Sunday, July 15, 2007

गाली की जरूरत है

गालियों के पक्ष में

मैं फिर कहता हूँ कि मैं गालियों का प्रचारक नहीं हूं बल्कि आज कल गालियां मेरा प्रचार कर रहीं हैं। गालियों को धन्यवाद दीजिये की बिना साहित्य और भाषा के समर्थन के उन्होने खुद को ना सिर्फ बचा रखा है बल्कि कुछ लेग उनके होने से भी डरते हैं । और गालियों की ढिठाई और बेशर्मी देखिये कि डटी हैं। उनके लिए तो शव्द कोशों में भी बहुत कम जगह बची है। कोश कारों ने भी स्वदेशी का खयाल नहीं रखा। कहीं ऐसा ना हो कि कल सरकार गालियों का आयात करने पर मजबूर हो जाए। गालियों का कोई मंत्रालय बने। और हमारे तमाम मर्यादित साहित्यकार वहां सलाहकार बन कर बैठ जाएं।
कल को हमारे बच्चे हमसे यह ना पूछे कि पितर गालियाँ क्या होती हैं और हम पहेलियों की तरह गालियों को भी याद ना कर पाएं। तो बे हिचक होकर बचाओ अपनी देसी गालियों को बचाओ।

हमारे देवता किसी पर बहुत गुस्सा हुए तो शाप दे दिया, जा भस्म होजा, तेरा सर धड़ से कट कर अभी गिर जाए, पर मजाल कभी किसी को गाली दी हो, कुल का नाश कर दिया, भट्ठा बैठा दिया पर मजाल है कि गाली दी हो। कुछ लोग आप को समूचा खतम कर रहे होते हैं पर आप को गाली नहीं देंगे। और गालियां हैं कि बिना सपोर्ट के अपना झंडा ऊंचे लहरा रही हैं।

गालियों के लिए हिंदी फिल्मों में थोड़ी बहुत जगह बन जाती है पर हमारे लेखक मन में चाहे जिसकी जितनी मां बहन कर लें पर कलम हाथ में पकड़ते ही गालियों की जगह कविता निथरने लगती है। सारा दुत्कार प्यार में बदल जाता है। सारी घृणा पुचकार में बदल जाती हैं। वर्ग शत्रु के खिलाफ लगाए गये नारे सुरीली तान की तरह सुनाई पडते हैं और गंदी-गंदी गालियाँ आशीष बन कर हवा में तैरने लगती हैं। पूरा माहौल एक गाली विरोघी पवित्रता से भर जाता है । हम खुद को एक सभ्य लोक में पहुंचा हुआ पाते हैं। पर मन की कुंठा मन में बजबजाती रहती है। क्या करें गाली देने से अमर्यादित होने का खतरा जो बन जाता है। कुछ लेखकों का तो दृढ़ मत है कि लिखी हुई गालियाँ अर्जित पुण्य का क्षय कर देती हैं। इस लिए वे गालियों को मंत्र की तरह मन में बुदबुदाते हैं, उनका जाप करते हैं, मनकों पर फेरते हैं पर लिखते हुए थर्राते हैं।
कुछ लोग घर में बीवी को गाली दे लेंगे, पर घर से बाहर निकलते ही भाषा पर साहित्य की रस माधुरी छा जाती है। ऐसी मीठी बोली जैसे पटना या इलाहाबाद से हिंदी भाषा में एमए करके अभी निकले हों। सड़क पर या समाज में बोलने के मामले में उनका मत संतों से मिलता जुलता है, उनके मेन में हर दम ऐसे पद चक्कर काटते रहते हैं-

मीठी बानी बोलिये, मनका आपा खोय
औरन को सीतल करे आपहु को सुख होय।
या
बोली एक अमोल है, जो कोइ बोले जानि
हिये तराजू तौलि के तब मुख बाहर आनि
पर जैसे ही जरा सा समाज का धुप्पल हुआ कि सुंदर- सुंदर गालियाँ, आप्त वाक्य की तरह जिह्वा से झरने लगती हैं। ऐसी अनसुनी और कोरी गालियां कि सुन कर जीवन कृतार्थ हो जाए। पर अगर उन्हें आप मंच से गाली बोलने (गाली की महिमा गाने में भूल गया कि वह तो बकी जाती है) या लिखने को तो आप को ऐसे देखेंगे जैसे आप ने उन्हे गाली दे दी हो।

मैं फिर कह दूं कि मैं गालियों का प्रचार नहीं कर रहा । वैसे गालियों को हमारे जैसी संकोची और अर्ध गाली बाज की जरूरत भी नहीं है। वे अपना प्रचार और प्रसार करना जानती हैं। हर वो तबका जिसे समाज सरकार और संस्कृति का सहारा नहीं मिलता उसमें अपने संरक्षण की एक अजब शक्ति खुद-ब-खुद आ जाती है। इसलिये ऐ गाली विरोधी लोगों सुनो, तुम गालियों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। क्योंकि वे तुम्हारे मन में घर बना चुकी हैं। तुम्हारा अर्ध संस्कारी शरीर उन अंत्यज अछूत गालियों का गोदाम है। गोदाम ही नहीं उर्वर खेत है। जहाँ लोगों के खिलाफ तुम्हारा आक्रोश तुम्हारा क्षोभ, तुम्हारी पस्ती, तुम्हारी पराजय उन्हें जिन्दा रखती है। उन्हे तुम्हारी या दुनिया की भाषा और व्याकरण की भी कोई दरकार नहीं है। वे बिना जबान के भी प्रकट होती हैं और कभी कभी आप के सलोने शांत मुख मंडल पर ग्रहण की तरह उनका होना दिखता है। तुम चाह कर भी उनका कुछ नहीं कर सकते।
तुम अपनी बेटियों की भ्रूण हत्या कर सकते हो, बहुओं को बंद घरों में जला सकते हो, निठारी में जो चाहे कर सते हो, तुम्हारे शहर के पिछवारे कभी – कभी सामने भी किसान खुद को जलाकर राख हो सकता हैं, पर तुम सरकार को भी गालियों नहीं दे सकते, क्योंकि गाली देने के लिए एक नैतिक साहस की जरूरत होती है। और उस साहस को तुम्हारे पालन कर्ताओं ने बचपन में ही मार दिया था। तुम आक्रोश हीन जीव हो, जिसे मधुर बोलने का मधुमेह है। तुम्हे मीठा बोलने और लिखने की ऐसी सीख मीली है कि तुम कुछ भी कर सकते हो, गाली नहीं बक सकते ।

