Tuesday, April 14, 2009

चिद्-विलास : पिता के साथ पुरखों का इतिहास



अपने पूर्वजों पर लोग क्यों नहीं लिखते

लेखक लोग अक्सर अपने घर परिवार कुल वंश के बारे में आधी-अधूरी बातें करके छुट्टी पा लेतें हैं। कोशिश करते हैं कि अपनों के बारे में जितनी कम बातें करके काम चल जाए उतना ही कुशल है। क्योंकि घर परिवार पर लिखना फायदे का लेखन नहीं माना जाता। अपने पिता और लाचार माँ पर, अपने पूर्वजों पर लोग नहीं लिखते जबकि किसी पहुँचे हुए आलोचक और सफल सामाजिक की जीवन गाथा ग्रंथित करने के लिए हर कोई कलम उठाए रहता है। बल्कि कहूँ तो कलम तोड़ स्तुति करने को तैयार रहता है।

वैसे भी भला बहुत कम कामयाब व्यक्ति का कोई इतिहास होता है, जीवन वृत्त होता है। लेकिन एक पिता वह असफल रहा हो सफल उसका इतिहास भी होता है और जीवन वृत्त भी। तभी तो डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल ने अपने पिता के जीवनी लिखी है साथ ही अपने कुल कुटुंब और गोत्र का इतिहास भी दर्ज किया है। उन्होंने उस ग्रंथ को नाम दिया है चिद्व विलास।

वैसे डॉ. गिरीश चंद्र शुक्ल प्राचीन भारतीय इतिहास के अध्येता होने का साथ ही पट्टी प्रतापगढ़ में एक पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के प्राचार्य हैं। उनका पौराणिक भारत पर गहन अध्ययन है। कूर्म पुराण के सांस्कृतिक अध्ययन, प्राक् एवं प्रागितिहासिक भारतीय पुरातत्व जैसे कई प्रकाशित हैं। इतिहास की कई और पुस्तकों के साथ ही विवादास्पद सेतुबंध रामेश्वरम् पर एक ग्रंथ प्रकाशनाधीन है। यह ग्रंथ सेतुबंध के तमाम पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भों पर प्रकाश डालेगा।


जैसा कि मैंने अभी कहा कि चिद् विलास एक कुटुंब के बनने और समाज में अपनी जगह बनाने की बड़ी रोचक गाथा के रूप में सामने आता है। कैसे एक गर्ग गोत्र में लखनौरा शुक्लों की एक शाखा अलग से बनती है। कैसे एक वंश अपने पिछले इतिहास को भूलते याद करते स्थानांतरित होते हुए भी अपने अतीत से जुड़ा भी रहता है। कैसे एक पिता अप्रत्यक्ष रूप से अपने पुत्र को साथ ही अगली कई पीढ़ियों को दिशा देता है। पुस्तक में डॉ.शुक्ल की लेखकीय शक्ति बार-बार चमत्कृत करती है। खासकर उन स्थलों पर जब वे पिता को खो देते हैं। वे प्रसंग सचमुच मर्माहत करने वाले हैं। कुछ अंश आप भी पढ़े-
एक-
उनकी( पिता की) शवयात्रा की तैयारी पूरी कर ली गई। हमलोगों ने उन्हें कंधा दिया। और रसूलाबाद श्मशान घाट ले जाया गया। पिता का वह चेहरा जिसे मैंने जिंदगी में सैकड़ों बार छुआ और अनुभव किया था, राख में परिवर्तित हो रहा था। सांसों को खींचे मैं पीछे हट आया।

दो-
सारी उम्र वे हम भाइयों व बहनों को ऊँचा उठाने, में जीवन में गुणवत्ता भरने और समाज के सभ्यनागरिक बनाने में जुटे रहे। आज हम सब खुले में आश्रय रहित अनुभव कर रह थे। छत्रछाया हट चुकी थी। उन्होंने ढाल की भाँति हमें सुरक्षा दी थी।

तीन-
पिता जी को बरामदे में जमीन पर लिटाया गया था। उनका चेहरा मात्र खुला था। जिसमें किसी फ्रकार की आभाहीनता परिलक्षित नहीं हो रही थी। लगता था कि यौगिक साधना में शरीर को शिथिल किए हुए हैं।

