Monday, September 3, 2007

मुझे पुलिस से कौन बचाएगा ?


पुलिस का डर
जन्माष्टमी के दिन का लगता है पुलिस और कारागार का कुछ खास नाता है। तभी तो ऐन उसी दिन मेरे थाने जाने की नौबत आ गई है। मामला आज रात करीब साढ़े नौ बजे का है। मैं अपने बच्चों के साथ बाजार निकला था। पत्नी जन्माष्टमी पर किशन भगवान के लिए कुछ नया खरीदना चाह रही थीं। पर खरीदने के पहले मेरी गाड़ी एक पुलिस की गाड़ी से टकरा गई और खरीदारी पुलिस की ओर मुड़ गई। गाड़ी गुनहगारों को तलाशने निकली थी और मैं एक नया गुनाहगार मिल गया। मेरी गाड़ी में मेरी बेटी भानी, मेरा बेटा मानस और मेरी पत्नी आभा बैठे थे और पुलिस की गाड़ी में तीन सिपाही और दारोगा पाटील के साथ वर्दीवाला ड्राइवर भी था। यानी कुल पाँच हथियारबंद लोग बनाम चार निहत्थे ।

बात केवल टक्कर की होती तो चल जाता। मामला यहाँ उलझ गया कि गलती किसकी है मेरी या उस वर्दी वाले ड्राइवर की। टक्कर के बाद उस गाड़ी से पुलिस वाले निकल आए और मेरी गाड़ी को लगभग घेर लिया। मुझसे गलती यह हुई की चवन्नी वाली भूल की तरह तत्काल क्षमा क्यों नहीं माँग लिया। मैंने उनके ड्राइवर से कहा कि आप भी देख कर चलें । बस उसने मुझे गाड़ी से उतरने और डीएल और गाड़ी का पेपर देने की बात की। मैंने उसे पेपर नहीं दिए ना ही डीएल दिया क्योंकि मैं कुछ भी लेकर निकला ही नहीं था। उसने मेरा मोबाइल नंबर माँगा मैंने दे दिया लेकिन उसने अपना नंबर माँगने पर भी नहीं दिया । थोड़ी बातचीत के बाद सारे पेपर लेकर पुलिस चौकी आने को बोल कर वे सब चले गए मैं उलझ गया हूँ।
क्या करूँ। थाने जाने का मन नहीं है। जानता हूँ कि गिरफ्तार करने के लिए पुलिस को सिर्फ लिखना और धकेलना भर ही पड़ता है।
रात बिताने की तैयारी में हूँ। थाने नहीं जा रहा हूँ। सुबह जाऊँगा। जो होगा देखा जाएगा। अगर बंद हो गया तो बच्चे थोड़े दुखी होंगे । लेकिन बाहर तो आ ही जाऊँगा । यहाँ भाई चंदन परमार जी,मित्र अभय तिवारी , प्रमोद जी, विमल भाई, अजय जी, अनिल रघुराज, जितेन्द्र दीक्षित और मयांक भागवत जैसे कुछ मित्र हैं जो जमानत ले लेंगे। पर अगर पुलिसवालों ने मुझे ठोंका तो। हालाकि की थोड़ी बहुत पिटाई झेल सकता हूँ। पर बहुत नहीं।

मामले के बीच कुछ जो अलग सा हुआ।

भानी ने इतने पास से पुलिस अंकल को पहली बार देखा तो वो काफी खुश थी । वह अब तक मुझसे कई बार सवाल कर चुकी है कि पुलिस अंकल पेपर माँग रहे थे। वह पुलिस अंकल के पास चलने को तैयार भी है।मानस थोड़ा घबराया था क्योंकि डीएल मैंने उसी से उठाने को कहा था पर उसने कुछ और उठा लिया यानी वह बटुआ नहीं लिया जिसमें मैं डीएल रखता हूँ।
पत्नी पूरे मामले को महज दुर्योग मानती रही और अब भी मान रही हैं । क्योंकि बाजार जा कर फिर उसने मुझे आने को कहा और मैं चला भी गया । यानी सब कुछ अचानक ही हुआ ।
अब जाग कर रात बितानी है और सबेरे से पुलिस चौकी के फेरे लगाने हैं । देखते हैं क्या सचमुच जन्माष्टमी के दिन या रात कारागार की यात्रा करनी पड़ेगी।

15 comments:

अनामदास said...

