Friday, July 20, 2007

मैं तिकड़मी हूँ

तीन तिकट महा विकट

भारतीय परंपरा में तीन का बहुत महत्व है। तीन नेता या ग्रंथ नहीं अंक की बात कर रहा हूँ। तीन ऋण होते हैं, तीन ही ताप होते हैं और लोक भी तीन ही कहे या माने जाते हैं। लोकमान्य तिलक जी तो वेदों की संख्या भी तीन ही गिनाले हैं । कभी भारतीय राजनीति के धुरंधर खिलाड़ियों की एक तिकड़ी थी। ये नेता गरम दल के थे और नाम था लाल,बाल,पाल। हिंदू धर्म के बड़े देवताओं की गिनती भी तीन के पद में की जाती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश जैसे प्रतिभावान त्रिदेवों के बीच चौथे के लिए कोई जगह वैसे भी कैसे बच सकती है। और अगर बवी भी तो त्रिनेत्र भूत भावन शंकर उसे खाक में मिला देंगे।

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि रेणु का हीरा तीन ही कसमें क्यों खाता है । वो चाहता तो और कसमें खा सकता था। आज कल कविता में भी एक त्रयी का हवाला आप पाते होंगे। मेरी पत्नी ने याद दिलाया कि गाँधी जी के बंदर भी तो तीन ही थे। संस्कृत व्याकरण में तीन पुरुष होते हैं, प्रथम, उत्तम और मध्यम। आप चाहें तो चौथे श्रेणी में कापुरुष जोड़ दें । काल भी तीन ही होते हैं भूत, भविष्य और वर्तमान काल । यहाँ मैं अकाल को जोड़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। जबकि वह हर कहीं छाया हुआ है । शरीर की अवस्था भी तीन हैं । आप अभी किसमें हैं बचपन, जवानी या बुढ़ापे में ।

अंकों में ऐसा नहीं कि सिर्फ तीन का ही महत्व है। हर अंकों से जुड़े ऐसे ही पद प्रचारित है। मसलन दो जहान हैं, तीन काल हैं, चार आश्रम और पाँच अग्नियाँ हैं, षट कर्म हैं, सप्त सरिताएं हैं, अष्ट-छाप भी हैं ( कछुआ छाप नहीं कवियों का मध्यकालीन जोरदार गुट था) नव दुर्गाएं हैं, तो दशावतार भी है, वैसे नवधा भक्ति के सहारे कितने ही चापलूसों की नाव पार लगी है, नहीं तो दशों दिशाओं से कभी भी उन्हें धिक्कार की ध्वनि सुनाई पड़ सकती थी । कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना ही है कि हर अंक से कुछ ना कुछ विशेष शव्द-पद बनता है। मैं तो यहाँ तीन की ही बात करुँगा । क्योंकि मैं तिकड़मी हूँ और तीन-पाँच से अधिक तिकड़म में यकीन करता हूँ। अपना यह तीन तिगाड़ा बडे- बडों का काम बिगाड़ा करता है ।
आज कल में इस तीन तिगाड़ा के कुछ नये रूपों पर विचार कर रहा हूँ, मर्यादावादी क्षमा करेंगे।
मुंबई में लोग कहते हैं कि -
बुड़बक यानी बेवकूफ तीन तरह के होते हैं....
विधवाएं भी तीन तरह की होती हैं
और सरकार भी तीन तरह से काम करती है।
तो व्याख्या पहले बुड़बकों से से शुरू करते हैं।
देश में बेवकूफों की भरमार है। उसमें पहले दर्जे बेवकूफ वह हुआ जिसके चेहरे को देखते ही आवाज आए मिल गया बेवकूफ यानि
1- शकल बेवकूफ,
कथाकार होते हैं
2- अकल बेवकूफ और समीक्षक होता है तीसरे दर्जे का बेवकूफ यानी
3- नसल बेवकूफ
ऐसे ही विधवाएं भी तीन तरह की होती हैं, जिनमें
पहली होती हैं-
आस विधवा - यानि ऐसी विधवा जिसका पति परदेशी है । जो लौट भी सकता है और नहीं भी। ऐसे परदेशी की पत्नी सधवा हो कर भी विधवा है। उसकी दुनिया उम्मीद पर कायम है।
दूसरी होती है,

पास विधवा - ऐसी विधवा जिसके पति के होने ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
और तीसरी होती हैं,

खास विधवा- यानि सचमुच में जिसका सुहाग उजड़ गया हो । इनमें सब का दुख अलग तरह का होता है।हमें सब के प्रति संवेदना रखनी चाहिए।

अब बात सरकार के काम के तीन तरीकों पर।
सरकार या व्यवस्था अपना काम थ्री डी से करती है । वह पहले काम को डिले यानी देर करती है, फिर डायलूट यानी ढीला करती है घोल देती है, इसके बाद डिलीट कर देती है यानी मिटा देती है ।
अब आप चाहें तो इसी तर्ज पर या जैसे मन हो इस तीन या बाकी संख्याओं के साथ खेल सकते हैं ।

7 comments:

अनामदास said...