पूरे ग्रंथ को पढ़ने के बाद इसे फिर से पढ़ने को मन करता है। समाजेतिहास के साथ ही एक अलग तरह की औपन्यासिकता चिद् विलास को अलग मुकाम देती है। आजकल के बोझिल लेखन तुलना में शुक्ल जी का लेखन काफी रोचक और पठनीय है, तमाम सामाजिक संदर्भ अपने आप जुड़ते जाते हैं। यदि आप सब इस ग्रंथ को पढ़ना चाहें तो। पारिजात प्रकाशन, 247 सी/5, ओम गायत्री नगर इलाहाबाद से इसे प्राप्त कर सकते हैं। विनय पत्रिका के मार्फत सम्पर्क करनेवालों के 40 प्रतिशत की विशेष रियायत दी जाएगी।

· ग्रंथ के अन्यान्य प्रकरणों पर और लिखना चाहता था लेकिन अभी इतना ही।

11 comments:

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

चिद् विलास पुस्तक के गहरे मनोमँथन से उपजे इन पृष्ठोँ को पढकर किसी की भी आँखेँ सजल हो जायेँगी -
और अपने स्व. पिता की स्मृति भी उभर कर विषाद गहरा कर देँ ऐसी हैँ

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर। आपने शुक्लजी की किताब से परिचय कराकर पुण्य़ का काम किया। शुक्रिया। अब आपके नाम का उपयोग हमें करना है इलाहाबाद में।

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

मेरी एक कविता है बोधि- 'संबंधीजन', मुंबई हमलों के बाद मैं थोड़ा सशंकित हो गया था कि उसमे आये 'हमलावर' और 'आक्रान्ताओं' शब्दों को पता नहीं, जो कविता नहीं समझते, लोग किस तरह से लेंगे! लेकिन यह आलेख लिख कर तुमने मुझे बड़ा संबल दिया है क्योंकि आखिर वह बात ऐतिहासिक और नस्ली शुद्धता तथा बाहरी आक्रमणों के परिप्रेक्ष्य में है.

अजित वडनेरकर said...

आजकल के साहित्य में तो ज्यादातर बोझिल, बौद्धिक कूड़ा है। शुक्ल जी की पुस्तक का सुंदर परिचय रहा,पर कुछ कम रहा। जो लिखना चाहते थे, उसे भी लिखिये। पुस्तक निश्चित ही मंगवा ली जाएगी।

अभय तिवारी said...

सही है.. ऐसे साहित्य का अभाव है!

संगीता पुरी said...

जानकर अच्‍छा लगा...

डॉ .अनुराग said...

कुछ पन्नो की झलकियाँ अजीब से बैचेनी पैदा करती है ,पिता को खोना शायद एक ऐसी शति है जिसकी भरपाई नामुमकिन है ..किताब के परिचय के लिए शुक्रिया

जितेन्द़ भगत said...

आपके ब्‍लॉग से आज ही परि‍चि‍त हुआ। अपने परि‍वार पर लि‍खी गई पुस्‍तकें कम ही हैं, यह पुस्‍तक इस कमी को नि‍श्‍चय ही कम करेगी। जानकारी के लि‍ए आभार।

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

शोध - हम अपने पुरखों पर लिखने के लिये जो शोध करना चाहिये, वह नहीं करते।
अन्यथा "द रूट्स" जैसी कितनी कालजयी पुस्तकों का मसाला आस पास बिखरा है।
अपने पुरखों के बारे में हम बड़े सपाट भाव से हैगियोग्राफिक हो जाते हैं। आपका क्या विचार है?

बोधिसत्व said...

ज्ञान जी आप उचित कह रहे हैं कि अक्सर हम सभी अपने पुरखों के बारे में लिखते समय हैगियोग्राफिक हो जाते हैं। लेकिन इस पोथी में तो पिता लगभग संत ही हैं। और संत का चरित लिखते समय असंतई परक आख्यान डालना कहाँ तक उचित रहेगा। संत चरितता तब ठीक न होगी जब पिता पूर्वज संत सम न हों। यहाँ तो डॉ. गिरीश जी के पिता का जीवन संत का जीवन ही था।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

भाई, बड़े दिनों बाद आपके ब्लॉग पर आना हुआ और बहुत अच्छा लगा. आपने 'चिद विलास' कि जानकारी दी, शुक्रिया, जल्द ही कोशिश कर किताब मंगवाता हूँ. उम्मीद ही नहीं विश्वास है कि आप परिवार सहित मुंबई में कुशल से होंगे. संपर्क में रहेंगे. इसी कामना के साथ.