Saturday, September 15, 2007

झाड़ी के पीछे बनवारी

ज्ञानपुर में मेरे एक मित्र थे संतोष कुमार । उन्होंने चकोर उपनाम रखा था। पर यदि कोई सिर्फ चकोर कह कर बुला ले तो समझिए हो गया अबोला। वे किसी को फोन भी करते या परिचय भी देते थे तो कहते थे कि चकोर जी बोल रहा हूँ। उनकी आदत थी कि बिना कहे कभी कुछ भी नहीं सुनाते थे। कभी मेरे पास कुछ कविता या पद नुमा छोड़ गये थे। आज अचानक मिल गया । आप भी पढ़ें और समझने की कोशिश करें कि वो क्या कहना चाहते थे।

बनवारी का दुख

झाड़ी के पीछे बनवारी मिले।
बनवारी के साथ बैठी थी लजाती सी वंदना।
खोजती भटकती थी दोनों को संध्या रंजना।
खोज कर बेहाल दोनों को गोलू तिवारी मिले। झाड़ी के पीछे।

बनवारी और वंदना का हाल बुरा था।
दोनों को दुख था और मुँह उतरा था।
दोनों बैठे थे बस चुपचाप।
पत्ते हिलते आप से आप।
दोनों का दुख था कि अब कहाँ से उधारी मिले। झाड़ी के पीछे।

दोनों थे बड़े अच्छे दम्पत्ती।
पास नहीं थी कुछ सम्पत्ती।
दोनों चाहते सुख से रहना
नहीं चाहते थे अपना दुख किसी से कहना
करते दुआ हरदम न किसी को दिन ऐसा भारी मिले। झाड़ी के पीछे।

गोलू के साथ सिनेमा गई रंजना ।
संध्या अकेले गाती रही प्रार्थना।
बनवारी वंदना का पता हो गया गुम
बाद में दोनों पेट के लिए कहीं करते बेगारी मिले। झाड़ी के पीछे।

5 comments:

Gyandutt Pandey said...

बढ़िया! गड़बड़ रामायण से बेहतर बा. :)

चंद्रभूषण said...

खोजकर संतोष जी का कुछ और भी छापिए। बड़े मौलिक नजर आते हैं।

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

× ee mal aakhir mila kaise e n bataeye, tab bujhenge? bawal ka chij hai j. man gaye bhaiya aapko v. ham t bujh rahe the ki khali hamahee hain, bakir jan gaye aapo guru hain.

बोधिसत्व said...

ज्ञान भाई चकोर जी को छापने की हिम्मत तो गड़बड़ रामायण से ही मिली है।
चंदू भाई
मेरे पास चकोर जी की दर्जनों कविताएँ है। कुछ अजब अटपटे छंद में रची हैं सब । अगर आपलोग कहते हैं तो कुछ आगे छापूँगा। दुख है कि चकोर से मेरा कोई सम्पर्क नहीं है। मैं उन्हे बता भी नहीं सकता कि उनका कुछ अब प्रकाशित हो रहा है। उनकी कुछ कविताएँ मैंने पत्रिकाओँ को कभी भेंजी थी पर कोई नतीजा नहीं निकला।
वंधु हरे
आप को अच्छा लगा यह तो और ही अच्छी बात है।

Udan Tashtari said...

मौलिकता के साथ विचारों की अल्हड़ सी बानगी. और लायें.