आप तीन में भी हैं और तेरह में भी. आँवला, हरे बहेड़ा वाला त्रिफला चूर्ण खाइए, त्रिदोष यानी कफ़,वात पित्त से मुक्ति पाइए. आपका भूत, भविष्य, वर्तमान यानी त्रिकाल उत्तम है. तीन बहनों के बाद भाई, या तीन भाइयों के बाद बहन पैदा हो तो तेतर कहते हैं, त्रिखल दोष. ज़्यादातर दो ग़लतियाँ माफ़ हो जाती हैं तीसरी नहीं, क्रेडिट कार्ड का पिन नंबर तीन बार ग़लत दबाने पर वह कार्ड को लील लेता है. हमारे देश को चलाने वाले खंभे भी तीन हैं--कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका. ये सब मैंने तीन मिनट में लिख दिया है.

अभय तिवारी said...

तीन अंक की महिमा है.. एक तो एकवचन है.. दो दोवचन है.. पर तीन होते ही वह समष्टि का प्रतिनिधित्व कर देता है.. बहुवचन हो जाता है..

Neelima said...

अनामदास जी की लिस्ट में जोडें---ताप भी तीन तरह के होते हैं -दैहिक ,दैविक ,भौतिक !चरित्रों में त्रिया चरित्र का काफी महत्व होता है (वैसे पता नहीं वो क्या होता है )!
बाकी के तिहाडे सोचकर बताऊंगी

बोधिसत्व said...

अभी तक तीन ही प्रतिक्रियाएं मिली है। इस तिकड़ी को चौकड़ी बनाने के लिए मैं खुद एक टिप्पणी डाल रहा हूँ।
आप सब अपने त्रिपुरारी शर्मा जी को तो जानके ही होंगे। क्या त्रिपुर सुंदरी उनके मुहल्ले में ही रहती है। इस त्रिभुवन में इसी अक्षय तृतिया को कुछ होगा । अगर आप नहीं मानेंगे तो मैं त्रिशूल वालों को आप सब के पीछे लगा दूँगा। फिर आप सब तीन ताल के ठेके पर नाचते दिखेंगे। दो अच्छे लोगों की बात में यह तीसरा आता ही है। तो आइये यह चिड़ी का तिक्का आप का स्वागत करेगा। आप तीज की तिजहरिया यानी तीसरे पहर भी आ सकते हैं । अगर चाहें तो तिपहिया भी ले सकते है। मैं आप को तिराहे या त्रिमुहानी पर मिल लूँगा । साथ में त्रिवेदी जी भी होंगे और तिवारी और त्रिपाठी जी भी। पर मैं निवेदन करूँगा कि आप त्रिवेणी और त्रिजटा से तीन फर्लांग दूर ही रहें। अगर वह सोने की तिलड़ी माँगे तो क्या करेंगे। मामला कहीं त्रिकोण से त्रिकोणीय संघर्ष पर न चला जाए । इस लिए जीवन की त्रिज्या को तिहरी पकड़ में रखे । मुझे तीसरी कक्षा में रटा हुआ तीन का पहाड़ा आज भी याद है । पर तृतीय श्रेणी को कभी भी न भुलाएं। तीसरा दर्जे का खयाल रखे। थर्ड डिवीजन से पास होकर देखिये मैं कहाँ तक आ गया । दिल्ली में तीन मूर्ति भवन भी है और सड़क भी । इलाहाबाद में तिनकोनिया के पास मेरी ससुराल है। पर क्या कोई बताएगा कि यह तीसरी दुनिया क्या बला है।

परमजीत बाली said...

वरदान भी तीन ही मिलते हैं। बहुत सही लिखा है।लेकिन टिप्पणीयाँ तीन नही होगी यहाँ। अभी कोई और आ जाएगा। इस लेख को बाचने।

बोधिसत्व said...

अनामदास और अभय
कुछ लोग त्रयंबकेशवर शिव को पूजते हैं उन्हे त्रिपुंड लगाते हैं। कुछ लोग तिपाई पर बैठ भी जाते हैं पर वो कभी हैट्रिक नहीं बना पाते।

ravish said...

भई तीन में क्यों अटके हैं। दुनिया भी तो तीन होती है। लेकिन फर्स्ट वर्ल्ड और थर्ड वर्ल्ड के बारे में सुना है। सेकेण्ड वर्ल्ड कहां गया ? कुछ मालूम हो तो बताइये। तीन तिगाड़े काम बिगाड़े। इस टाइप का कुछ सुना करते थे। तीन पांच का क्या रिश्ता है?
तीन का काफी गड़बड़ है। एक दो से भी मिला रहता है और चार पांच से भी। पता कीजिए।