Wednesday, May 2, 2007

कोष या कोश क्या फर्क पड़ता है ?

भाइयों मैं भाषाविद् या वैयाकरण नहीं हूँ । अक्सर बोलचाल के बीच शब्दों का उच्चारण भी शुद्ध या ठीक-ठीक नहीं कर पाता हूँ । ऐसे शब्दों में नुक्ते वाले शब्दों के साथ ही स, श और ष का उच्चारण खास तौर से गलत या त्रुटिपुर्ण होने की संभावना बनी ही रहती है । बुजुर्ग लोग बताते हैं कि मरहूम फिराक गोरखपुरी साहब का उच्चारण भी अशुद्ध होता था । मेरा मानना है कि उच्चाऱण से जुड़ी इस दिक्कत से अकेले मैं ही नहीं उत्तर भारत से आनेवाले तमाम लोग या लेखक कवियों को दो-चार होना पड़ता है । मैं अपने अशुद्ध उच्चारण के लिए अपने पहले अध्यापक स्वर्गीय कल्लर पाठक को दोष दूँ या बाबा तुलसी दास को समझ नहीं पा रहा हूँ । बाबा तुलसी अपने मानस में लगभग सर्वत्र एक ही स का प्रयोग करते हैं । अगर कहीं ष लिखा तो यह पाठक पर है कि वह उस ष को मौके के मुताबिक ख पढ़ें या ष । बाबा को बचपन में पढ़ना आज जवानी में भारी पड़ रहा है । बाबा के अलावा मेरे गुरु कल्लर पाठक ने कभी भी तालव्य, या दंत्य के आधार पर श या स या ष का उच्चारण करना नहीं सिखाया । वे पढ़ाते थे बड़ा श, छोटा स और पेट चिरवा ष या शंकर वाला श या सीता वाला स। वे यह अंतर सिर्फ लिखने में करते थे उच्चारण में नहीं । लेकिन हम अपनी कमी को कल्लर पाठक या किसी पर नहीं टाल सकते ।

बांग्ला भाषा की सही शिक्षा के लिए गुरुदेव रविन्द्रनाथ ठाकुर और ईश्वर चंद्र विद्यासागर जैसे दिग्गजों ने बांग्ला प्राइमर की रचना की है । आज भी वे पोथियाँ चलन में है और बांग्ला सीखने के लिए बच्चों को पढ़ाई जाती हैं । लेकिन मेरी जानकारी में हिंदी के किसी बड़े लेखक ने बच्चों या नवसाक्षरों को सिखाने के लिए व्याकरण के आधार पर कोई पोथी तैयार करने की जहमत नहीं उठाई है।यह हमारा दुर्भाग्य है।

भहरहाल अब हमें ही तय करना पड़ेगा कि किस जगह कौन सा स-श-ष लिखना या बोलना है । हालाकि आज इस तरह के आपाधापी के दौर में इस तरह छोटी-मोटी भूलों से हिंदी के सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता । हिंदी के ही एक अति मान्य कवि केदार नाथ सिंह के शब्दों में -

हमारे युग का मुहावरा है
फर्क नहीं पड़ता
जहाँ लिखा है प्यार वहाँ लिख दो सड़क
फर्क नहीं पड़ता ।
अब कोश को ही लीजिए राम चंद्र वर्मा जी अपने कोश को जो कि लोकभारती प्रकाशन से छपा है कोश ही लिखते हैं। लेकिन पंडित राम शंकर शुक्ल रसाल जी शब्द कोष लिखते हैं । कोश के सवाल पर हिंदी एक मत नहीं है । हिंदी के समांतर कोश-कार भी अपने थिसारस को कोश ही लिखते हैं । गनीमत सिर्फ यह है कि दोनो शब्दों का अर्थ एक ही है-शब्द भंडार या अभिधान या खजाना । मुझे तो कोख भी इस कोश या कोष का नजदीकी नातेदार दिखता है । जहाँ कुछ भी एकत्रित किया जा सके , संचित किया जा सके वही कोश है । चाहे वह सरकारी कोशागार हो या भाषा वैज्ञानिक हरदेव बाहरी जी का शब्द-कोश ।

मेरा निवेदन है कि ऐसे मामलो में मीन-मेख (छिद्रान्वेषण) से बचते हुए भावना को समझने की कोशिश होनी चाहिए । मुझे लगता है कि कोश कार के इरादे नेक हैं और उन्होने परम्परा से चलते आ रहे दो रूपों में से एक का प्रयोग किया है ।

इस कोष के अलावा भी हिंदी के कई शब्द हैं जो दो चेहरों या रूपों में प्रयोग किये जा रहे हैं । यह इन शब्दों की दादागीरी ही है कि हम इनका कोई एक रूप नहीं तय कर पा रहे हैं । इन शब्दों ने हमे परास्त कर दिया है और ताल ठोंक कर कह रहे हैं कि क्या कर लोगे । हम तुम्हारी मजबूरी हैं । फिलहाल मैं कुछ ऐसे शब्दों की सूची दे रहा हूँ जिनके दोनों ही रूप शुद्ध हैं और वैयाकरणों द्वारा मान्य भी हैं । कायदा यह है कि एक लेखक अपने लेख या रचना में इनके किसी एक ही रूप का प्रयोग हर कहीं करे -

दुल्हन-दुलहन, अंजनि-अंजनी, पृथिवी-पृथ्वी, अंजलि-अंजली, अहल्या-अहिल्या, गो-गौ, अवनि-अवनी, अमिय-अमी, कर्त्ता-कर्ता, कलश-कलस, कुटीर-कुटिर, कौसल्या-कौशल्या, त्रुटि-त्रुटी, दश-दस, धरणी-धरणि, दम्पति-दम्पती, भूमि-भूमी, मणि-मणी, मट्टि-मट्टी-मिट्टी, वशिष्ठ-वसिष्ठ, श्रेणि-श्रेणी, हनुमान-हनूमान, जूआ-जुआ, सारथी-सारथि, पपिहा-पपीहा, तलुवा-तलवा, प्रतिकार-प्रतीकार, केशरी-केसरी । हो सकता है कि आप ऐसे दो चेहरों वाले कुछ और शब्दों से परिचित हों । कृपया उन शब्दों की पहचान करके अलग करना बेहद जरूरी है।ताकि हम कुछ अधिक रचनात्मक काम कर सकें

5 comments:

v9y said...

