Saturday, August 18, 2007

जो प्यार नहीं करता सड़ जाता है


दुनिया सड़ गई है

इलाहाबाद की बात है। कई साल हो गये हैं पर हम झूरी को नहीं भूल पाये हैं। इलाहाबाद की सड़कों पर अक्सर एक दुबला-पतला सूखा सा युवक दौड़ता हुआ दिखता । उसके दाढ़ी बाल और शकल सूरत काफी कुछ ईसा मसीह की याद दिलाते थे। हम कह सकते हैं वह इलाहाबाद की सड़कों पर भटकता ईसा था। बहुत सुंदर और सलोना रहा होगा वह कभी। वह वैसे कटरा के आस पास अधिक दिखता। असली नाम का तो पता नहीं पर लोगों ने नाम रखा था झूरी। झूरी को बंद मक्खन बहुत पसंद था। अक्सर वह दौड़ते-दौड़ते रुक जाता और किसी से भी बुदबुदा कर कहता कि बंद मक्खन खिलाओ। समझदार इतना कि पल भर में समझ जाता कि यह बंदा खिलाएगा या नहीं। बिना समय जाया किए तुरत दूसरे का रुख करता। जिद्दी इतना कि बंद मक्खन के अलावा कुछ भी नहीं खाता था। चाहे भूखा रहना पड़े। बंद मक्खन के लिए उसका लगाव उसमें स्वाति बूँद के लिए प्यासे पपीहा की छवि दिखती थी। हालाकि वह काफी गंदा रहता था। जैसा कि अक्सर बेघरबार अशांत मन अस्थिर दिमाग लोग हो जाया करते हैं।

झूरी रातें अक्सर सर गंगा नाथ झा हॉस्टल में लगी गंगानाथ जी की प्रतिमा के आसपास बीताता था। पर सबेरा होते ही वह तेज गति से भागता हुआ नजर आता। उसी हॉस्टल के लड़कों की उतरन पहनने को मिल जाती थी।
कभी कभार चायवाले या कुछ श्रद्धालु लड़के झूरी को गरम चाय इत्यादि से स्नान भी करवा देते थे । जिसकी शिकायत तत्काल या अगले दिन किसी भली सूरत इंसान से किया करता।

वह गुणी था। उसके गुणों मे इजाफा तब और हो जाता था जब किसी ने उसके लिए बंद-मक्खन का ऑर्डर दिया होता था। खुशी के मारे वह मुह से ढोल बजाने लगता। बीच-बीच में गाने भी लगता। गाने तो अक्सर फिल्मी होते। वह आये दिन जब प्यार किया तो डरना क्या गाता था। पूछने पर कहता मुझे कोई प्यार नहीं करता....और गंदा चेहरा और उतर जाता।

एक बार हम कई दोस्त सर विलियम हॉलैंड हाल छात्रावास से निकल रहे थे । गेट के सामने झूरी अपने दोनो हाथों से नाक बंद किये खड़े थे। झूरी को खड़े पाकर लोग अचंभित हो गये। पूछने पर झूरी ने बताया कि पूरी दुनिया सड़ गई है। सब कुछ सड़ गया है। बदबू के मारे साँस लेना मुश्किल है। कहाँ जाऊँ। इसीलिए मुह से साँस ले रहा हूँ। किसी ने प्रतिवाद किया तो झूरी ने उसे भी समझाया कि तुम सब सड़ गये हो। क्योंकि तुम लोग मुझे प्यार नहीं करते। जो प्यार नहीं करता सड़ जाता है। उसकी बातों सुन कर हम सन्न रह गये थे।

दस बारह साल बाद आज यहाँ मुंबई में एक दूसरा झूरी मिला। दौड़ता चला जा रहा था। किसी ने कहा कि साहब इसे पागल ना समझें। बहुत गुणी है। मुह से ढोल बजा लेता है। बहुत अच्छा गाता है। दुबला है तो लोग सूखा बुलाते हैं। झूरी नाम का भी तो मतलब वही हुआ सूखा। मैं सूखा का मुरझाया चेहरा नहीं देख पाया। दुविधा में हूँ कहीं झूरी ही तो नहीं था। वैसे इस देश के हर शहर का अपना एक झूरी या सूखा होता है। कभी कभी तो हर पीढ़ी और हर इलाके का होता है। और कभी कभी तो हर आदमी के भीतर अपना एक एक झूरी या सूखा होता है। कहाँ से आते हैं झूरी और सूखा। हमें सोचना होगा।

13 comments:

अभय तिवारी said...

