Wednesday, July 18, 2007

सीता ने कहा, राम से मन न मिलेगा


सीता का अपार-दुख

कुछ दिनों पहले पहलू में सीता के लोक रूप की चर्चा चंदू भाई ने चलाई थी। मैंने उस गीत का पूरा पाठ देने को कहा था। पता नहीं यह वही गीत है या कोई और । यहाँ एक अवधी जाँत गीत का जस का तस रूपांतर प्रस्तुत है। इसमें सीता अपने मन का दुख प्रकट करते हुए कहती हैं कि अब मेरा मन राम से सपने में भी न मिलेगा। सीता का यह रूप ग्रंथो में न गूँथा गया हो तो कोई आश्चर्य नहीं । अयोध्या के इक्ष्वाकुओं ने स्त्रियों पर हर संभव जुल्म किये हैं । इस अत्याचार को लोक ने सहेजा है क्योंकि वह अपनी थाती को सहेजना जानता है । तभी तो सीता का यह संवाद आज भी सुरक्षित है। गीत का आद्यंत “जेठै की दुपहरिया .......त विधि न मिलावैं हो राम” है। सीता से जुड़ा अगला जाँत गीत अगली कड़ी में । यह पाठ पंडित राम नरेश त्रिपाठी के “ग्राम गीत” में संकलित है।

1-जेठ की दुपहरी है। धूल जल रही है। राम ने सीता को ऐसे समय में घर से
निकाला जब वे गर्भ भार से शिथिल थीं।
2-वन में सीता बिसुर-बिसुर कर रोती और कलपती हैं - हाय राम, बच्चा होने पर कौन मेरे आगे पीछे होगा? कौन देख भाल करेगा? कौन धगरिन बच्चे का नाल काटेगी?
3-सीता का विलाप सुन कर वन की तपस्विनियाँ निकलीं । वे सीता को समझाने लगीं कि हे सीता चिंता मत करो। हम तुम्हारी देख भाल करेंगी। हम तुम्हारी धगरिन होंगी।
4-सीता विलाप करती हैं कि हे राम ! बेल की लकड़ी कौन लाएगा? रात बड़ी विपत्ति की होगी।
5-हाथ में कलश लिए ऋषि-मुनि सीता को समझाते हैं कि हे सीता हम बेल की तकड़ी ता देंगे। रात सुहावनी हो जाएगी।
6-दूसरी ओर चैत महीने की नवमी तिथि को राम ने अयोध्या में यज्ञ आरंभ किया । हे राम सीता को ले आओ सीता के बिना यज्ञ सूनी रहेगी।
7-आगे के घोड़े पर वशिष्ठ मुनि, उनके पीछे भरत और अल्हड़ बछेडे पर लखव सीता को मनाने पहुँचे।
8-पत्ते का दोना बना कर, उसमें गंगाजल लेकर सीता गुरु जी के पैर धोती है और माथे चढ़ाती हैं ।
9-गुरुजी कहते हैं- हे सीता तुम तो बुद्धि की आगार हो, भला तुमने राम को कैसे भुला दिया ? अयोध्या को तुमने छोड़ ही दिया ?
10 सीता कहती हैं- हे गुरु राम ने मुझे सोने की तरह आग में डाला, तपाया जलाया और भूना । मुझे ऐसा डाहा कि सपने में भी अब उनसे मन न मिलेगा।
11- पर हे गुरु ! आप का कहना मानूँगी। अयोध्या चलूँगी। पर जब पुरुष का ऐसा ही प्रेम है, तो ब्रह्मा उससे न मिलावें, तभी ठीक है।

5 comments:

चंद्रभूषण said...

बोधि भाई, गीत छाप दें।

बोधिसत्व said...

चंदू भाई कल छाप दूँ तो, फटी पड़ी है। त्रिलोचन जी की दो कविताएं अभी चढ़ाई हैं ।
कल आप पढ पाएंगे।

Isht Deo Sankrityaayan said...

बोधि भाई
दो बातें. पहली यह कि मूल गीत जरूर छापिएगा. दूसरी आपकी बात के संदर्भ में, यह कि रामकथा सिर्फ तुलसी तक सीमित नहीं है. यह तो आप जानते ही हैं. लेकिन इसके जो मूल हैं, यानी वाल्मीकि, उनके रामायण में सीता का सिर्फ दुःख उजागर नहीं हुआ है, वाल्मीकि की अपनी दृष्टि भी बहुत भारी पडी है इस संदर्भ में इक्श्वाकुओं पर. लगभग वैसे भी फटकारा है वाल्मीकि ने जैसे कणाद ने फटकारा था पांडवों को. सिर्फ सीता के लिए ही नहीं, सरभंग और श्रिंगी ऋषि के मामले में भी और श्रवण के शिकार के सिलसिले में दशरथ को भी. मुझे गीत याद नहीं है, सिर्फ भाव याद है. कभी गीत मिल तो लिखूंगा.

बोधिसत्व said...

भाई मेरी बात लोक बनाम शास्त्र है। बाल्मीकि का संदर्भ आस पास भी नहीं है इस लोक गीत के ।

manya said...

गीत जो भी हो..संदर्भ जहां का भी हो.. पर भाव सही हैं..की विधि राम से ना मिलावें..