Saturday, August 4, 2007

नागार्जुन बाबा का गुरु मंत्र



बाबा मेरे कनफुकवा गुरु







नागार्जुन बाबा पर हिंदी में बहुत सारी कविताएं लिखी गई हैं। वे शमशेर जी के अली बाबा हैं तो किसी के लिए फक्कड़ । मैंने भी बाबा पर कभी एक कविता लिखी । वह कविता परमानन्द जी जैसे आलोचकों को बहुत पसंद आई । कई आलोचकों ने उसी कविता के आधार पर नागार्जुन जी को समझने की कोशिश की तो मुझे लगा कि काश यह कविता मैं बाबा को सुना पाता । 1990 या 91 की बात होगी बाबा का इलाहाबाद आना हुआ। साहित्य सम्मेलन के किसी समारोह में । मौका अच्छा पा कर जलेस की इलाहाबाद इकाई ने एक गोष्ठी रखी शेखर जोशी जी के लूकर गंज वाले घर में । मैंने हिलते-कांपते हुए अपनी कविता बाबा के सामने पढ़ी। बाबा ने ऐसे सुना जैसे सुना ही न हो । मैं एक दम बुझ गया। पर मन की एक साध तो पूरी हुई ।

उस यात्रा में बाबा चंद्रलोक के सामने होटल पूर्णिमा में ठहरे थे । हमारे एक और मित्र धीरेंद्र तिवारी ने बाबा के पूर्णिमा होटल में रुकने को ही मुद्दा बना लिया था। उसने उस बाबा को अपने व्यंग का निशाना बनाया जो हर किसी पर व्यंग करते थे । उसने बाबा के ऊपर आक्षेप करते हुए एक कविता भी लिख मारी थी और जिद किए था कि वह अपनी कविता बाबा को सुनाएगा। कविता की पहली पंक्ति थी-

सारा देश अमावस में है
कवि तुम बसे पूर्णिमा में ।

धीरेंद्र को इस बात की भी शिकायत भी कि बाबा अगर जनता के कवि हैं तो उन्हे ट्रेन में एसी क्लास में सफर नहीं करना चाहिए।

एक दो दिनों बाद बाबा को दूध नाथ जी के यहाँ भोजन पर जाना । हम भी पहुँचे। बाबा से न जाने कितनी बातें हुईं । पर हिम्मत नहीं हुई कि बाबा से जान लूँ कि उन्हे मेरी कविता कैसी लगी। दूधनाथ जी के यहाँ ही अचानक बाबा ने कहा आओ मैं तुम्हें गुरु मंत्र देता हूँ । फिर वे मेरे कान में कुछ बोले जो मैं आप सब को नहीं बता सकता । कहते हैं कि गुरुमंत्र को जाहिर नहीं किया जाता। जाहिर कर देने से गुरु द्वारा दी गई शक्ति खतम हो जाती है।

बाबा के बारे में बहुत सारी बातें लिखी जानी बाकी है । उनके जैसे व्यक्ति पर तो पोथियों के पन्ने भी कम पड़ेंगे। वे कैसे बच्चों की तरह खुश रहते थे, कैसे अपनी घुच्ची निगाहों से दुनिया को देखते थे । कैसे एकदम बुढ़ापे में भी जीवन के प्रति एक मिठास से भरे थे। वे सच में हम सब के बाबा थे । हिंदी कविता के आखिरी बाबा ।
क्या मैं जीवन भर यह भूल पाऊंगा कि मैं एक दिन नहीं कई दिन बाबा के साथ भटकता रहा था। क्या बाबा को छू पाना, उनके गले लगना कोई भी भुला सकता है। बाबा से मिलना इस धरती के सबसे महान इंसान से मिलना था ।

बाद में बाबा ने मेरी कविता की तारीफ भी कि।कहा कि तुमने मेरी नाक की तुलना चीलम से की है, यह अच्छा है । और फिर अपनी नाक को एक दो बार छुआ भी ।

उसके बाद हमें बाबा का दर्शन कभी नहीं मिला । तब हम नादान थे । बाबा के साथ का महत्व अब कुछ अधिक समझ में आ रहा है। आप बाबा के साथ हमें देख ही चुके हैं अब बाबा पर लिखी मेरी कविता पढ़ें।