नहीं ऐसा कुछ नहीं होगा, पुलिस वाले कद-काठी, हुलिया, कपड़ा-लत्ता, रोज़ी-पेशा देखकर काम करते हैं. बेफिक्र होकर सो जाएं. डीएल का राज़ दो मिनट सोचने पर खुला कि अच्छा आप बिना ड्राइविंग लाइसेंस जेब में रखे गड्डी चला रहे थे, ज़मानत लेने वाले बहुत मिलेंगे. पुलिस ने अगर आपको छुआ तो हम विलासराव को देख लेंगे.

Udan Tashtari said...

भाई मेरे, थोड़ा बहुत ले दे कर खतम करो मगर अगर उलझ ही जाओ तो खबर करो टाईप में चलिये.

जमाना लाठी के इर्द गीर्द घूम रहा है...पंगे का काम खतरनाक है...भले ही सही हो. मैं नैतिकता की बात नहीं करता ऐसे समय में....दूसरों के समय सबको नैतिकता का पाठ याद आयेगा..मगर जरा संभलियेगा...आपने तो दुनिया देखी है..सड़क पर ट्रेफिक सिपाही राष्ट्रपति से ज्यादा अहमियत रखता है.

Gyandutt Pandey said...

"देखते हैं क्या सचमुच जन्माष्टमी के दिन या रात कारागार की यात्रा करनी पड़ेगी।"

साक्षात कृष्ण आपकी प्रेरणा बन कर आपको ठेल रहे हैं आपको कृष्णत्व दिलाने को और आप एक कायर की तरह पीछे हट रहे हैं!
आगे बढ़े; बढ़ते रहें; जब तक लक्ष्य (देश से भ्रष्टाचार के कंस का उन्मूलन) प्राप्त न कर लें.
शुभ कामनायें! :)

अरुण said...

वाह जी आप महान होने के रास्ते पर है.. हर बडा नेता,अगर उसका बाप नेता नही है तॊ थाने से ही इस मार्ग का द्वार खुलता है..चाहे तो किसी की भी जीवनी उठाकर देख ले..आपको भी भविष्य पुकार रहा है भारत भाग्य विधाता बन गल्ले मे हाथ डालने के लिये
कोई लेने देने की बात मत करना सत्यता की दुहाई देकर अडे रहना ..बाद मे इसी कुरबानी के असत्य से सारे जीवन के लिये सत्य को खरीद लोगे...:)

ALOK PURANIK said...

आप निश्चिंत रहो जी, अनामदासजी कह चुके हैं कि वह विलास राव को देख लेंगे। बाकी जेल जाने की नौबत आ ही जायेगी, तो अपनी कविताएं छोड़कर इंटरनेट के कई कवियों की कविताएं ले जाइये। और जाते ही दे दनादन ठेल दीजिये। एक घंटे में बाइज्जत आपको घर न छोड़ने आयें, तो मुझे बताइयेगा। तब मेरी पुरानी कविताएं किस काम आयेंगी।

अभय तिवारी said...

सँभालो भाई..

Aflatoon said...

आपका अनुभव अरुणजी और समीरजी के लिए भी सबक होगा,यह मत भूलिएगा।पहले का लाठी-जेल का तजुर्बा सिफर तो नहीं होगा ,भरोसा है। आप नहीं घबड़ाए , इसलिए भानी 'अंकलों' से नहीं घबड़ायी । कुछ अभिवावक तो 'बेटा दूध पी ले,नहीं तो पोलीस वाला आ जाएगा' कहा करते हैं।

अनूप शुक्ला said...

कुच्छ नहीं होगा आपको। मस्त रहिये, व्यस्त रहिये। ऐए चवन्नी छाप कारनामे दिन में ३६५ होते हैं। पुलिस वालों के टाइम की भी कुछ कीमत है भाई!