कुछ भाषाविदों के अनुसार कोश और कोष में पहले कोई अर्थभेद नहीं रहा है पर कुछ अर्से से कोश 'शब्दकोश' के अर्थ में और कोष 'खज़ाने' के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है.

पृथिवी, अमी, कुटिर, त्रुटी, दश, दम्पती, भूमी, मणी, मट्टि, हनूमान, जूआ, प्रतीकार का उदाहरण मानक/मान्य हिंदी लेखन में बहुत कम देखने में आता है (कम से कम मेरी निगाह में तो नहीं आया). क्या आप कुछ उदाहरण दे सकते हैं जहाँ ये रूप दिखते हों.

कुछ ऐसे और शब्द जिनके दोनों रूप बराबर मान्य हैं:
गरदन-गर्दन, गरमी-गर्मी, बरफ़-बर्फ़, बरतन-बर्तन, बिलकुल-बिल्कुल, सरदी-सर्दी, कुरसी-कुर्सी, भरती-भर्ती, बरदाश्त-बर्दाश्त, वापिस-वापस, एकाई-इकाई, दोबारा-दुबारा (संदर्भ)

masijeevi said...

मूलत: हिंदी से ष ध्‍वनि पूरी तरह लुप्‍त हो चुकी है, केवल देवनागरी लिपि में बची है। यानि भाषा में नहीं है, लिपि में है। उच्‍चारण में नहीं है और वर्तनी में है।
खैर ये तो मास्‍टराना प्रतिक्रिया थी जो कविता कोश के मामले में भी श्रीश के उत्‍तर स्‍वरूप देनी पड़ी थी।
अपनी राय यह है कि भाषा को बहते रहने देना चाहिए। पर कहे देते हैं- प्रियंकर भैया नहीं मानने के। :)

Hindi Blogger said...

बोधिसत्व जी, भाषा की शुद्धता/अशुद्धता पर आपके विचार बड़े नेक लगे.

'दम्पती' और 'दम्पति' दोनों को गूगल किया. दम्पती के 486 पेज निकले और दम्पति के 450. (दोनों सर्च में नेपाली के कुछ पेज भी शामिल हैं.) इतना ही नहीं 'दम्पत्ति' के भी 273 पेज हैं.

साफ़ है कि भाषा को बाँध कर रखना असंभव नहीं तो कठिन ज़रूर है!

ये तो लेखन की बात हुई.

जहाँ तक बोली की बात है, उसका मानकीकरण तो असंभव ही है. क्योंकि इसकी हल्की-सी भी संभावना तभी बनेगी जब हर बोलने वाले के दाँत, जीभ, तालु, कंठ, होंठ, नासिका आदि की बनावट बिल्कुल एक जैसी हो!...और सब-के-सब एकरूप समाज में रहते हों!!

Srijan Shilpi said...

अच्छी शब्द-अर्थ चर्चा चल रही है इन दिनों चिट्ठा जगत में। यह क्रम आगे भी जारी रहे।

बोधिसत्व जी, अनामदास जी, अभय तिवारी जी, मसिजीवी जी, प्रियंकर जी, विनय जी, हिन्दी ब्लॉगर जी, श्रीश जी आदि का इस तरफ विशेष ध्यान केन्द्रित करना चिट्ठाकारी की भाषा के लिए विशेष महत्वपूर्ण है।

यह सही है कि शब्दों के शुद्ध रूप और उच्चारण को लेकर हमें यथासंभव सजग रहना चाहिए, लेकिन हर किसी से ऐसी सजगता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अधिकांश व्यक्तियों का मुख्य जोर कथ्य पर ही रहता है। हिन्दी और देवनागरी के मामले में कौन-सा रूप और उच्चारण मानक है या मानक माना जाना चाहिए, इसका कोई प्रामाणिक वैज्ञानिक आधार विकसित नहीं हो पाया है। हिन्दी में प्रचलित शब्द क्षेत्रीय बोलियों के अलावा संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, अरबी, फारसी और अंग्रेजी आदि से लिए गए हैं। इस क्रम में उनके रूप, विन्यास और उच्चारण में बदलाव आना स्वाभाविक है। अंग्रेजी के भाषाविदों में भी मौलिक शुद्धता का आग्रह काफी कम होता जा रहा है और अन्य भाषाओं से शब्दों को ग्रहण किए जाने के मामले में उनकी उदारता ही अंग्रेजी को समृद्ध कर रही है।

हिन्दी की समृद्धि के लिए भी भाषाविज्ञान और कोशविज्ञान संबंधी शोध लगातार जारी रहना चाहिए। लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने शब्दों की जीवंतता और अर्थवत्ता बनाए रखने का प्रयास करें और सजग होकर अन्य स्रोतों से शब्दों को ग्रहण करना जारी रखें।

Sanjeet Tripathi said...

भाषा-विद्वानों के बीच मैं मुआफ़ी मांगते हुए सिर्फ़ यही कहना चाहूंगा कि, क्या फ़िलहाल यह काफी नहीं कि यहां लोग हिंदी में लिख रहे हैं?