तुम सामूहिक रूफ से झूठ बना सकते हो, झूठ बोल सकते हो, तुम्हे पता है उपनिषदों में किसी को झूठा कहना सबसे बड़ी गाली थी, जिस पर झूठ बोलने का आरोप होता था कभी-कभी वह आत्मघात भी कर लेता था
मैं यहां साहित्य में लिखी भडकाऊ गालियों का हवाला नहीं दूंगा। क्षमा याचना करते हुए कबीर का बस एक दोहा उद्धृत करूँगा जो कबीर ग्रंथावली में है, जिसके संपादक हैं बाबू श्याम सुंदर दास-
1-कबीर भग की प्रीतड़ी केतक गये गड़ंत
केतक अजहू जायसी नरक हसंत-हसंत।
दूसरा संदर्भ है बाबू भारतेंदु हरिश्चन्द्र की जीवनी से, जिसके लेखक हैं श्री ब्रज रत्न दास, पृष्ठ 147-पर एक समस्या पूर्ती का हवाला है। उन्ही के शव्दों में पढ़े-
एक दिन भारतेंदु जी के यहां कवि-सभा लगी हुई थी। किसी ने समस्या रूप में एक मिसरा पढ़ कर उसकी पूर्ती चाही। मिसरा यों हैं –

कपड़ा जला के अपना लगा आग तापने
भारतेंदु जी ने उपस्थित सज्जनों की ओर देखा। उनमें एक अल्पवयस्क विद्यार्थी भी था, जिसने उसे पूरा करने की आज्ञा माँगी।आज्ञा मिलने पर उसने कहा-

ऐसा भी चूतिया कहीं देखा है आपने।
कपड़ा जला के अपना लगा आग तापने।।

तो गाली के उर्वर खेतों, आप सब से निवेदन है कि गाली की हत्या के बारे में गोल बंद होने से बात नहीं बनने वाली, अगर गाली के खिलाफ बहुत बकोगे तो एक दिन खुद ही चलती फिरती गाली बन जाओगे। गालियों की जरूरत है, जैसे घृणा की जरूरत है। जैसे सच की आवश्यकता है। आप लोग अच्छी गालियां बोल सकते हो, बस बुदबुदाने की जगह बोलने का साहस जुटा लो। और जो आपकी गाली का विरोध करे, उसे चुप कराने का एक स्वरचित मंत्र देता हूँ, गाँठ बाँध ले काम आएगा-

हमारी बात गाली और आपकी बक्क बचन,
हमारे पाँव फटे पग और आपके कमल चरन।

गाली अमर रहे।

4 comments:

अनामदास said...

बोधिसत्व जी
गालियों की बहुत ज़रूरत है, आपको भी पड़ गई, गालियाँ भी और ज़रूरत भी. मैंने पहले ही कहा था कि गालियों के बारे में सोचने की ज़रूरत है---
http://anamdasblog.blogspot.com/2007/07/blog-post.html
भारतेंदु जी की सभा वाला प्रसंग सुंदर है.

अनूप शुक्ला said...

बोधिसत्वजी गालियों के सामाजिक महत्व पर हमारा ये लेख देखियेगा।
http://hindini.com/fursatiya/?p=55

लेकिन मेरी राय यह है कि आपने विजय कुमार जी वाला जो लेख लिखा था उसकी भाषा के कारण उस लेख की गरिमा कम हो गयी। दूसरे आपने जो निराला/फ़िराक धूमिल के उदाहरण दिये वे सब आपके प्रयास गलत बात को सही ठहराने के प्रयास हैं। गालियां आदि काल से रही हैं यही बात एक कवि के द्वारा उसको इस्तेमाल की वैधता नहीं देती।

प्रशांत कुमार said...

बोधिसत्व ने अपने लेख में किसी को गाली नहीं दी थी अनूप जी, आप उसे फिर से पढ़े, उसका सुर गाली नुमा हो सकता है,
रहा उनके लेख की गरिमा का सवाल तो जब भी तल्ख बाते होंगी, बुरी लगेंगी। और भाषा कैसी हो यह कौन तय करेगा।

Neelima said...

गालियों की जरूरत तो संदर्भ से तय होगी ! जाहिर है संदर्भ व्यक्तिसापेक्ष होंगे ! वैसे आप माने तया न मानें गाली अभिव्यक्ति के पंगे होने के बाद ही प्रयोग करनी पडती है ! औए हां साहित्य, समाज ,समाजशास्त्र का वास्ता देना भी यहां ठीक नहीं इससे बेहतर आप कहें कि - मैंने गाली दी क्योंकि मैं देना चाहता था और यह कहें कि यही मेरी अभिव्यक्ति को सटीक अंजाम दे सकती थी ! आगे की बातें बाद में !