Tuesday, July 31, 2007

सफलता के लिए सुर जरूरी !

टंच जी को मेरा प्रणाम

मुझे 20 साल से अधिक हो गया है लिखते। 1986 से लिखना शुरू किया। तब मैं ज्ञानपुर में बारहवीं में पढ़ता था। बाद में वहीं के काशी नरेश राजकीय महाविद्यालय में बीए में दाखिला लिया। लेकिन घर वालों ने धक्का देकर इलाहाबाद भेज दिया। ज्ञानपुर में मेरी कुछ क्षणिकाएँ छपी थीं। वहाँ एक बाल संपादक थे, अमिय देव शंकर, जो मेरे नातेदार भी थे, उन्होने ही अपनी पत्रिका आलोक डाइजेस्ट में मेरी दो क्षणिकाएं छापी थीं। उस प्रकाशन का असल मजा यह था कि मेरा नाम और पता छपा था जिसने मुझे गाँव लड़कों में हीरो बना दिया था। उस समय ज्ञानपुर में मंचीय कविता का बहुत तगड़ा माहौल था। वहाँ के प्रधान कवि हुआ करते थे टंच जी । वे जिसके सिर पर हाथ रख देते वही कवि हो जाता। मैंने बड़ी कोशिश की पर टंच जी का आशीष नहीं मिला।

उनका आशीष न पाकर भी मैं डटा रह जाता पर उन्होने मुझे मंच से धकेला और निकाला दोनों एक साथ दे दिया। आरोप यह कि मेरी आवाज में दम नहीं है। मेरी वही आवाज जिस पर मेरी भाभियाँ फिदा थीं, मेरी ताई जिसमें रामायण सुनती थी टंच जी ने उसे बेसुरा करार दिया। उन्होने कहा तुम्हारी आवाज में न सुर है न खनक । सुन कर लगता है कि रो रहे हो। प्यार की भावनाएं भी लगता है कर्ज मांग रहे हो। वीर रस में लगता है कि रेक रहे हो। कुछ विचार हैं पर सिर्फ भाव या विचार से क्या बनता है। सफलता के लिए आज सुर जरूरी है। बार-बार हूट होना पड़ेगा।

उनकी बातें बहुत बुरी लगी थीं। मन में आया कि उन्हे पटक दूँ और छाती पर बैठ कर कव्वाली जैसा कुछ गाऊँ। यह खयाल भी आया कि कहीं ये लोग मेरी काव्य प्रतिभा से जल तो नहीं रहे हैं। जो हो मैं मंच से जो उतरा तो फिर नहीं चढ़ा।

टंच जी की सुर सिद्धि गजब की थी और वे खुद को तुकाचार्य भी कहते थे। पानी भी मांगते तो तुकों में। बात करते तो लगता कि गा रहे हैं। किसी किशोरी से प्रणयावेदन करते तो वह कविता समझ कर खिल पड़ती। कभी टंच जी को कविता के लिए कंटेंट का टोटा नहीं पड़ा। कभी उनको काव्य वस्तु खोजते नहीं पाया। वे पहले तुक बैठाते फिर लिखते। लिखते क्या वे गा-गा कर अपनी कविता पूरी कर लेते थे। उनकी एक कविता जो आज भी मुझे याद है, वह कुछ यूँ थी-

मैं हूँ सुंदर तुम हो सुंदरि,
तुम हो सुंदर जग से सुंदरि
हम दोनों हैं सुंदर सुंदरि
आओ प्यार करें
नैना चार करें।

ज्ञानपुर से जो रास्ता गोपी गंज की तरफ जाता है उसी पर उनका एक छोटा सा घर था। जहाँ वे अपने दो चार चेलों के साथ रमें रहते थे। पार्ट टाइम एक धँधा और था गाने का। शादियों में रात भर गाने का ठेका लेते थे खूब रंग जमाते थे। जिस बारात में गाने का बयाना नहीं मिला होता था उसमें खुद से ऐसा माहौल बनाते कि महीने भर के भांग का प्रबंध तो हो ही जाता।

उनके कमाने का एक तय तरीका था। वे खर्च के हिसाब से कमाते। किसी शिष्य का फीस भरना होता तो किसी महाजन को कवित्त सुना आते। निकलने लगते तो खुश सेठाइन कुछ ना कुछ दक्षिणा दे जाती । चेले खुश और टंच जी अपने सुर की साधना में लगे रहते। मुह में खैनी या पान दबा कर। पान की लाली में रंगे उनके होठ लगता लिपिस्टिक लगाए हैं। वैसा सुंदर सुकुमार कवि मैंने फिर नहीं देखा। उनकी याद में मीर का एक शेर अर्ज करता हूँ-

वो सूरतें इलाही किस देश बस्तियाँ हैं
जिन्हे देखने को अपनी आँखे तरस्तियाँ है।

टंच जी से तभी की मुलाकात है। उस दिन जो विछुरा आज तक सामने नहीं पड़ा। पता नहीं कहाँ होंगे टंच जी जहाँ भी हों उन्हे हमारा प्रणाम पहुँचे।

7 comments:

Gyandutt Pandey said...

क्या टंच पोस्ट है!
और टंच जी भी कितने टंच थे जिन्होने आपसे मंच छीन लिया :)

ALOK PURANIK said...

अच्छा हुआ कि आप टंचित च मंचित ना हुए, वरना तमाम शादियों को एक गायक-कव्वाल भले ही मिल जाता, पर हिंदी कविता एक धारदार च शानदार कवि से वंचित रह जाती।

चंद्रभूषण said...

प्यारे भाई, यह टंच जी जैसे लोगों के ही दम का जलूसा है जो गांव-कस्बों के लोग आज भी कविता जैसी किसी चीज का नाम जानते हैं। जैसे-तैसे लोगों को अपनी बात सुनाते हुए यही हमारी क्लासिकी कविता के अंतिम, दयनीय और रुग्ण अवशेष हैं- वर्ना हमारे-आप जैसे आधुनिक कविता के लिखवारों को अब साहित्य के आत्ममुग्ध दायरे से बाहर जीने वाले आम लोगों से मतलब ही क्या रह गया है? त्रिलोचन, नागार्जुन और सबसे बढ़कर फणीश्वर नाथ रेणु को ऐसे कवियों का महत्व पता था और उनसे संवाद बनाए रखने का कोई मौका वे छोड़ते नहीं थे। मेरी चिंता हमेशा से यही रही है कि लिखित और मंचीय कविता के बीच कोई सार्थक संवाद कैसे बने। दोनों तरफ दुराग्रह जबर्दस्त हैं- पता नहीं इनके बीच आपसी बातचीत की कोई जगह है भी या नहीं, और अगर है तो यह कभी खोजी जा सकेगी या नहीं!

बोधिसत्व said...

चंदू भाई आप ठीक कह रहे हैं। निराला और महादेवी जी भी मंच पर अपना रंग जमाते थे। मंच को छोड़ कर भागने का मामला सातवें दसक के सूरमाओं का है।

अनिल रघुराज said...

बोधी बाबा लिखते रहिए। टंच से ही परिचय कराने के लिए शुक्रिया।

बोधिसत्व said...

बाबा क्यों बना रहे हैं अनिल सर
आपका तो बच्चा हूँ
पढ़ते रहें
बल मिलताहै

अनूप शुक्ला said...

अच्छा लगा टंज जी के बारे में पढ़कर!