बाहर से झुरना स्वीकार्य है भीतर से नहीं.. मैं सड़ना नहीं चाहता.. सब से प्यार करना चाहता हूँ.. सब का प्यार पाना चाहता हूँ..

vimal verma said...

कुछ लोगों को अपना बनाना असान है बनिस्पत सबसे प्यार करने के..क्योंकि सबसे प्यार करना ज़्यादा मुश्किल और अमूर्त है.पर मैं भी सड़ना नहीं चाहता.क्योंकि प्यार करना इतना आसान होता तो आदमी बम क्यों बनाता.वैसे दुनिया को प्यार से जीता जा सकता है बम से नहीं

Aflatoon said...

झूरी हर मोहल्ले मेँ हैँ | शायद वैसा बने रहने की सुरक्शा छोड़ना कठिन हो जाता है |

Sanjeet Tripathi said...

कहां से आएंगे भैय्या ये झूरी और सूखा, मैं, आप , हम सब कहीं ना कहीं से ज़िम्मेदार हैं किसी को झूरी या सूखा बनाने के लिए!!

सड़ना तो मै भी नही चाहूंगा!!
वो एक गाना है ना, प्यार बांटते चलो प्यार्……

Gyandutt Pandey said...

जो प्यार नहीं कर सकता, सड़ जाता है - यह पागल का कथन है या तत्वदर्शी का?
बहुअ अच्छी पोस्ट.

बोधिसत्व said...

ज्ञान भाई ब्लॉग पर लिखना तो मैंने अभय,आप, अनूप शुक्ला और अफलातून जैसे गुरुजनों से सीखा है।
बात कहलेने की कोशिश कर रहा हूँ। उत्साह बढाने के लिए आभारी हूँ।

yunus said...

राजेश जोशी की कविता याद आ गयी जो पागलों पर लिखी गयी है ।

बोधिसत्व said...

पागलों पर बहुत सारा लिखा गया है। राजेश जी की कविता मैंने भी पढ़ी है।

अनूप शुक्ला said...

अच्छा है। बहुत अच्छा है। इलाहाबाद की चाय की दुकानों के बंद मक्खन याद आये। प्यार के लिये क्या कहें। कोई कहता है प्यार किया नहीं जाता है हो जाता है। लोग न कर रहे हैं, न हो रहा है। सड़न मची है।

बोधिसत्व said...

अनूप भाई
आप लोग पढ़ते हैं तो अच्छा लगता है।
रही बात प्यार की तो अपनी बात रखने में जब झूरी नहीं हिचकता तो हम भला क्यों पीछे रहें।

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर रचना है व झूरी का दर्शन बिल्कुल सही है ।
घुघूती बासूती

अजित वडनेरकर said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति बोधिभाई। ये देसी अंदाज़ ही हमें पसंद है। देसी अंदाज़ में संवेदनशील बात।
आपने हमारी पोस्ट पर टिप्पणी भेजी , आभारी हैं पर शुक्रिया कहां भेजें ? आपके प्रोफाइल पर तो कोई अता-पता है नहीं ? हम क्यों आपको मूर्ख समझने लगे ? जब आपके नाम में ही बुध् समाहित है तो ऐसी वैसी धारणा बनाकर क्यों पाप के भागी बनेंगे ? अलबत्ता हम ज़रूर मूरख हैं, और बने रहना चाहते हैं। हां आत्ममुग्ध वाले मूरख नहीं हैं। स्नेह बनाए रखें और फटाफट अपना ईपता भेज दें।

उन्मुक्त said...

प्यार तो प्रकृति की सबसे अच्छी अनुभूति है।