Tuesday, October 23, 2007

साल भर बाद सूर्य को देखा


सूरज के पहले उगना

आप लोग यकीन नहीं करेंगे आज लगभग साल भर बाद उगता हुआ सूरज दिखा। पहले जब गाँव में रहता था या इलाहाबाद में लगभग हर दिन का सूर्योदय देख ही लेता था। तब रात दो या तीन बजे तक जागने की चर्या नहीं थी। यहाँ मुंबई में सुबह जग जाने के बाद भी अगर घर से बाहर न निकलें तो सूरज का दर्शन दुर्लभ है। आज सूरज दिखा तो बड़ा अच्छा लगा। वह उतना ही चमकदार और ऐश्वर्यशाली था जितना मेरे बचपन में या किशोरावस्था में हुआ करता था। उसे देर तक देखता रहा।
क्या रहा निहारता रहा। उसे पूर्ववत पाकर अच्छा लगा, पर बहुत कुछ याद आया।

बचपन में मैं सूर्य का उगना अपने कचौड़ी नामा घर की छत से देखा करता था। सुबह मेरे बाबा सूर्य को जल चढ़ाते फिर कक्का फिर कुछ और लोग। हम बच्चे उन सबको ऐसा करते देखते। बाबा पीतल के बड़े से लोटे में कुछ कनेल के फूल डाल लेते या गेंदे के और कोई मंत्र बुदबुदाते हुए अपने स्थान पर घूमते। वे एक ग्रह की तरह सूर्य की धरती पर रह कर परिक्रमा करते थे। वे हम लोगों के लिए एक साक्षात ग्रह थे। हमें उनकी परिक्रमा एक खास लय दिखती। सूर्य पूजन के बाद बाबा जल की कुछ बूँदे अपनी गोखुरी शिखा पर भी छिड़कते।

आज सुबह सूर्य को उगता देख कर बाबा की बड़ी याद आई। वे बड़े पराक्रमी पुरुष थे। उन्होंने अपने कुल को एक बड़ी चमक दी थी मान दिलाया था इलाके में। वे एक धाकड़ और बेजोड़ वैद्य थे । वैद्यक पर उनकी एक पोथी बनारस के प्रकाशक ठाकुर प्रसाद एण्ड सन्स बुकसेलर से छपी थी। एक तरह से वे मेरे इलाके के पहले कुछ लेखकों में भी माने जा सकते थे।

सूर्योदय के बीच में बाबा का यह अवांतर प्रसंग छोड़ कर मैं फिर सूर्य पर लौटता हूँ। जब हम छ: सात साल के हुए सूर्योदय के घंटों पहले बिस्तर छोड़ने लगे थे । मेरे एक ताऊजी जो एजी ऑफिस इलाहाबाद में चीफ एकाउंटेंट वगैरह थे उन्हें महुआ बीनने में बड़ा मजा आता। रास्ता चलने वालों से महुए के रस भरे फूल टूट जाते थे । तो ताऊजी हम सब बाल बृंदों को लेकर भोर में महुआरी बारी पहुँच जाते । सबसे पहले जिन पेड़ों के नीचे से राह गई होती थी हम उनके नीचे महुआ बीन कर एक पतली राह बना देते । डगर चलू लोगों के आने जाने के लिए। मुझे याद है कि दोनो हाथों से महुए के फूलों को बिना चोट लगाए हम दनादन महुआ बीनते । घंटे भर में महुए के ढेर लग जाते। तब अक्सर ऐसा होता कि जब हम महुआ बीन कर घर लौट रहे होते थे पीछे से सूर्योदय होता। ताऊजी हम सब से कहते कि हमेशा सूरज से पहले उगना चाहिए । और हम खुश होते कि लो आज भी सूर्य देव पिछड़ गए। हम अग्गी रहे। ऐसी कई बातों को आज के सूर्योदय ने याद दिला दिया।

आज न बाबा है न ताऊजी पर महुए के फूल तो गिरते ही होंगे। बाबा न सही सूर्य को कोई न कोई तो अर्ध्य देता ही होगा। बाबा के लोटे से जलधार के साथ घरती की ओर गिरते वे फूल बड़े लुभावने होते थे। महुए के पेड़ से धरती की ओर गिरता हुआ हर फूल बड़ा सलोना होता था। एक दम निर्मल, रसभरा। दूर-दूर तक महुए की मदमाती सुगंध छाई होती। महुए को बचाने के लिए ताऊजी न सही वहाँ जो लोग होंगे महुए को कुचलने बचाते तो होंगे । अगर रस पाना है तो किसी भी चीज को कुचल जाने से नष्ट हो जाने से बचाना ही होगा।

