Tuesday, October 2, 2007

कितने-कितने और कैसे-कैसे गांधी

गांधी जी की जय

सकता हो आप में से किसी ने गांधी को देखा है। मैं दुबले मोहनदास कर्मचंद की बात कर रहा हूँ। मैंने तो सिर्फ एक दो ही गांधी को देखा है। माँ की गोंद में बैठ कर संतोषी माँ फिल्म और इंदिरा गाँधी को एक ही दिन भदोही में देखा था । बात 1973 की है। उसके बाद राजीव गांधी को इलाहाबाद और सोनिया राहुल का दिल्ली दर्शन दिल्ला में किया। पर किसी के साथ गप्प नहीं की खेला कूदा नहीं। धौल धप्पा नहीं किया। अगर गांधी – नेहरू परिवार से जुंड़े या अवतरित गांधियों को छोड़ दें तो कुछ गांधियों को मैं जानता हूँ जिनके साथ मेरा घना नाता है। जो जन्मना गांधी नहीं थे लेकिन उनके आसपास के लोगों और खुद उनकी हरकतों और गतिविधियों ने गांधी बना दिया।

मेरे साथ एक दलित लड़का पढ़ता था। उसका नाम था मंगतू....पर मेरे अध्यापक जदुनाथ दुबे उसे सरकारी बाभन या सरकारी गाँधी कहते थे। कभी-कभी वे उसे बड़ी दयालुता से पीटते थे और बार-बार एक वाक्य बोलते थे तूँ तो सरकारी है....गाँधी का हरिजन है तूँ सरकारी बाभन.....। उनके इस निरंतर और विकट स्नेह को सह न पाने के कारण मंगतू ने विद्यालय को दूर से ही प्रणाम करना शुरू किया...और वह नूतन एकलव्य बनने से रह गया। बाद में वह गुरूजी के ही खेत में बैलों और बाद में उनके ट्रैक्टर के पीछे दौड़ता दिखा।

उसके बाद बारी आती है मेरे गाँव के गाँधी की। नाम हा उनका लालजी । एक दम चुप्पे। सात या आठ तगड़े बलशाली भाइयों के जेठे। उन्होंने कभी किसी को घास के डंडे से भी नहीं मारा पर उनके भाई गाँव के हर उस बंदे को धरा धाम पर गिराया जो उनके रास्ते में कैसे भी पड़ा। शिकायतों पर लालजी चुप रह जाते और भाई लोग गाँव में भुजा फटकारते घूमते रहे। लालजी की चुप्पी ने उन्हें मेरे गाँव का गाँधी बना दिया। यह दबंग गांधी मेरे लिए आज भी एक आश्चर्य हैं। अभी तो उनका मान ही लालजी उर्फ गांधी पड़ गया है।

तीसरा गांधी मुझे अल्लापुर इलाहाबाद में मिला। वह सफाई कर्मचारी था और शाम सुबह टुन्न रहता था। कभी कभी दिन में दो या तीन बार सड़क बुहार जाता था। उसकी गुणवत्ता थी मार खा कर चुप रहना या हँस देना। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि वह कहां से लाता था सहने की शक्ति। क्या वह भीतर से कोई संत था जो दुनिया के जुल्मों को हँस कर झेल लेता था । लोग उसके इसी गुण के कारण उसे गाँधी कहने लगे फिर वह धीरे-धीरे गांधी बन गया ।

चौथा और अब तक का आखिरी गैर जन्मना गांधी मुझे दिल्ली में मिला। उमेश चौहान। वह लगातार थर्ड डिवीजन यानी तृतीय श्रेणीमें अपनी इम्तहान पास करता रहा और उस के इसी तृतीय श्रेणी के पास होने ने उसे गांधी बना दिया । उसका नाम पड़ गया गांधी मार्का चौहान।

पिछले कई सालों से मुझे कोई नया गांधी नहीं मिला । हो सकता है कि आपको मिला हो । उस तक हमारा प्रणाम पहुँचाएं। आज निश्चय ही अपने इन तमानम प्रतिरूपों को धरती पर पाकर गांधी कितने खुश होंगे। उनके विचारों का कैसा अभूतपूर्व प्रचार-प्रसार हो रहा है। सो गांधी जयंती पर गांधी की जय।

4 comments:

Gyandutt Pandey said...

चलिये इन गांधियों के बहाने गांधीजी को और गान्धीजी के बहाने इन गुमनाम लोगों को याद तो कर लिया जाता है.
बापू वास्तव में गुमनाम लोगों की आवाज थे.

अनिल रघुराज said...

एक कहावत भी चलती है कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी...

Udan Tashtari said...

चलिये बढ़िया याद कर लिया मौके पर.

मेरी मुलाकात भी अभी कुछ समय पूर्व ही गाँधी जी से हुई थी जिसका वृतांत अभिव्यक्ति पत्रिका में छपी है इस बार देखिये हमारी मुलाकात का नजारा:

http://www.abhivyakti-hindi.org/sansmaran/2007/mainegandhi.htm

बोधिसत्व said...

यह सब गांधी की तोकप्रियता का सबूत है....उनके विरोधी भी उनको किसी ना किसी तरह याद कर लेते हैं....