ जब
गहदुरिया में
चूल्हा-चौका सँइत-पोत कर
पड़ोस से आग ला
सुलगाती है चूल्हा

तभी सूरज
माँ की साफ कड़ाही में
आखिरी बार
झाँक कर पूछता है
“मैं जाऊँ ?”

और माँ
चुप ही चुप
दिया बाती करती है

10 comments:

अमिताभ मीत said...

अद्भुत है भाई... तीनों ही रचनाएं ... "दिया-बाती" तो साथ रह गई ....

Aflatoon said...

बहुत दमदार हैं !सप्रेम,

जोशिम said...

मां के लिए तो आप सुपुत्र भी हैं और लायक भी ; रहेंगे भी ; ऐसी ही तो होती है माओं की लालों पर सूरज छाया ; बच्चों में तो कभी धूप कभी माया -बेहतरीन

PD said...

माँ

अशोक कुमार पाण्डेय said...

तीनों कवितायें छू गयीं

पर बंबई में रहकर दिल्ली में घर बनाने का स्वप्न! यह समझ नहीं आया…

प्रवीण पाण्डेय said...

तीनों की तीनों सुन्दर ।

Mithilesh dubey said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने , आप को बता दूँ कि मैं भी आपके ही शहर भदोहीं का मूल निवासी हूँ , जब घर आना होगा तो आपसे जरुर मिलना चाहूँगा ।

sangeeta swarup said...

तीनो रचनाएँ मर्मस्पर्शी ..

बोधिसत्व said...

प्यारे अशोक
दिल्लगी कविता मेरे हिसाब से 1987 की लिखी है। यह सपना तब का है, जो शायद अब तक अधूरा है। और दिल्ली तो अभी भी दूर है।
मिथिलेश जी
अगर तब मैं भदोही में हुआ तो मिल कर अच्छा लगेगा।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

नयी पोस्ट लगावा जाय…होरी थक गवा होई …