महुए के फूल बीनने पर बच्चन जी की एक कविता है । उसी अंचल और भूमि की उपज है वह कविता । बच्चन जी की जन्म शती पर उस कविता को छापना चाह रहा था पर संकलन ही नहीं मिल रहा है। यह कविता शायद त्रिभंगिमा में थी। गीत की जो पंक्तियाँ याद आ रही हैं वो नाकाफी है। शुरुआती पंक्तियाँ हैं -
लइके मुड़वा पर डलइया महुआ बीनई जाब।
क्या करूँ....उसकी जगह पर वह गीत पढ़ें जो मुझे बेहद प्रिय है

जो बीत गई

जो बीत गई सो बात गई !
जीवन में एक सितारा था,
माना, वह बेहद प्यारा था,
वह डूब गया तो डूब गया;
अम्बर के आनन को देखो,
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फिर कहाँ मिले,
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मानाता है।
जो बीत गई सो बात गई !

यह गीत और है पर अब बहुत हुआ। सूर्योदय से महुआ, महुआ से बाबा फिर ताऊजी फिर बच्चन जी । धागा बढ़ता ही जा रहा है....बस करता हूँ। जो बीत गई ओ बात गई।

10 comments:

Sanjeeva Tiwari said...

भईया गांव व पिछले दिनों की यादे कोई भी जब जब लिखता है, मन कुलांचे भरता है । इससे हमें गांव से और भी अधिक जुडाव महसूस होता है ।

सूरज, दादा जी एवं बच्‍चन जी को एक सूत्र में पिरोकर गांव की याद दिलाने के लिए धन्‍यवाद ।

'आरंभ' छत्‍तीसगढ की धडकन

आशीष said...

गाँव की महिमा और महुवा के बारे में कई दिनों बाद कुछ देखने को मिला

राजेश कुमार said...

कुछ दिनों बाद सूर्य हीं नहीं दिखेगा। यदि रोशनी मिल जाये तो यही काफी होगा।

Shiv Kumar Mishra said...

बोधि भाई,

महुआ बीनने हम भी जाते थे....सबेरे-सबेरे पेड़ के नीचे गिरे हुए महुआ को देखकर अद्भुत एहसास होता था....ठीक वैसे ही, जब सबेरे-सबेरे नीम के पेड़ की नीचे नीम के फल देखते थे...लगभग एक ही मौसम रहता था...यादें ताजा हो गईं...कवि ह्रदय क्या-क्या याद कर लेता है और करा भी देता है

बहुत बढ़िया पोस्ट.

Udan Tashtari said...

सूर्योदय से महुआ, महुआ से बाबा फिर ताऊजी फिर बच्चन जी । धागा बढ़ता ही जा रहा है....बस करता हूँ। जो बीत गई ओ बात गई।

--आप तो बस करता हूँ कह कर चल दिये और हमारी यादों का सफर नम आँखों से शुरु हो गया.

--बहुत सुन्दरता से पिरोया है-मानो कोई गीत हो.

ALOK PURANIK said...

वाह और आह एक साथ निकली है जी।

Divine India said...

सत्य की परछाई…
तबियत खुश हो गई पढ़कर… जटिल समाज में इस प्रकार की बाते एक ताजगी का अनुभव कराती हैं।
कविता तो बहुत ही अच्छी है।

राजीव said...

इस प्रकार का जीवंत वर्णन पढ़कर तो लगता है हम प्रत्यक्ष में सूर्योदय की अरुणिमा, और वातावरण की शीतलता से रू-ब-रू हैं।

Gyandutt Pandey said...

बहुत बढ़िया पोस्ट! बधाई।

हम त कई बार भोर के पहिले गंगा किनारे चला जाईथ।

बोधिसत्व said...

अच्छा करते हैं ज्ञान भाई.....वैसे मैंने आज भी सूरज को उगते देखा, पर गंगा तो यहाँ नहीं हैं...........दिनचर्या में कुछ बदलाव की कोशिश है