घुमंता-फिरंता

बाबा नागार्जुन !
तुम पटने, बनारस, दिल्ली में
खोजते हो क्या
दाढ़ी-सिर खुजाते
कब तक होगा हमारा गुजर-बसर
टुटही मँड़ई में लाई-नून चबाके।

तुम्हारी यह चीलम सी नाक
चौड़ा चेहरा-माथा
सिझी हुई चमड़ी के नीचे
घुमड़े खूब तरौनी गाथा।

तुम हो हमारे हितू, बुजुरुक
सच्चे मेंठ
घुमंता-फिरंता उजबक्–चतुर
मानुष ठेंठ।

मिलना इसी जेठ-बैसाख
या अगले अगहन,
देना हमें हड्डियों में
चिर-संचित धातु गहन।
बाबा के साथ में हैं सुधीर सिंह और दूधनाथ जी बेटी और हम सब की रचना दीदी।

13 comments:

अनूप शुक्ला said...

अच्छा लगा यह संस्मरण और कविता।

Srijan Shilpi said...

अनमोल है यह शब्द चित्र बाबा का, जो आपने इस कविता में खींचा है।

बाबा के साथ बिताए पल सचमुच जीवन की धरोधर हैं। आप इस मामले में धनी हैं और धन्य भी।

Sanjeet Tripathi said...

कविता अच्छी लगी!!
शुक्रिया यह संस्मरण बांटने के लिए!!

Laxmi N. Gupta said...

सुन्दर संस्मरण है। चित्र भी सुन्दर हैं।

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छा रहा आपका यह संस्मरणात्मक आलेख और साथ ही कविता भी. दर्शन भी हो गये फोटो के माध्यम से. आभार.

बोधिसत्व said...

अनूप भाई
सृजन शिल्पी और
संजीत त्रिपाठी,
लक्ष्मी एन गुप्ता और उड़न तश्तरी

सबका आभारी हूँ
पढ़ने के लिए
प्रतिक्रिया देने के लिए भी।

अभय तिवारी said...

सही है बन्धु.. आप भाग्य के प्रबल लोग हैं.. आप लोगों के पास बड़े बड़े लोगों के साथ बिताए हुए समय के संस्मरण है.. लिखिए..

बोधिसत्व said...

अभय भाई
भाग्यशाली तो रहा हूँ । नहीं तो ऐसा कुछ नहीं किया था या किया है कि ऐसे महापुरुषों की छाया भी मिलती। कभी -कभी यह सब सपना जैसा लगता है। क्योंकि 15 से 18 साल की उमर तक मैं भयानक और हरामी टाइप का जीव हुआ करता था। यह मैं दावे से कहता हूँ कि अगर कविता या साहित्य से सामना न हुआ होता तो मैं कुछ भी हो सकता था। कुछ भी का मतलब कुछ भी- डाकू, लुटेरा या हत्यारा भी। मित्र बता नहीं सकता कि कैसे लोगों के साथ मैं उठता-बैठता था। क्या-क्या कर्म-कुकर्म थे, जो हमारे आदर्श थे।
इसलिए आज जहाँ भी हूँ और जो भी मिला है सब पूर्वजों का आशीष है । बस

काकेश said...

आपके संस्मरण को पढ़कर खुद को भी धन्य पाया कि बाबा से मिले और शिष्य रहे किसी व्यक्ति को पढ़ने का सौभाग्य मिला है.... और लिखिये कुछ ऎसे ही संस्मरण...

avinash said...

ओह बाबा, आह बोधिसत्‍व!!! कितना पवित्र-पावन लगता है विरल व्‍यक्तित्‍व का स्‍मरण-संस्‍मरण।

Vijendra S. Vij said...

आज ही आपकी यह पोस्ट देख पाया..अच्छी कविता लिखी है आपने बाबा पर..सुन्दर संस्मरण हमारे साथ बाटने के लिये बहुत बहुत धन्यवाद..

mahashakti said...

अच्‍छा लगा आपकी इस पोस्‍ट को पढ़ कर, अपने मुहल्‍ले लूकरगंज को खोजते हुये आपके इस पोस्‍ट पर आना हुआ। लूकरगंज के साहित्‍य ऐतिहासिकता से परिचय तो था ही नई बात भी जानने को मिली।

Vivek Rastogi said...

आप बहुत धनी हैं बाबा का आशीर्वाद जो आपके साथ है।