चंद्रभूषण said...

दिन में बारह बजे टिप्पणी कर रहा हूं। आशा है अबतक थाने के झंझट से उबर गए होंगे। न उबरे हों तो पत्रकार मित्रों की भरपूर मदद लीजिए। जेल में बंद करेंगे, पिटाई करेंगे- यह सब कहना तो दूर, सोचने तक से घर-परिवार में पैनिक फैल जाता है। ऐसा कुछ नहीं होगा, और इससे मिलता-जुलता जो कुछ भी होगा, उसका सामना करने में आप सक्षम हैं। ज्यादा से ज्यादा वे आप से पुलिसिया जुबान में बात कर सकते हैं, हजार-पांच सौ जुर्माना लगा सकते हैं। आपके पास कागजात नहीं थे, यह गलती आपसे हो चुकी है इसलिए जो जुर्माना लगाएं उसे दे दीजिए और सीना चौड़ा, सिर ऊपर किए बाहर आ जाइए।

आशीष said...

sir...ap to bus yeh batao ki kis thane ki baat hain...

Udan Tashtari said...

अब तो भारत में शाम का ६ बज गया है. अपडेट दिजिये क्या हुआ. मन लगा है भाई!!

बोधिसत्व said...

आप सब का बहुत बहुत आभारी हूँ। कुछ लोग तो हैं जो मेरा खयाल रखते हैं।
1-अनामदास जी के भरोसे के बाद तो मैं सचमुच मस्त हो गया ता।
2-समीर भाई ने भी अच्छा सुझाव दिया पर उसकी नौबत नहीं आई।
3-ज्ञान भाई मैं कारागार जाने से अभी वंचित हूँ।
4-अरूण जी मैं महान नहीं बनना चाहता। जेल जाने से शायद बना ही दिया जाता पर हाय यह मौका भी जाता रहा।
5-आलोक भाई पुलिसवालों के उपर कविता का कोई असर नहीं पड़ता बल्कि वो और भी पुलिसनुमा हो जाते हैं।
6-अभय मैंने सँबाल लिया है भाई।
7-अफलातून भाई बच्चे एक दम निश्चिंत रहे। यह मेरे लिए अच्छा था।
8-अनूप जी सचमुच कुच्छ नहीं हुआ। मैं मस्त हूँ।
9-चंदू भाई फैलने के कारण ही तो यह सब हुआ। पर क्या करूँ सिमट कर रहने की आदत नहीं है। मैं फैला हूँ।
10-आशीष प्यारे मामला चारकोप पोलिस थाने का है । पर अभी कुछ ला करो। खुश रहो।
11-समीर भाई आप आराम से रहें। मैं एक दम आराम से हूँ।
मित्रों हुआ यह कि पीएसआई पाटील साहब दो बार जाने के बाद भी नहीं मिले है। कहीं जन्माष्टमी पर बंदोबस्त ड्यूटी पर हैं। लेकिन एक दूसरे एसआई सुरवसे साहब मिले। उन्होंने मेरा नाम दर्ज करके मुझे खुश रहने को कहा। मैं खानापूरी करके घर आ गया हूँ और कोई टेंशन नहीं है।

ALOK PURANIK said...

चलिये 7.33 शाम को दोबारा आकर चैक किया है, सब ठीक तो है ना। जी आप मस्त रहें। अपनी गाड़ी पर भौत बड़का बड़का लिखवा मारें प्रेस।

AALOCHAK said...

are bhaiya aap bhi n main to dr hi gaya tha,abhi aapka blog dekha to,pr aapki tippani padhkar ji men ji aaya.

यशवंत सिंह said...

sir ji, jo bhi hoga achchha hoga kyonki jo hota hai achchha hi hota hai...ye mere jeevan ki philosophy hai aur ese mai sabhi par laagu manta hu. mere liye jo aadesh ho turant batayiyega. saare bhadasi hajir ho jayenge thaane me.
mai aaj chhutti pe hu, syber cafe se likh reha hu.
yashwant
yashwantdelhi@gmail.com